Wednesday, April 25, 2007

लड़की आएगी.. फ़ाम और फ़ाम फताल दोनों आएंगी!

एच की मौत: पांच

थाने से निकलकर दामोदर दास ने साइकिल रिक्‍शा किया. रणनीति के बतौर अच्‍छे लक्षण नहीं थे मगर उसके साथ जबरजस्‍ती मैं भी हो लिया. दामोदर दास हैरानी से मुझे देखता रहा. ये क्‍या तरीका है वाले अंदाज़ से. नज़रअंदाज करके मैंने पूछा- और?.. कैसा चल रहा है?..

खाक़ चलेगा?- दामोदर दास ने चिढ़कर कहा, कहानी किधर जा रही है कुछ सूझ ही नहीं रहा. वैसे ही झमेलों की कमी नहीं थी, लगता है खामखा एक नयी मुसीबत पाल ली है. शुक्‍ला जी की नज़र गई तो मेरी नौकरी पर खतरा भी हो सकता है. वैसे ही कॉलेज में मैं किसी का चहेता नहीं. छात्र तक गंभीरता से नहीं लेते. दो महीने पहले आते-आते बात संभल गई थी वर्ना एक लड़के ने लगभग मुझ पर हाथ छोड़ ही दिया था.. मुझे क्‍यों उलझा दिया है- इस कार्य के लिए मेरी उपयुक्‍त पात्रता नहीं है, लेखक महोदय.. ?

मैंने कहा- जान-बूझकर तुम्‍हारा चुनाव किया है. डेलिबरेट है. सुबाचन यादव के साथ भी तुमने लक्ष्‍य किया होगा- नायकत्‍व नहीं है.. वही चाहिये मुझे.. समय व परिस्थितियों के बीच तनावपूर्ण रिश्‍ते में आबद्ध.. एक तरह का राइटियसनेस लेकिन आत्‍मविश्‍वास का अभाव.. थोड़ा कन्‍फ्युज्‍ड.. एंटी हीरो.. ऐसे ही टॉर्च के साथ मैं अपराध की दुनिया में उतरना चाहता था..

- लेकिन अपराध है कहां?.. खून-रक्‍तपात, अंधेरा, भ्रष्‍ट-तंत्र सामान्‍यत: जो तत्‍व होते हैं ऐसा क्‍या दिख रहा है? विषकन्‍या क्‍या सामान्‍य स्‍त्री तक नहीं है.. हजारी भैया के जीवन में न मेरे..

- आएगी, आएगी.. कन्‍या भी आएगी और पीछे-पीछे विष भी.. मैं इतने वर्ष मेधा पाटकर और वामपंथी सभाओं की संगत में राष्‍ट्रीय परिस्थिति का अध्‍ययन नहीं कर रहा था, और न नौकरी करते हुए पैसा पीट रहा था- देख ही रहे हो मेरी स्थिति, तुम्‍हारे साथ फटी बांह वाले रिक्‍शे में टहल रहा हूं, शिमला में नहीं सेमलगंच में टहल रहा हूं!- जासूसी उपन्‍यासों की संगत में ही यह सारा समय बीता है! तो, बंधु, नैरेटिव की तुम चिंता न करो, चार-आठ फ़ि‍ल्‍में लिखते हुए एलिमेंटरी सस्‍पेंस बिल्‍ड करना हम जानते हैं, ‘पहला पड़ाव’ जैसी चीज़ न भी बने, इतना खराब भी न बनेगा कि श्रीलाल जी दु:खी हो जायें. दु:खी तुम भी नहीं होगे भले हमारी कथा का सुखांत न हो. सुखांतों में हमारा विश्‍वास नहीं.. वह हम अपने व्‍यक्तित्‍व के खास टेढ़ेपन में मजबूर हैं.. मगर दूसरे स्‍तरों पर रोचकता बनी रहेगी, तुम बस अपना उत्‍साह बनाये रखो. लोग टांग खींचें, मुंह बनायें, एच की मौत मील का पत्‍थर बनेगा इससे बेफिक्र रहो!

दामोदर दास अच्‍छे शिष्‍य की तरह बात सुनकर बेफिक्र नहीं हो गया- वैसे भी मुझ-से निराले का वह रामविलास तो नहीं ही हो सकता था, अपने हजारी का किस हद तक नामवर हुआ था इसकी तस्‍वीरें भी अभी खुलकर सामने आनी थीं- चिं‍ता के स्‍वर में बहकने लगा- एक बात बताऊं, महोदय जी? यह आपका जो बालसुलभ, तसल्‍लीबख्‍श तरीका है उसकी सोचकर कभी-कभी बड़ी हैरानी में पड़ जाता हूं! आपने जासूसी उपन्‍यास पढ़े होंगे मगर किशोरीदास वाजपेयी, मैथिलीशरण और महावीर प्रसाद को नहीं पढ़ा.. छायावाद पढ़ा है? प्रयोगवाद, अ-कविता जानते हैं?.. फिर काहे के बूते हिंदी की दुनिया खड़ी करेंगे? मज़ाक है, हंसी-ठट्टा है? यहां सेमलगंज की एक वाजिब, इन-टोटो कल्‍पना खड़ी करने में हंफहंफी छूट रही है और आप हिंदी के विराट कुएं में उतरने की बात कर रहे हैं! और हाथ में मैं बत्‍ती लिये आगे-आगे चलूंगा? कहां से चलूंगा, मालिक? मैं जीवन के बारे में जानता कितना हूं! हजारी भैया तक को ठीक से जानता था दावे के साथ नहीं कह सकता.. बत्‍तीस वर्ष की अवस्‍था हो गई अभी तक प्रेम जैसे स्‍वाभाविक भाव से अछूता रहा हूं और मुझमें नायकत्‍व ठेल रहे हैं और कहते हैं कथा में रोचकता बनी रहेगी? मुझे पहले ही भय था हम प्रपंच नहीं प्रमाद व प्रहसन की तरफ बढ़ रहे हैं!

साइकिल रिक्‍शा संजय गांधी इंटरमीडियेट कॉलेज के बेरौनक और बेमतलब पड़ोसी भीड़भरी गली से गुजर रहा था. दामोदर दास की बातों में अगर सत्‍य का कोई पुट था तो अभी एक उलझे जिरह में उतार कर मैं उसका दिन खराब करना नहीं चाहता था. वैसे भी उसे कक्षा को देरी हो रही थी, और सुबाचन यादव अच्‍छे प्रेरणा-पुरुष नहीं ही साबित हुए थे. जवाब देने की बजाय मुस्‍कराने लगा. दामोदर दास के चेहरे पर हैरानी फैल गई. मेरे रवैये से नहीं जो गली में दिख रहा था उसकी प्रतिक्रियास्‍वरुप..

पान की दुकान पर सैकेंडहैंड फटफटिया रोके उसकी कक्षा के दो छात्र बजाज की दुकान से निकल रही एक पंद्रह साल की लड़की को अपना रंगीलापन दिखा रहे थे. और बाज़ार चुपचाप देख रही थी. दामोदर दास उद्वि‍ग्‍न होकर रिक्‍शे में खड़े हो गए और उसी तेजी से मैंने हाथ खींचकर वापस बिठा लिया.

(जारी..)

2 comments:

  1. तब्बू के फ़ाम-फ़ताल रूप और ऑरसन वेल्स-नुमा (या ख़ुद ऑरसन वेल्स की ही?) फ़ोटो को देखकर लग रहा है कि कुछ नीओ-न्वार टाइप की चीज़ आने वाली है. मज़ा आएगा. अब जल्दी मनाइए दामोदर दास को.

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  2. फाम फताल की तस्वीर पर ज़रा और मेहनत करें । ऐसी फताल भी नहीं लग रहीं

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