Thursday, April 26, 2007

गोविंदा आला रे!.. और निकला दिवाला रे!!..

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: पैंतीस

कुली नंबर वन के मुंह से छूटा- मैं यहां वहां कहां, तुमको क्‍या? अरे, जान न पहचान मैं तेरा मेहमान! कौन हो भाई, बिन पेंदी के लोटे, बिना पेटी के हारमोनियम, तुम्‍हें पहचानता हूं? जूनियर में मेरे क्‍लासमेट रहे हो फिर खाली-पीली इस तरह काहे को लोट रहे हो, यार? रास्‍ता देखो न, आगे बढ़ो, चलो, चलो! रोज़ मिलते हैं इधर, हाथ-मुंह उठाये चले आते हैं, हम भी हिन्‍दुस्‍तानी का स्‍लोगन पेलते हुए!.. अबे, तुम हिन्‍दुस्‍तानी हो तो हम क्‍या करें? बीस साल पहले हमारे चुनाव क्षेत्र से होते तो हम एक स्‍माइल दे देते लेकिन उसके बाद? हमारी प्रायवेसी है. पर्सनल पंगे हैं. हर जगह सिर डालते हुए घुस जाओगे? और हम सिर पे लेते रहेंगे इसलिए कि हिन्‍दुस्‍तानी हो? कमाल है, यार. इतना पॉपुलेशन पैदा कर रखा है, देश में तो सबके लिए जगह निकलने वाली नहीं, भाग-भाग के सब इधर-उधर जाएंगे ही.. तो सबको मैं उठ-उठ के गले लगाऊं? अपने गिल्‍बेर्तो पान्‍ना का जैकेट खराब करुं? तुझे लगता है तेरा चेहरा इस लायक है?.. अबे, आंख मत दिखा, भुक्‍खड़, चल, निकल ना, निकल!.. साले, इधर भी भिखारी पहुंचना शुरु हो गए! क्‍या ट्रेजेडी है, काली कमली वाले, अपना इंडस्‍ट्री वहीं इंडिया में रहने दो न, इधर एक्‍सपोर्ट मत ठेलो, प्रभु.. लाइफ में बौत टेंसन चल रैली है, गुरु, रहम करो!..

यह आखिरी की दो पंक्तियां मुझे नहीं इंडिया में हेड ऑफिस रखके दुनिया-जहान के नियंता को एड्रेस करके कही गई थीं. लेकिन उसके पूर्व स्‍नेह भाव की जो डॉक्‍यूमेंट्री देख ली, उससे सचमुच में अपना नायक कुली लगने लगा. जी कड़वा हो गया. गप लड़ाने की इच्‍छा एकदम-से मर गई. तीन कदम पीछे हटकर मैं दायें से आगे चलने लगा मानो इस दो कौड़ी के गिरे हुए इंसान से मेरा दूर-दूर का संबंध न हो. संबंध था भी नहीं..

बेलग्रेड के सबर्ब से नफरत होने लगी. जैसे बीस वर्ष पहले बंबई के सबर्ब से हुआ करती थी. कमर्शियलाइज़ेशन और कंस्‍ट्रक्‍शन. इससे अलग जैसे आसमान, हवा और हमारे जीवन के निंयताओं की नज़र में ज़मीन का और कोई इस्‍तेमाल ही न हो. दूर-दूर तक बड़ी-बड़ी मशीनों की घरघराहट का स्‍वर फैल रहा था. घिसे ओवरऑल्‍स में अमरीकी, अंग्रेज, सर्बियाई, सोमालियन सब कहीं के मजदूर पिले पड़े थे. कोई चीनी या भारतीय मजदूर कहीं काम करता नहीं दिखा. निर्दोष मन से देखनेवाले को लगता दुनिया को बदल डालनेवाली कोई महत्‍वाकांक्षी स्‍कीम क्रियान्वित हो रही है, मगर महानगरों के तलघर में जीनेवाले झट समझ जाते सीमेंट, कॉंक्रीट, ग्‍लास और पैसों का वही परिचित पिशाची तंत्र खड़ा हो रहा है जिसके भीतर सिर्फ पैसे की हवा पहुंचती है, मानवीय जीवन नहीं. महज सहानुभूति जताने के ख्‍याल से दो घड़ी को सुस्‍ता रहे एक सोमालियन मजदूर की तरफ दुआ-सलाम को मैं हाथ उठा ही रहा था कि पीछे से आवाज़ आई- अबे, ओय, तू तो नाराज हो गया? तेरे को तो मिर्ची लग गई? बड़ा टची है, यार! आज के ज़माने में इतना सेंटी-फेंटी रहना था तो अपने गांव में रहता, दल्‍लाल को युआन खिलाकर यहां आने की फिर क्‍या ज़रूरत थी, अंय?..

मैंने कान नहीं दिया. अनसुना करके सोमाली की दिशा में आगे बढ़ता रहा. अपनी ओर आता देख सोमालियन ने एकदम-से अपना फ्लास्‍क हटा लिया. मेरे कदम डगमगा कर अटक गए. वह लुटा-पिटा अजनबी भी मुझे भिखमंगे की ही तरह देख रहा था.. मानो मैं उसकी तरफ उसकी चीज़ हड़पने बढ़ रहा होऊं! मेरा दिल बैठने लगा.. इस दुनिया में अब प्रेम का, मानवीयता का मतलब क्‍या रहा? सब एक-दूसरे को किसी और निगाह से देखने के पहले शक की निगाह से देखते हैं! और नेक मंशायें या तो पैरों तले रौंद दी जाती हैं या फिर हंसी में उनका उपहास बनता है! जो तत्‍काल बना भी.. पीठ पीछे ज़ाहिल और मुझे लांछित करती वह हंसी बेशर्मी से गूंजती रही.. इसके दंश से तकलीफ होने लगी तो पलटकर मैं चीखा- ये तुम्‍हारी फ़ि‍ल्‍म नहीं है, और मैं कोई जूनियर आर्टिस्‍ट नहीं हूं, सो जस्‍ट स्‍टॉप इट यूअर इडियोसी, इट्स सिकेनिंग!

अपने नारंगी जैकेट की जेब में हाथ डाले नायक खड़ा हो गया, मुस्‍कराने लगा- यू आर वेरी टची, मैन.. यू कैनॉट कैरी ऑन लाइक दिस.. नॉट हियर! नॉट एनीवेयर.. दुनिया बड़ी ज़ालिम जगह है, मेरे दोस्‍त!

फिर सिर झटक कर नायक ने मुझे अपनी तरफ आने का इशारा किया. दूसरा कोई चारा न देख, मैं डक पर आऊट हुए बैट्समैन की तरह उसके पवेलियन की ओर लौटा. मेरे निकट पहुंचते ही कुली नंबर वन फिर थेथरों की तरह हाथ-पैर फटकता हंसने लगा, जैसे कॉमेडी का अवतार वह नहीं मैं होऊं.. उसी तरह से फिर एकदम चुप भी हो गया. बोला- यार, तुझे कुछ पीना-पिलाना था, मुझसे कहता.. उस काले, जंगली के पास जाने की क्‍या ज़रूरत थी?.. नाम क्‍या है तेरा? इधर कहां से टपक गया?.. भाई लोगों से कोई कनेक्‍शन तो नहीं?..

(जारी...)

3 comments:

  1. कहाँ से चले थे और कहाँ जा रहे हो ये कौन सा राग सुना रहे हो मुसाफ़िर देखो कहीं भटक तो नहीं गये अपने हार्मोनियम पेटी का सा तलाश कर फिर से राग अलापो. ये गान कुछ बेसुरा होता जा रहा है.

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  2. बेनाम की राय पर कान दिया जाय प्रमोद भाई.. ब्लॉग वाला मुद्दा कहीं पीछे छूट गया लगता है.. बाकी चुटीलापन तो अभी भी है..भाषा की रवानी तो अभी भी है..बस मन थोड़ा निरन्तरता के लिये मचलता है..

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  3. yes track lost somewhere.. theme u strted is not visible..

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