Friday, April 27, 2007

ब्‍लॉगतंत्र दु:खतंत्र..

बस से उतरते ही हाथापाई हो गई. हाथ फेंककर एक चीखा- नीच! दूसरा बोला धिक्‍कार है आपको! मुंह में सुख की पुड़ि‍या घुमाते हो हमको दु:खतंत्र समझाते हो? फिर गालियां छूटीं कोई गिर पड़ा. किसी की आंख थी किसी का हाथ. चुनरी थी चप्‍पल था कोई पूरा समूचा नहीं दिख रहा था. सबसे पहले दिखा जो अविनाश था, रिक्‍शे से कूदकर भागता आया. क्‍या बात है, जी, क्‍या गर्द मचा रखा है आप लोगों ने, हमारे बारे में बात हो रही है? पीछे दबी कहीं अभय की चोट खायी आवाज़ आई- इतने जतन से धोती निकाल कर पहनी थी मगर देखिये क्‍या सर्वनाश कर दिया! तब तक बोधि चिचियाये- यही तुमने दोस्‍ती निभाया? स्‍वागत कहके बुलाया और फिर गड़ही के कादो में नहलाया? तीन लड़कियां थीं बाजू में अपने संसाधन और श्रृंगार सहेजतीं. एक ने कहा नीलू, अपना कपड़ा बचाना रे, बड़े बत्‍तमीज़ लोग हैं. अविनाश अपनी नयी छपी कवितायें हिलाते, दिखाते लड़कियों के पास आया, आश्‍वस्‍त किया आप लोग घबराइये नहीं मैं हूं यहां. ऊपर प्रभु हैं. ऊपर जो थे उनने पुष्‍पवृष्टि नहीं की न वज्रपात किया, प्रभुगण अंटी ओढ़े सोये रहे. मैं अलबत्‍ता जग गया. आंखें मलकर अंधेरे में तकता रहा, खुद को दो और अभय को दस गाली दी कि स्‍वप्‍न में भी ब्‍लॉग के झमेले चले आ रहे हैं! जीवन कहां जा रहा है!

3 comments:

  1. अब इस स्वप्निल संस्मरण को आपकी साहित्यिक ईमानदारी समझूं या कटाक्ष की धार..गालियों की संख्या तो दस से बढ़ने ही वाली है.. बेनामों की गालियां..आपके स्वप्न में मित्र बोधि की गालियां.. और फिर स्वप्न में भी आप को तंग करने के लिये की दस गालियां..

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  2. ई सब का किए गुरु!

    बस से उतरते ही 'एक्सीडेंट'करवा दिये .

    धोती संभालते अभय,कविता संभालता अविनाश, संसाधन संभालती संसाधन-सम्पन्न बालाएं और कविताई छोड़ चरित्र संभालता कवि. और अपनी लेखनी संभालता अज़दक .

    आज़ब-गज़ब संस्मरण (?) है प्रभु!

    क्या यह कोई नई फ़्रायडियन विधा है ? मार्गदर्शन करें प्रभु !

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  3. Lagta hai aap kisi bas mein nahin chadhe.

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