Saturday, April 28, 2007

इंटरनेट के तार पर चिड़ि‍या: एक चिड़ि‍याहट

सुरभि, सुरुचि, नाद, प्रमाद, विवाद सब इकट्ठा हुए शुरू हुआ संवाद. सज गई महफ़ि‍ल चहकने लगे. कैसे चले आये क्‍यों लिखना शुरू किया? जैसा जो भी था बजने लगा बाजा. मैं प्रकट में मुस्‍कराया भीतर पर्दा खींचकर बड़ा घबराया. अब मैं भी यह लड़कपन करूंगा आईने फैलाके उसमें जोकर बनूंगा? किस रास्‍ते क्‍यों आया हूं मसौदा क्‍या बनाया है कैसी तरतीबें लाया हूं? कोई व्‍यवस्‍था है? दिशा नियम अनुशासन आगे देख क्‍या रहे हैं या ऐसे ही छुच्‍छे भाव खा रहे हैं? यह कालेज के सालाना जलसे में कविता पढ़कर ताली बजवाना नहीं होगा न सत्रह गुना तेरह के फुलस्‍केप पेपर पर सुधड़ अक्षरों में प्रेस कापी तैयार करके फुरसतियाना होगा. यह तो खाली सफ़ेद कभी न चुकनेवाला ऐसा रहस्‍यभरा पन्‍ना है जो दर्र-दर्र घर्र-घर्र इतने हज़ार लाख शब्‍द हजम कर चुका अब तक एक महीन डकार नहीं ली है. पता नहीं अभी कितना कहां घुमायेगा क्‍या-क्‍या और खाएगा. ढेरों सवाल थे जवाब नहीं था. दिगंत से आगे जाने कहां तक पसरा विस्‍तीर्ण मैदान था अंधा बनाती चमक थी माइक्रोसॉफ्ट का नीला आसमान था. कदम-कदम पर चौराहे थे. इतनी गलियां और कितने मोहल्‍ले थे. रामपुर था दामपुर था. बहुत हल्‍ला था विश्रामपुर कहीं नहीं था. मैं खुद को निर्दोष चिड़ि‍ये के रंग में रंग कर भावुक हो रहा था. तार पर ढंग से बैठ रहा था न उड़ रहा था.

4 comments:

  1. प्यारा.. बहुत प्यारा है ये आलाप..

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  2. अति सुन्दर भाव !
    sujata

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  3. जी अनजाने ही वाह-वाह कर उठता है।

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  4. इंटरनेट के तार पर चिड़ि‍या ...अच्छा लगा..

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