Sunday, April 29, 2007

पुरबिया फुटानीबाज का प्रार्थनागीत

हम सिरनगर नगालैंड नहीं जायेंगे मदुरै का नाम उच्‍चरते ही दांत दिखायेंगे. डेहली वाला बूझे अपने को बड़का बाबू हम भी अपने को कम नहीं बूझेंगे. दतुअन से दांत घसेंगे, बुड़बकई में हरर-हरर नहायेंगे. मनोहर कहानियां का पंखा झलेंगे और बथुआ के साग बास्‍ते लार बहायेंगे. अरुई के फूल और बजका की बात चलेगी तो गुमसुम गंभीर हो जायेंगे. चाचा मौसी मनोरमा सुदामा के बीच दुनिया धरम पुरान सब बांच लेंगे, हटिया मोकामा बिना टिकस घूम अपने को काबिल होसियार समझेंगे. सामनेवाला पसिंजर होसियारी झाड़ेगा तो उसको कयदा से लाइनों पे लायेंगे. बात-बेबात ज्ञान पेलेंगे और अपने को लगानेवाला पाल्‍टी भेंटा गया तो गरदन मोड़ आंखी मूंद लेंगे. गोड़ फैला के सीट छेंक लेंगे और मद्धिम-मद्धिम नाक बजायेंगे. फिर पांड़े जी की दलानी में जाकर बुलका चुआयेंगे बहुत टिराई मारे, पंडी जी, कछु हाथे नय लह रहा है. घर में एगो टरक होता त अच्‍छा होता पुलिस का सर्भिस में होते जमाना सुधार देते. संझा को हसरत से अंसारी का फटफटिया निरखेंगे. महेसरा को महतारी का गाली दे के कहेंगे चीलम बालो, ससुर, मन आज बहुते उदास होय रहा है.

(अनामदास जी, यह 'माल' कल के आपके पोस्‍ट का प्रसाद है. उत्‍साह में दौड़ते हुए जहां जितनी गलती होगी, उसका 'पाप' भी आप ही पर जाएगा..)

4 comments:

  1. लल्लन टाप माल लाये हैं महराज..

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  2. सोलह टका सही फरमाए मियां अभय जी तिवारी जी, एकदमै लल्‍लन टाप माल है। का कहने.....

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  3. का कह रहे हैं सर, एकदम झमाझम है. इसका मजा यही है इसमें कुछ गलत नहीं होता...पानी, बानी और छानी तो कोस-कोस पर बदलते रहते हैं. भाषा और करेंसी में एक बात समान है जनता जिसे स्वीकार कर ले वह खरा जिसे ठुकरा दे वो खोटा. आनंद आया पढ़कर.

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  4. waah !!! waah !!!
    ek baar fir se
    waah !!!
    sasuri waah hai ki band hi nahi ho rahi hai
    sachchi
    waah !!!

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