Monday, April 30, 2007

टीन के बक्‍से में बंद भेद..

एच की मौत: सात

दूध पीकर दामोदर दास सोने नहीं गया, खटिये के नीचे से टीन का बक्‍सा खींचकर उसके ताले की जांच करने लगा. शायद इस क्षण को और टालते रहने का अब कोई मतलब नहीं रहा, जिज्ञासा व जुगुप्‍सा शांत करने के लिए ही नहीं, अपने संधान के लिए भी बक्‍से की चीज़ों से गुजरना संभवत: पहला महत्‍वपूर्ण कदम साबित हो! बक्‍से व ताले का मालिक अलबत्‍ता दामोदर दास था लेकिन अंदर की निधि के असल स्‍वामी हजारी भैया थे- कागज-पत्‍तर व अन्‍य अगड़म-बगड़म जो मौका-बेमौका कभी भी उनके आ धमकने पर उनके पीछे-पीछे इस कोठरी में अपनी रिहाइश करता. हजारी भैया निकल जाते और उनकी चिंतायें, कलम-घिसाई, अख़बारी कतरन, पत्र व किताबी नोट्स चटाई व तकिये के नीचे, मेज पर ‘आर्यावर्त’ की पुरानी फाइल से लगे फड़फड़ाते शोर करते कि अरे, कहां निकल लिये.. और हमारा क्‍या? शरणार्थियों की तरह किसके भरोसे छोड़े जा रहे हो, हमारी व्‍यवस्‍था करो, भैया! इन विरह वेदनाओं की गुहार हजारी भैया को लौटाल नहीं लाती (एक बार निकलकर पीछे लौटना भैया का स्‍वभाव नहीं था). तो पत्‍नी जैसे गृहस्‍वामी व बच्‍चों के स्‍कूल निकल जाने पर घर की साज-संभाल व व्‍यवस्‍था करती है, दामोदर दास भैया के कागज-पत्‍तर की व्‍यवस्‍था नहीं करता लेकिन उन्‍हें सहेजकर एक जगह बक्‍से के ताले में बंद कर देता. कि अगली दफा जब भैया आएं और अपनी पुर्ची और कतरन की खोज में व्‍यथित होने लगें तो वह चुपके से उनके हाथ में ताले की चाभी रख दे कि हाय-हाय मत मचाइये, हम नहीं जानते आप क्‍या ढूंढ़ रहे हैं मगर जो कुछ भी ढूंढ़ रहे हैं सब वहीं अंदर पड़ा है!

माथे के पीछे हाथ बांधे जब भी भैया व्‍यथित दिखते, दामोदर दस चट सवाल करता- क्‍या चिंता कर रहे हैं? कुछ खो गया है, भैया? हजारी जैसे सोचते-सोचते काफी आगे निकल गए हों, सवाल सुनकर पीछे लौटे हों उस नज़र से दामोदर दास को देखते, फिर मुस्‍कराकर कहते- नलिन जी और विलोचन बाबू बार-बार सावधान करते रहते हैं, कि आप यह मत करिये, वैसा मत कीजिये.. समझ नहीं आता मेरे हित में मुझे सावधान रहने को ऐसा कहते हैं.. या कोई निहित स्‍वार्थ है जिसकी ये सारे लोग रक्षा कर रहे हैं. जिसके विरूद्ध किसी का कुछ भी ज़ाहिर करना इन्‍हें इतना अप्रीतिकर होने लगता है?.. तुम क्‍या कहते हो, दामोदर? आधुनिक हिंदी की पड़ताल का मेरा विचार तुमको भी गलत लगता है? रामचंद्र शुक्‍ल और रामविलास जी जो कुछ लिख गए हैं, उसका पुनर्पाठ और पुनर्परीक्षा समाज विरोधी है?.. मैं पूछता हूं समाज के किस वर्ग विशेष का विरोधी है! यही तो जानने की मज़ेवाली बात है! इसी के पीछे तो मैं इतनी भागादौड़ी कर रहा हूं! मगर विज्ञजन बार-बार मेरा हाथ पकड़कर चेताते रहते हैं हजारी, तुम बहक रहे हो! गलत लोगों की संगत में फंस गए हो! लोग आगे ठेलकर तुम्‍हारे कंधे से अपनी बंदूक का निशाना साध रहे हैं! ऐसी जगह जा रहे हो जहां जाने का तुम्‍हें कोई नैतिक अधिकार नहीं!

और फिर भैया हो-हो, ठो-ठो कर के देर तक हंसते रहते. दामोदर दास तेजी से इस चिंतन के अंतराल में स्‍टोव पर गुड़ वाली तैयार करके उनके आगे रखता. हजारी सुड़क-सुड़क के बिना दूधवाली गुड़ की चाय का रस लेते. चहकते हुए बोलते- यह समूचा कारोबार चार से चौदह गुणीजनों की बपौती बना हुआ है. उन्‍हीं की लेखनी और मुंह खोलने से हिंदी की दशा और दिशा तय होती है! सरकारी, अर्द्ध-सरकारी पुस्‍तकालयों में प्रकाशकों की सालाना बिक्री का सौदा तय होता है. कोर्स में किताबें लगाई जाती हैं. समाज में क्‍या विचार योग्‍य है और क्‍या नहीं इसका विवरण तैयार होता है! इस दायरे से बाहर कोई मुंह खोले तो ये पूरी कोशिश करते हैं कि उसको एकनॉलेज करने की नौबत ही न आय, और बात अगर खुल ही गई तो फिर ये गुट बांधकर, डंडा लेकर उस स्‍वर के खिलाफ सामूहिक रूप से टूट पड़ते हैं! तो यह तो है इनकी सामाजिकता.. और इसके विरुद्ध मैं सामग्री इकट्ठी कर रहा हूं तो नलिन जी समझाने लगते हैं अनैतिकता कर रहा हूं, समाज विरोधी हो रहा हूं!..

हजारी भैया धाराप्रवाह बोले जाते. इलाहाबाद, बनारस, पटना, दिल्‍ली के दसियों उदाहरण सुनाते; गजेटियर से कोई पत्र या इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी का कोई ज़ेरोक्‍स लहराकर अपनी चिंताओं के प्रमाणस्‍वरूप रखते. आधी से कम बात दामोदर दास के पल्‍ले पड़ती, मगर ज्‍यादा दुख इससे होता कि इतने जतन से सहेजकर रखी अपनी निधि की भैया खोज नहीं कर रहे; कमरे में नई पुर्ची और नई कतरनें फैला रहे हैं, दामोदर दास की जिम्‍मेदारी बढ़ा रहे हैं!

अपनी जिज्ञासा में दामोदर दास ने बक्‍से के अंदर की सामग्री की कभी खंगाल नहीं की. शायद इसके पीछे अवचेतन में यह भोला भय था कि बक्‍से के कागजों में बंद भैया के अजाने जीवन का जाने कौन गुप्‍त रहस्‍य छिपा हो जिसका उनकी गैर-जानकारी में भेद पाकर वह उन्‍हें छोटा कर जाएगा.. और जिस प्रसंग के बारे में भैया स्‍वयं कुछ न कहना चाहते हों, उसे चोरी से जान लेने का अपराध वह किसी भी सूरत में करना नहीं चाहता था. तो इस तरह बक्‍सा बंद रहा. बक्‍से के भेद बंद रहे. ताले की चाभी जो बड़े जतन से सहेजकर रखी गई थी, हजारी भैया के गायब होते ही वह भी गायब हो गई.. मगर अब इन सारी बातों का कोई अर्थ नहीं था. ताले से बक्‍से को मुक्‍त करके अंदर जांचना हजारी भैया के रहस्‍यों से ज्‍यादा उनकी गुमशुदगी का सूराग पाना था. यही सब सोचता दामोदर दास ने बक्‍से को टांग कर दीवार पर लटके बल्‍ब के नीचे रखा. चार कदम चलकर रसोई से संड़सी लाया और रात की खामोशी में तड़-तड़ बजा कर ताला तोड़ने लगा...

(जारी..)

4 comments:

  1. खूब भालो आशे....... बाबू मुशाय..

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  2. सारे बेनाम मेरे ही हिस्‍से आ रहे हैं.. यह तो गलत बात है, भाई..

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  3. मस्त माल है.. दामोदर का दुख बड़ा झीना है..

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  4. और गरियाओ बेनामों को . चूंकि वे आपको नहीं गरिया पाए सो अब आ रहे हैं लौट-लौट के टिप्पणी मारने . तारीफ़ इस लिए कर रहे हैं कि जब आदमी
    गुड़ देने चित्त होता हो तो ..........

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