Monday, April 16, 2007

अटकन बटकन दही चटाकन

समय के पुरालेखागार से

पवित्र पापी जी की एक और अविस्‍मरणीय रचना (बाल) जिसे बच्‍चे ही नहीं बड़े भी पढ़ सकते हैं (बशर्ते वे बड़े हो गए हों). खेद की बात है कि इसे खुद पर समर्पित करवाने के लिए श्री अविनाश दास कविवर पर जोर डालते रहे, और सफलता न मिलने पर अप्रगतिशील बताकर, उत्‍तरी बिहार के रास्‍ते स्‍मगल कराके (रचना को) नेपाल छोड़ आये. मगर सुखद आश्‍चर्य की बात है कि रचना नेपाल में भी बच्‍चों के बीच काफी सराही गई. बड़े अशिक्षा की चपेट में हैं इसलिए सराहने के सुख से वंचित रहे. लेकिन इस (रचना) ने फिर समाज (बड़े) को शिक्षा की उपयोगिता पर सोचने का मौका दिया और समाज (बड़ों) के बीच वापस आन्‍दोलन में वापसी का सवाल विचारणीय बना दिया है!



ता ता थइय्या ता ता थइय्या
खूब नचावन नाचो खिलवैया।

अटकन आगे भटकन पीछे
बायें त कब्‍बो दहिने फींचे।

रीत नीति न सऊर ठिकाना
नंगा आना नंगे जाना।

लंगी टंगी रूप नारंगी
हर हर हर जै बजरंगी।

बम सड़ाका धूम धड़ाका
बात बात में दे पटाखा।

कदुवन में मोती का झांसा
नियरे नाशा सगरे नाशा।

ता ता थइय्या ता ता थइय्या
खूब नचावन नाचो खिलवैया।

3 comments:

  1. नादान हैं..अंधे हैं..समझ के फाटक बंद करके सुत गए हैं..आँखन पे भ्रम की चरबी चढ़ गई है..और क्या कहें एक दूसरे के तेल लगाने से ही फ़ुरसत नहीं है..आप्की रचना कालजयी है..कमेंट के आँकड़े से उसका मोल मत तोलिये..इ सब कदुअन हैं मोती पे मूत देंगे..आप उनकी उपेक्षा के उपेक्षा कीजिये.. मस्त रहिये..

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  2. बहुतै जबरदस्त लिखे हैं . व्यंग्य की धार ब्लेड की तरहां काटती है . वह न होने पर तो यह 'छड़ा'(बांग्ला बूझते हैं न) हो जाता कविता के शीर्षक से जुड़ी स्मृति के कारण . बस छठी पंक्ति से 'अउरे' शब्द हटा दीजिए छंद अउर भी पक्का अउर फंटास्टिक हो जाएगा .

    एखुन माझे-माझे कोबिता लिखून दादा .

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  3. धोन्‍नोबाद, कोलकातार कोबिप्रान...

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