Tuesday, April 17, 2007

दस्‍तावेज़ी डायरी के सनसनीखेज़ पृष्‍ठ..

मोहन राकेश को भूल जाइये, अविनाश बांस को ट्राई कीजिये!

आज तक आप मुगालते में रहे कि राजपाल एंड संस ने मोहन राकेश की डायरी छापकर डायरी विधा के प्रतिमान स्‍थापित कर दिये. अजी, वे (राजपाल नहीं राकेश) होते कौन और क्‍या चीज़ हैं कि कर दिये? सुधा, विधा हिंदी के चार शब्‍द पढ़ लिये और होंठ में चुरुट दाबकर तीन काली-सफेद फोटो खिंचवा ली तो बड़ डायरी लिखवैया हो गए? और आपने मान भी लिया? अविनाश बांस क्‍या घास छीलते रहे? चुरुट नहीं पाइप पीते हैं और सुधा, विधा ही नहीं अनीता को भी जानते हैं! दुर्जन नहीं किंतु सज्‍जन पाठकों से विनम्र अनुरोध है कि श्री बांस को मोहल्‍ले वाले श्री दास से गड्ड-मड्ड न करें. श्री दास एनडीटीवी को बिलोंग करते हैं जबकि श्री बांस का तालुक्‍क दरभंगा और दलित साहित्‍य से समझा गया है!

17 अप्रैल, सुबह 09.22..
आज फिर चित्‍त अशांत है.. कंप्‍यूटर खोलकर सफेद स्‍क्रीन को तकता काफी देर तक उधेड़बुन में उलझा रहा.. कि उन किन विषयों पर लेखनी चलाऊं जिनकी सामयिक प्रासंगिकता भी हो और अच्‍छा विवाद भी जेनरेट कर सकें.. विवाद जीन में है, संस्‍कार में है.. उससे मुंह नहीं मोड़ सकता.. जैसे अनीता के प्‍यार और सेठ की नौकरी से (मुंह. नहीं मोड़ सकता.. मगर अपने अंतर्तम में क्‍या मैं सचमुच अनीता से प्‍यार करता हूं? दैहिक कामनाओं को इतने बड़े पद पर विराजना क्‍या अपने आधुनिक मूल्‍यों की अवज्ञा नहीं होगी? आय एम डेज्‍ड एंड कन्‍फ्यूज्‍ड).. लेखनी आगे नहीं बढ़ रही है.. अशांत चित्‍त और अनीता की कमनीयता चिंतन के आड़े आ रही है.. उदास होकर होंठों में पाइप सुलगा लेता हूं.. न्‍यू लेफ्ट रिव्‍यू के नीचे से निकालकर मनोहर कहानियां के पन्‍ने पलटने लगता हूं.. मगर मन रम नहीं रहा.. आंखें मूंदकर मेघदूत की पंक्तियों के रस में डूबने की कोशिश करता हूं.. मगर पंक्तियां याद नहीं आ रहीं.. ओ डैम इट!

17 अप्रैल, सुबह 10.29..
उद्वेलित मन से अनीता को फोन किया.. वह हमेशा की तरह घर और बिस्‍तरे में नहीं.. प्रिटी सरप्राइसिंग.. इज़ शी हैविंग एन इलिसिट अफेयर बिहाइंड माई बैक? कांट बी श्‍युअर ऑव गल्र्स दीज़ डेज़.. दे आर फायर्ड बाई सच स्‍ट्रेंज ड्रीम्‍स एंड डेसायर्स.. शायद अनीता के प्रति मेरे फेथफुल बने रहने का अभी या कभी कोई औचित्‍य नहीं रहा.. मुझे अपनी समस्‍त ऊर्जा सैक्‍स व सुंदरियों पर भ्रमित होने की बजाय साहित्‍य में केंद्रीत करनी होगी.. मगर साहित्‍य क्‍या सुंदरियों को प्राप्‍त करने का साधन भर नहीं?.. देयर आर सो मेनी क्‍वेस्‍चंस ऑव विच आई डोंट हैव एनी आनसर.. विचार करते हुए मानसिक उत्‍तेजना व उद्वेलन में सिर बजने लगता है.. शायद सांसारिक दबावों व प्रश्‍नों से मुक्ति का एक ही मार्ग है कि मैं पूरी तरह साहित्‍य रचने में डूब जाऊं (हंस के यादव ने अभी भी डेढ़ हजार का चेक क्लियर नहीं किया है. आई शुड रिमाइंड हिम वन्‍स मोर. ही इज़ सच अ मीन यादव!).

17 अप्रैल, सुबह 11.11..
पेपर में स्‍पोर्ट्स का पन्‍ना देख रहा हूं जब दरवाजे की घंटी बजी है. बीच क्रियेटिविटी में व्‍यतिक्रम के ख्‍याल से बेचैन होने लगता हूं.. अनीता फूलों का बूके लेकर आई है.. आई एम टच्‍ड एंड वरीड एट द सेम टाईम.. इज़ शी एक्‍सपेक्टिंग थिंग्‍स फ्रॉम मी? आई कांट हैव दोज़ काइंड ऑव कमिटमेंट्स.. नॉट एट दिस स्‍टेज ऑव माई करियर.. हम दोनों वहशियों की तरह लवमेकिंग करते हैं फिर वह किचन में कॉफ़ी बना रही है वेन वी स्‍टार्ट आर्ग्‍यूइंग.. दैन इट टर्न्‍स इन टू अ ब्‍लडी फाइट.. आई फील सिक ऑव हर.. क्‍या रचनाकार एक शांत सुबह तक का हक़दार नहीं?.. दैन वी मेक अप.. डिसाईड टू गो टू सीपी फॉर अ क्विक स्‍नैक.. मुंह में पाइप दबाये मैं इतमिनान से ड्रेस अप होता हूं.. अनीता शर्ट का बटन लगाते हुए मेरे गाल चूम लेती है.. दिमाग़ में ढेरों रचनायें गूंज रही हैं जिन्‍हें लिखने के लिए मुझे पहाड़ या दरभंगा कहीं जाना होगा.. आयम सिक ऑव सीपी एंड डेली (दिल्‍ली)..

(अप्रगतिशील दस्‍तावेज़ी लोकमाला, खंड एक, भाग दो. लेखक के पैसे से प्रकाशित)

4 comments:

  1. पहले 'कोबी' जी का फोटू उतारे . फोटू त हम बोलते हैं कोबी जी तो फ़ूत्कार अउर चीत्कार करत रहे की ई सब लिखने पर समस्त कोबी-कुल का मरजाद जाता है अउर पक्का-पक्की मान-हानि का मामला बनता है. तनिक सावधान रहिएगा रात-बिरात , कोबी जी मारे गुस्सा के खौल रहे हैं .

    अब आप ऊ गद्यकार जी की अन्तरात्मा का स्कैन अउर हिरदै का ईसीजी रिपोर्ट ला कर धर दिये हैं . कोबी-लेखक लोग मुंह पर कपरा डाल के भागा-भागा फिर रहा है . सुना है 'जॉइन्ट ऐक्शन' के लिए मोर्चा बांध रहा है कोबी-लेखक . चंदा-चिट्ठा जमा करना स्टार्ट कर दिये हैं ऊ सब . लटेहर वाला ऊ किकियाने वाला कोबी मिला रहा अरे ओही जो लम्बी-लम्बी लट रखता है कम्पनी का जनाना का माफ़िक.

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  2. लेखन के पतनशील पहलू के विवरण में ज़रा और उतरिये.. ज़रा और..

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  3. महाशय, आपने जिनके बारे मे लिखा है वो मेरे बडे भ्राता है, और जहान तक मै समझता हूँ इस पत्र पर सिर्फ उनका और उनकी पत्नी का ही अधिकार है... [:P](इस स्माइली को मेरे औरकुटीया मित्रगण समझ जायेगे)..
    और रही बात मेरी तो मै ठहरा निरा मूर्ख, दास और घास का चक्कर ज्यादा कुछ मेरे पल्ले नही पर रहा है... मै तो बस यू ही आपके blog पर टहल करने पहूंच गया था... :)

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  4. काहे अभय भाई, आप तो एकदमे पीछे पड़ गये हैं, उतरने-चढ़ने दीजिये... थोड़ी कसरत ही हो जायेगी।

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