Sunday, April 22, 2007

हिंदी कवि: एक क्रांतिकारी हस्‍ती का क्रांतिधर्मी परिचय

एक निबंध: (फिर वही) माध्‍यमिक शिक्षा में कम नंबरों से पास हुए छात्रों के लिए उपयोगी

लेखक: देवीप्रसाद, बीए, बीएड, लघु पत्रिकाओं के अनुभवी व मूर्धन्‍य कवि

हिंदी का कवि हिंदी में कवितायें लिखता है. हिंदी का कवि कवितायें लिखने के साथ-साथ कवितायें पढ़ता भी है (बशर्ते उसे दोस्‍तों ने, या उभरती हुई कवियत्री, या दो हाथ दो पैर वाली किसी भी लड़की ने लिखी हो). हिंदी का कवि सिर्फ हिंदी में लिखी कवितायें ही पढ़ता है. यह बात पूरी तरह से गलत, बेबूनियाद और हिंदी विरोधियों का षड्यंत्री दुष्‍प्रचार है कि वह अंग्रेजी, जापानी व अन्‍य विदेशी भाषाओं में छपी कवितायें पढ़ता है. गलत है. मलयालम में छपी तक नहीं पढ़ता. हिंदी कवि की मेज की दराज में छिपाकर रखी वर्ष भर प्रयोजन में आ सकने वाले विषयों की एक लिस्‍ट होती है जिसमें सामयिक प्रसंगों से लेकर चिरकाल को छेड़ते, झिंझोड़ते- नारी, वायु, नदी, समय, देश, चि‍ड़ि‍या, ईश्‍वर- आदि-इत्‍यादि वे सभी संभावित विषय-क्षेत्र होते हैं जिसपर फुरसत व तसल्‍ली से समय-समय कवि अपनी लेखनी चलाता उत्‍प्रेरक कविकर्म उत्‍पादित करता रह सके और हिंदी क्षेत्रों की अलग-अलग लघु पत्रिकाओं को दे-देकर उपकृत करता रहे. लघु पत्रिकायें उन्‍हें ले-लेकर उपकृत होती भी रहती हैं. हिंदी का कवि चुनावी नतीजों व उड़ीसा में भुखमरी के आंकड़ों की उस बेचैनी से प्रतीक्षा नहीं करता जिस बेचैनी से वह बेगुसराय व बांसडीह में छपी लघु पत्रिकाओं के प्रकाशन की करता है, और तबतक करता रहता है जबतक पत्रिका हाथ में नहीं आ जाती. हाथ में आते ही सबसे पहले कवि मुंह में खैनी, तंबाकू, पान जैसी चीज़ दाबकर पत्रिका में छपी अपनी कविता खोजता है और खैनी, तंबाकू, पान के साथ कविता का रस लेता है. किसी कारणवश अगर पत्रिका अपने ताज़ा अंक में कविकर्म को प्रकाशमान न कर सकी हो तो हिंदी के कवि का रसास्‍वादन सूखकर भयानक वज्रपात में परिणत हो जाता है, और उसी को नहीं उसके परिवार, दफ्तर और आसपास के समाज सबको एक वीरान उदासी की जकड़ में ले लेता है. अदरवाइस हिंदी का कवि अपने समाज, देश, काल की चिंताओं, झमेलों से बहुत हद तक स्‍वतंत्र, स्‍वायत्‍त व सुखी प्राणी होता है. कवितायें अकसर वह गुनगुनाकर भी पढ़ता देखा गया है. उसके सामने समाज, अर्थशास्‍त्र व अन्‍य ज्ञान की पुस्‍तकें रख दीजिये, देखिये, सारा गुनगुनाना भूलकर कैसे वह भर्र-भर्र उल्टियां करने लगता है. हिंदी कवि के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए इस पर विशेष ध्‍यान देने की ज़रूरत है कि हिंदी कविता से अलग उसके सामने और किसी भी तरह की पठनीय सामग्री न रखी जाय. सामाजिक दबाव में बहुत हुआ तो कहानी, उपन्‍यास, नाटक की एकाध चीज़ पढ़वा लें, मगर समाजशास्‍त्रीय विषयों के बुरे असर से उसे कतई दूर रखें. थाली भर भात खाने के बाद दोपहर में उसे उचित मात्रा में सोने का अवकाश दें. जिला व प्रांतीय स्‍तर के विविध चिरकुट आयोजनों में निमंत्रित करके कवि को अपना कुर्ता-पजामा ही नहीं कवि छवि को भी मेंटेन करने का सुअवसर दें.

6 comments:

  1. मैं आपके कवि मित्रों से कहूंगा- आपसे सावधान रहें। उन पर नज़र रखी जा रही है। (लेकिन मैं तो फंस गया हूं, मेरा क्‍या होगा!!!)

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  2. पहले तो अविनाश ये ग़लत फ़हमी दूर करें कि उनकी कवि जैसी कोई छवि है.. दमकल विभाग का काम काज जिन लोगों के उपकार से चलता है.. वैसी आकृति जगाते हैं आप जन मानस में..कवि बनने के लिये आपको परिश्रम करना होगा..उस मोर्चे पर आप लगातार पिछड़ रहे हैं.. प्रमोद जी तो फिर भी बीच बीच में अट्कन बटकन लिख कर तस्वीर पर पत्थर पड़ने से रोक लेते हैं..लेकिन आप भी संकट में हैं..
    कवि होने के लिये बीच का रास्ता पकड़ना सीखिये.. दूसरों के ब्लॉग पर प्रतिक्रिया भी कीजिये तो गैर विवादास्पद तरीके से.. अगर विवाद में आपकी हवाई चप्पल का अगला हिस्सा गया तो पिछला ऐसी फटकार मारेगा कि आपका पूरा पिछवाड़ा माटीमय हो उठेगा..फिर कौन आयेगा आपकी कविता पर 'क्या बात है'.. 'अच्छी है हमेशा की तरह'..(या आपकी ही कविता का एक अंश उठाकर उसके नीचे)'सही कहा है'..ऐसी प्रतिक्रियाएं करते हैं कवि दूसरे कवियों की कविताओं पर.. उनसे कुछ सीखिये..

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  3. मैं इसे बिहार बोर्ड में लागू करवाने वाला हूं । निबंध सही है । हिंदी के कवि अविनाश का जो होना था हो गया है । यही असली अप्रगतिशील निबंध है । इसके बाद सबके किए धरे पर पानी फिरने की उम्मीद बढ़ गई है

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  4. हंसी-हंसी में कितनी गंभीर और गहरी बात कह गए प्रमोद जी। बहुत सही चित्रण हैं। हिंदी के हर कवि को पढ़वाया जाना चाहिए उसका यह स्‍व-चित्र।

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  5. मेरा भी मन किया कि अप्रगतिशील साहित्य में अपना कुछ योगदान दे ही डालूं

    जिन्दा रहने के लिये रोटी खाना जरूरी है वैसे ही कविगिरी करने के लिये लिये कुछ भी लिखते रहना जरूरी है . उतना ही जरूरी है एक नये (उभरते ?) चिट्ठाकार कवि का दूसरे की कविता की वाह वाही करना. कवि के कर्म और एक पढ़े लिखे इंसान की समझ के बीच के अंतर से ही टिप्पणी निकलती है. कुत्ता , बिल्ली , बंदर और बकरी के अलावा भी आप चाहें तो किसी पर भी कविता कर सकते हैं. कुछ नहीं तो "अटकन बटकन " तो है ही ना...

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  6. "...मैं इसे बिहार बोर्ड में लागू करवाने वाला हूं ..."

    तो बाकी इंडिया ने कौन सा गुनाह कर दिया है? मेरे एमपी का क्या होगा? सीबीएसई बोर्ड में भी लागू करवाने की भी सोचें भई!

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