Friday, April 27, 2007

रुग्‍ण प्रेमी, क्षुब्‍ध नायक

एच की मौत: छह

कॉलेज के फाटक से लगे ठेले पर लड़कियां गोलगप्‍पे खा रही थीं. लैब की खिड़की के नीचे एक लड़का पेशाब कर रहा था. स्‍टैंड के साइकिलों के बीच शुक्‍ला जी की सेकेंड हैंड कार चमक ही नहीं रही थी, आसपास टहलता भोला वहां पहरा भी दे रहा था. सब अनदेखा करता उद्वि‍ग्‍न-चित्‍त दामोदर दास सीधे कक्षा गया और भारत-भारती का पाठ दोहराने लगा. लड़के उसके पढ़ाने को अनदेखा कर पीरियड का समय मारते रहे. कक्षा निपटते ही चूड़ि‍यों और हरे सलवार-कमीज़ में एक लड़की भागती दामोदर दास के पीछे आई और हाथ में एक लिफाफा थमाया. लजाने लगी जैसे प्रेमपत्र दे रही हो. दामोदर दास घबराकर लिफाफा खोलने लगे तो कानी उंगली दांत के नीचे दाबकर लड़की मुस्‍कराते हुए बोली- मैरिज का इनविटेशन है, सर.. क्‍लास में आज लास्‍ट डे आई हूं. उनके घरवाले कह रहे हैं अब कालेज की क्‍या ज़रूरत है!..

स्‍टाफरुम में भी इनविटेशन ही बंट रहा था. भूगोल की लीना यादव अपनी शादी का पीला लिफाफा घुमा रही थीं और सहकर्मी अध्‍यापकों की छेड़छाड़ का आज बुरा नहीं मान रही थीं. मुंह में खैनी दाबे वीके थपलियाल ने निर्लज्‍जता से कहा- यह अच्‍छी बात नहीं, लीना जी, हमारी बिरादरी छोड़कर जल विभाग में जा रही हैं. आपके चक्‍कर में बिचारे दामोदर दास इतने अर्से से कुंआरे बैठे रहे और आप पल्‍ला झाड़ के फुर्र हो रही हैं?

मुस्‍की मारके रामधनी श्रीवास्‍तव बोले- सोच-विचार के बात किया करो, थपलियाल. कास्‍ट-फास्‍ट कुछ होता है कि तुम किसी को किसी के साथ फंसा दोगे? लीना जी जहां जा रही हैं वह उनके रूप और गुण के एकदम्‍मे अनुरूप है! दामोदर जी ठंडी आह भरके दो-चार महीने में नार्मल हो जाएंगे. वैसे भी व्‍याह के लिए बूढ़े नहीं हो रहे हैं अभी!

थपलियाल, पांडे सब हें-हें करके हंसने लगे. लीना यादव भी मुस्‍करा दीं. दामोदर दास के सामने कार्ड रखकर बोलीं- आप ज़रूर आइएगा, मिस्‍टर दास. सिरवास्‍तव जी की बातों का बुरा मत मानिये.. आपको हज़ार दर्जा अच्‍छी वाईफ मिलेगी. हमसे ज्‍यादा सुन्‍दर और कविता समझने वाली!

दामोदर दास ने जवाब नहीं दिया. कार्ड पर सरसरी नज़र डालकर बोले- क्षमा कीजियेगा, आपके विवाह में आना हो नहीं सकेगा, महीने भर की छुट्टी पर बाहर जा रहा हूं..

थपलियाल खिड़की पर खैनी थूकने गए थे. एकदम-से कंधा मोड़कर बोले- लो, यहां प्रेयसी का व्‍याह भी नहीं हुआ और देवदास जी अपने लिए कनिया ढूंढ़ने निकल पड़े? यह तो प्रेम का उचित समपर्ण भाव नहीं है, बंधु!

इस बार दामोदर दास ने जवाब दिया- हां, अभी तो इस कालेज के अध्‍यापकों को आपसे बहुत कुछ सीखना है!

स्‍टाफरूम में तत्‍क्षण सन्‍नाटा छा गया. लीना यादव भी सकते में आकर दामोदर दास को देखने लगीं. कि ऐसे खुशगवार मौके पर इस तरह की टिप्‍पणी करने की क्‍या ज़रूरत थी. पृष्‍ठभूमि में पिछले महीने वीके थपलियाल द्वारा कॉलेज में किया गया एक कृत्‍य था जिस पर प्रकाश डालने का यह उपयुक्‍त अवसर नहीं. लेकिन दामोदर दास ने वांछित असर पैदा कर दिया था कि लोग उनके बारे में टिप्‍पणी न करें. लोग चुप ही नहीं हो गए, उसे असामाजिक और अछूत की तरह भी देखने लगे. ज्‍यादा असह्य होने लगा तो मन ही मन खुद को गालियां बुदबुदाता दामोदर दास कमरे से बाहर निकल आया. क्‍यों इस तरह करता है वो? दो महीने पहले एक भूतपूर्व छात्र के हाथ पिटने की नौबत आ गई थी तब इन्‍हीं थपलियाल ने बीच पड़कर उसकी रक्षा की थी, और आज सबके बीच उन्‍हें ज़लील कर दिया! मजाक से निकलने का यही रास्‍ता जानता है कि सामनेवाले के मुंह पर तमाचा मार आए?.. क्‍या सचमुच इतना असभ्‍य है, असामाजिक है?..

***

रात में दूध गर्म करते हुए दामोदर दास ने गंभीरता से विचार करना शुरू किया कि आनेवाले दिनों में कैसे चीजें आयोजित करनी है. कहां-कहां जाना होगा, पास में कितना पैसा होना चाहिये इत्‍यादि. मगर उसके सोच लेने भर से महीने भर की छुट्टी थोड़े मिल जाएगी! शुक्‍ला जी ने मना कर दिया तब? वैसे भी वह उससे अप्रसन्‍न और दुखी हैं- वह भी एक समूचा अलग प्रसंग है!

भगौने के दूध के गुनगुन में दामोदर दास को शुक्‍ला जी की जगह अब हजारी भैया की छवि दिखने लगी. कमरे में उनकी हंसी भर गई. चहकती हुई भैया की आवाज़ गूंजी- पटना में नलिन बाबू पांडुलिपि पढ़ने के बाद लौटाते हुए एकदम असहज हो गए. बोले कहां से ये सब सूचना लहा लाये हैं? इसको मत छपवाइये! सब हिंदीवाले आपके दुश्‍मन हो जाएंगे!

दामोदर दास ने बुरा मानते हुए कहा था- पूरी दुनिया को पढ़वा लीजिये! बस मुझी को वंचित रखिये!

हजारी भैया हो-हो हंसने लगे थे- तुम हमारे लिए नलिन-सलिन थोड़ी हो! तुम्‍हारे हाथ में छपी हुई किताब आएगी. पहली कापी! पहले पाठक होगे तुम!..

इसके बाद दो बार और मुलाकात हुई. मगर दामोदर दास उस अभिशक्‍त रचना का पाठक नहीं हो सका. किताब छपकर नहीं आई. हजारी भैया नहीं आए!..

(जारी..)

1 comment:

  1. देखिये आज फिर आपने भूखे पेट उठा दिया..धीरे धीरे खुराक बढ़ती जा रही है..और आप एक एक रोटी घटाते ही जाते हैं.. एक दिन जरा भरपेट खिलाइये कि हम कहें आई दादा .. इत्ता ढेर.. आदमी समझे हो कि गोरू..

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