Friday, April 20, 2007

एक दिन निकल जाऊंगा

आप समझते नहीं हैं, प्रमोद जी, बड़ी मुश्किल है. अड़चन है उलझन है तंग आ गया हूं. रोज़ सिर कूटता सोचता हूं मगर रास्‍ता नहीं सूझता, शर्मिन्‍दा होकर दोस्‍त कहता है. धीरे-धीरे देखिये एक दिन निकल जाऊंगा इस झमेले से, भूल जाऊंगा घर लात मार दूंगा नौकरी को चल पड़ूंगा झोले में दो जोड़ी कपड़े और तीन किताबें लेकर. किस डोर से बंधा हूं फिर मेरी ज़रूरत क्‍या है! जहां मरजी होगी जाऊंगा, किसी नीम के नीचे किसी नदी के किनारे सो जाऊंगा जिधर इच्‍छा होगी. भूख लगेगी मांग लूंगा दो रोटी मटके का पानी ऐसा क्‍या है. आखिर करोड़ों-करोड़ जी ही रहे हैं देश में, उनसे अलग क्‍यों हूं. जवान हूं जानता हूं गरीबी. घास पर लेटकर रात को तारे देखने की बड़ी इच्‍छा है, प्रमोद जी, अनजाने लोगों से दोस्तियां बनाना चाहता हूं, उनके क़ि‍स्‍से कहानियां सुनना चाहता हूं समझना चाहता हूं हो क्‍या रहा है इस देश में. मालूम नहीं किस वजह से फंसा-अटका पड़ा हूं दिल्‍ली में, प्रमोद जी. दारू और ऊबी दोस्तियों से अलग आखिर बचा क्‍या है मेरे लिए इस शहर में?

4 comments:

  1. One thing I could'nt understand,why the restless soule of this interviewee, wants to experience the life only through poverty,what is the virtue in poverty and beggary?

    ReplyDelete
  2. जैसी सहज, जमीन से जुड़ी जिंदगी की वो बात कर रहा है, गरीबी उसमें निहित है। बेनाम सज्‍जन, क्‍या आप नहीं जानते, इस देश में धन कैसे और किन रास्‍तों से कमाया जाता है। फिर चाहे वो अध्‍यापन या कला के जरिए ही पैसा कमाना क्‍यों न हो। उस समृद्ध जिंदगी की अपनी शर्तें हैं, जो आपकी आत्‍मा से इसकी कीमत वसूलती है, जिसमें दारू और उबी हुई दोस्तियॉं निहित हैं। दोनों में गहरा अंतर्विरोध है।

    ReplyDelete
  3. दोनों बेनामों के पास सच का एक-एक छोर है . या कहें दोनों के पास सच का एक-एक टुकड़ा है. सच तो आज 'रूबरिक' की तरह है .

    ReplyDelete
  4. Uday prakash kee kavita se ek line yaad aa gayi"Ek din nikal jaaoonga"
    Kripaya spasht karein kya Udai Jee in dinon aese hain?
    Irfan

    ReplyDelete