Thursday, April 12, 2007

हिंदी: एक जासूसी उपन्‍यास

हिंदी में पंत और प्रेमचंद को सम्‍मान मिला है गोपालदास गहमरी को नहीं. राष्‍ट्रीय पुस्‍तकालयों में आपको रमेशचंद्र शाह जैसे रोतड़ुओं का रूदन मिल जाएगा, गहमरी ग्रंथावली खोजते रहिये, मिलेगा नहीं. क्‍यों? क्‍योंकि छापने की बात आयी तो समाज ने हमेशा उसको अप्रगतिशील साहित्‍य बता कर पैर पीछे खींच लिए. हिंदी का रेमंड शैंडलर और डेशियल हैमेट पैदा तो हुआ लेकिन समाज के हिंसक प्रगतिशील मूल्‍यों की बलि चढ़ गया. दोस्‍तो, क्‍या हम सिर्फ दलितों और स्त्रियों के पक्ष में आवाज़ उठाते रहेंगे? समलैंगिक और जासूसी लेखन पर हमारा ध्‍यान अब नहीं तो कब जाएगा? यह चंद सवाल हैं जिस पर समाज को बैठकर चिंता करनी है. हम चिंतित होते हुए तीन नींद और सात कप चाय पी चुके, अब काम करने जा रहे हैं. इससे पहले कि वाणी और राजकमल तक बात जाये और वे इस अनोखे आयोजन को ले उड़ें, हम प्रह्लाद चंद्र दास की अप्रतिम, अलिखित जासूसी उपन्‍यास की भूमिका छापने जा रहे हैं. पत्‍नी को रसोई, बच्‍चों को बेडरुम और टीवी को टेबल पर बंद कर दीजिये. मूर्ख दोस्‍तों को डांटकर घर से खदेड़ दीजिये और चश्‍मा पोंछकर कंप्‍यूटर से चिपक कर बैठ जाइये, क्‍योंकि आपके हाथ में महज़ एक नयी किताब नहीं पीसी दास की रगों में दौड़कर वर्ड फाईल में अनुदित हुआ सुलगता बारूद है!
द कर्टन रेज़र

प्रह्लाद चंद्र दास

मुझे मालूम नहीं, भाषा कहां से आती है. अगर किताबों से आती, तो ज्‍यादा पढ़े-लिखे लोगों के पास ज्‍यादा कायदे से आती. विद्वानों के रचे छंद आज संस्‍कृत विश्‍वविद्यालयों की धूल खाती लाइब्रेरी में सो रहे हैं, कबीर ज्‍यादा गाये जा रहे हैं. कबीर के पास पढ़ने-लिखने की सहूलियत नहीं थी, लेकिन इतने उतार-चढ़ाव की ज़ि‍न्‍दगी किसी को भी कहने की ज़ि‍द दे देती है. कबीर ने जो कहा, वह आज भी हम कह रहे हैं.

तुलसी कबीर के समकालीन थे. व्‍यवस्‍था को लेकर दोनों की अलग-अलग समझ थी, अलग-अलग व्‍यवहार थे, शिक्षा का संदर्भ भी अलग-अलग था. लेकिन बाद के समाज में दोनों की स्‍वीकार्यता का पलड़ा बराबर है. यह विचित्र है कि ब्राह्मण मानस के परिवारों में दोनों बांचे जाते हैं, गाये जाते हैं. इस पर शोध होना चाहिए.

खुसरो हिंदी में लिखते थे. विद्यापति मैथिली में. दोनों थोड़ा आगे-पीछे हुए. दोनों का काल कुछ इतिहासकार एक भी बताते हैं. खड़ी बोली हिंदी पहले कवि खुसरो गये, तो विद्यापति हिंदी के आदिकवि कहलाये. कोर्स की किताबों में तो ऐसा ही पढ़ते रहे. यानी वो भी हिंदी थी, जो दरअसल हिंदी नहीं थी. इस तरह मध्‍यकाल के सभी कवि, जो संस्‍कृत से अलग अभिव्‍यक्ति की अपनी-अपनी भाषा चाहते थे, वे हिंदी बना रहे थे. कहन, शिल्‍प और शब्‍दों की विविधता का वैसा युग फिर नहीं आया.

उर्दू इन तमाम विविधताओं भरी हिंदी में नफासत और पाकीज़गी के मध्‍यवर्गीय बोध के साथ मौजूद थी. लेकिन भारतेंदु भाषा के स्‍तर पर थोड़ी मुश्किल लड़ाई लड़ रहे थे. ऐसी हिंदी बना रहे थे, जो देशज बोध का प्रतिनिधित्‍व करती लगे और हिंदू राष्‍ट्रवाद का भी. छायावादी कवियों का भाषा व्‍यवहार भी कुछ ऐसा ही था.

नयी कहानी और नयी कविता पूरे वाक्‍यों की भाषा लेकर आयी. ये पूरा वाक्‍य समाज से आया. समाज का मर्म इन वाक्‍यों में आया, तो समाज के शब्‍द भी आये. लेकिन मिज़ाज में वह खड़ी बोली हिंदी ही रही. रेणु जैसे अपवाद भी हालांकि इस नयी भाषा से लोहा ले रहे थे. एक नयी भाषा, जो अब तक बरती जा रही है, उनमें रेणु कम हैं, मोहन राकेश और रघुवीर सहाय ज्‍यादा हैं.

अगर ये तीनों लेखक नहीं होते तो आज हिंदी कैसी होती? प्रह्लाद चंद्र दास ने अपनी डायरी में ये नोट्स लेते हुए सोचा कि उसकी हिंदी कैसी है. कहां से आयी है. प्रह्लाद चंद्र दास साहित्‍य में एक ऐसी हिंदी चाहता है, जिसको वो दस लोगों के बीच सुनता हो. इसके पीछे उसकी मंशा यही है कि वह भी कुछ कविता-कहानी लिखना चाहता है (कहते हुए शर्मा रहा है लेकिन सच्‍चाई है वह तीन सौ पेजी वृहत उपन्‍यास लिखना चाहता है!). लेकिन जो लिखना चाहता है, उसके बारे में सोचता है कि दस लोगों के बीच सुनाये, तो वे उसकी हंसी न उड़ाएं. इसलिए वह अपनी हिंदी के लिए अलग अलग वक्‍त की हिंदी की खोज में लगा है. ये नोट्स उसकी खोज की पूर्व पीठिका है. ..

(जल्‍द ही आ रहा है...)

3 comments:

  1. बस यह बताने के लिए टीप रहा हूँ कि पत्नी, बच्चों, टीवी, और मूर्ख दोस्तों का इंतज़ाम कर दिया है और बस चश्मा पोंछ रहा हूँ. आप शुरू कीजिए.

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  2. हम उपन्यास के उम्मीद में है.. हिन्दी ब्लॉग के पहले किस्तवार उपन्यास लेखन के लिये आप उचित पात्र मालूम होते हैं.. अज़दक तुम संघर्ष करो.. हम तुम्हारे साथ हैं.. हिन्दी के प्रति आपकी निष्ठा और समर्पण देखकर..अगर आज म.श्य.जोशी जीवित होते तो मारे जलन के कुछ कर बैठते..

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  3. बजा फ़रमाया है प्रमोद भाई!

    कुछ खास किस्म के लेखन और विधाओं को उचित स्थान और मान्यता नहीं मिली हमारे यहां . ज़रूर कुछ सामाजिक-सांस्कृतिक कारण रहे होंगे, पड़ताल ज़रूरी है .

    रही बात उर्दू की तो आपने लिखा है कि 'उर्दू इन तमाम विविधताओं भरी हिंदी में........मौज़ूद थी' , पर बात सिर्फ़ मौज़ूदगी की नहीं है . अपने निर्माण के समय और ब्रज भाषा से ट्रांजीशन और खड़ी बोली हिंदी की निर्मिति के समय स्वयं उर्दू ही 'हिंदवी' या 'हिंदी'या 'रेख्ता' थी . उर्दू नाम तो बाद का है .

    जहां तक बोलियों की बात है उन्हें बचाए और बनाए रखने सारे जतन होने चाहिए . उन्हें हिंदी संसार में मुखर होना चाहिए.पर उन्हें हिंदी के खिलाफ़ खड़ा करने की भूल नहीं करनी चाहिए. हिंदी आज एक भाषा नहीं बल्कि भाषा-समुच्चय है. बोलियां हिंदी के उपवन में ही अपनी खुशबू बिखेरें तो अच्छा है वरना हिंदी के कोढ़ में खाज भी हो जाने का खतरा है . वही हिंदी जो आपके अनुसार पियराए कागज़ की नाव है और संकरे नाले में बह रही है .

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