Sunday, April 22, 2007

हिंदी को बचाओ

पैसे की गति क्‍या है बाज़ार कहां जाता है. कृषि किधर है खाद, खनिज, संसाधन, रोज़गार एस चांद एंड बुक्‍स के किन बक्‍सों में बंद क्‍या पहेली हैं. क्‍या बुद्ध, बनारस और बरसात पर लिखनेवाले कवियों ने इन पर कवितायें लिखीं. संपादक ओबीसी के पक्ष और विपक्ष में राय रख रहे हैं म्‍युचुअल फंड और इन्‍वेस्‍टमेंट बैंकर का धुंधलापन कौन साफ करेगा. सेंसेक्‍स का उतार-चढ़ाव ठीक है देश में धन आ रहा है की धमक है मगर गरीबी का क्‍या. रेल की पटरियों के बाजू की झोपड़पट्टि‍यां कहां जा रही हैं. उत्‍तर आधुनिकता पर कॉलम पर कॉलम भरे जाते हैं सुधीश, छोटा भाई देश को चौकन्‍ना किये रहता है मगर आर्थिक सूचकांकों पर कुछ नहीं बोलता. हम अंधेरे में हैं हिंदी के सुधी संपादक गण, बेचारे हैं मगर तुम्‍हारे ही तो हैं, ज्ञान का पेट्रोमेक्‍स नहीं लालटेन ही बरो ज़रा तेल भरो. हे पागलदास को रोनेवाले कवि हम भी यहां पागल हुए जा रहे हैं बनारस और बचपन से निकलकर सामने आओ, सर्वशिक्षा अभियान को कूचकर सरकार आगे निकल जाये हम पीछे छूट जायें इसके पहले हमको इस अशिक्षा के पागलपने से बचाओ. मकान और धन नहीं ज्ञान मांग रहे हैं, कवि, देव के आशीष, कुछ तकनीकी रास्‍ता दिखाओ. ओ बाबा, एइ रोकोम चोलबे ना, हिंदी को बाचाओ.

4 comments:

  1. अज़दक नाम देख कर मैं चौंकी थी। आज सुधीश नाम भी आपके लेख मे कटाक्ष का शिकार बना है।
    सुधीश पचौरी ही को इंगित है ना !
    अज़दक नाम से वे ही लिखते हैं जनसत्ता में।

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  2. ऐसे आप चौंकिये मत, सुजाता जी. पचौरी, प्रमोद या अन्‍य किसी का अज़दक पर कापीराइट नहीं है. ब्रेख्‍त के नाटक 'खड़ि‍या का घेरा' का एक चरित्र है, जो नाटकों की दुनिया से परिचित हैं समझते हैं. रही बात कटाक्ष और शिकार बनाने की तो शिकार बने लोग क्‍या शिकार खेलने जायेंगे..

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  3. हिंदी वाले बंग्‍ला बनवाने, कार खरीदने, बिटिया का जाति में ब्‍याह करवाने और बेटे को अमरीका भेजने की सेटिंग में व्‍यस्‍त हैं, और आप उनसे हिंदी को बचाओ की गुहार लगा रहे हैं। अपना सेटिंग छोड़ चले हिंदी को बचाएं, अपनी ही दुकान पर ताला लगवाएं।

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  4. बघेरा आया, बघेरा आया, की तरह बचाओ, बचाओ की बेकार झूठी पुकार न लगाएँ, नहीं तो किसी दिन सचमुच बघेरा आ जाएगा तो कोई बचाने नहीं आएगा।

    हिन्दी को न कोई रोक पाया, न पाएगा। हिन्दी को हिन्दीवाले ही बिगाड़, पिछाड़ और लताड़ रहे हैं। पहले उन्हीं से खुद को बचाएँ।

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