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Apr 7, 2007

घर कहां है?



जंगखायी साइकिल है. घड़ी है काठ का घोड़ा है
पुरानी कुर्सी है. अलगनी पर कपड़े ताक
पर सुखसागर और तखत पर बाबूजी हैं
बहता नल है ठहरी शाम है.

मैं जंगले से झांककर बुदबुदाता हूं
’घर कहां है?’

..और लौट जाता हूं.


सतायी हुई

तुम कहती हो रोज़-रोज़ का रोना बंद करो
माथे पर हाथ और हाथ का किताब बंद करो
फ़ोन पर फुसफुसाना और
रात का बुदबुदाना बंद करो

जांगर हिलाओ आदमी बनो
बाहर जाओ चार पैसा कमाओ

हमको सताना बंद करो


दोस्‍त

तीन हैं तेरह हैं तेईस हैं

दोस्‍त एक नहीं है.


ऊपर: रेनातो गत्‍तुसो की कृति, स्टिल लाइफ इन स्‍टुडियो, 1962.

5 कमेंट:

अविनाश said...

कविता की शैली में अच्‍छा स्‍केच। पिता हिंदी कविता के पुराने विषय रहे हैं। सताई हुई आम समस्‍या रही है। आखिर में अच्‍छे मुहावरे का ईजाद है। कुल मिला कर अच्‍छा तीन तेरह जमाया है।

अभय तिवारी said...

बा‌ऽऽऽऽह..!!!

अफ़लातून said...

बहुत ख़ूब , प्रमोदजी । सुन्दर ।

अनूप शुक्ला said...

प्रमोदजी आपके ये मुक्त गद्य के शिल्प बहुत अच्छे लगे!

Shuaib said...

बहुत ख़ूब लिखा