Monday, April 9, 2007

जंगल में अदृश्‍यवाणी

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: अट्ठाईस

चूंकि पिछली किस्‍त में किन्‍हीं अज्ञात कुमार या अनामिका कुमारी ने बल देकर अपनी टिप्‍पणी में यह बात कही कि ‘’ट्रेन कहीं नहीं जाएगी, हमेशा यहीं रहेगी. ट्रेनें कहीं नहीं जातीं, वक्‍त चला जाता है’’.. , इस गूढ़ सत्‍य में छिपे विराट दर्शन को पहचानकर पहले हम घड़ी देखते हुए चिंतित और दुखी हुए, फिर सीटी बजाते हुए चलती (लेकिन दार्शनिक रूप से रुकी) ट्रेन से उतरकर बाजू के जंगलों की तरफ निकल गए. गनीमत था विकास-विरोधी आदिवासी यहां अपने दल-बल के संग कोई प्रदर्शन कर रहे थे, न ठेकेदारों का गिरोह मुजरा देखते हुए जंगल कटाई अभियान में जुटा था. मैं आदमी जैसा आदमी अब भले न रहा होऊं लेकिन जंगल जंगल जैसा ही था. बीच-बीच में पत्‍ते खड़खड़ा रहे थे, चिडिया भी कूक रही थी. और मेरे जैसे संशयी आदमी के लिए विश्‍वास करना मुश्किल हो रहा था कि देश में अभी भी इस तरह के जंगल बचे हुए हैं. इतने वर्षों तक शहर में रहते हुए मैं जंगल की महक लगभग भूल चुका था. घास में छिपी पगडंडी, पेड़ों की छांह, पत्‍तों के बीच दिखता आसमान का टुकड़ा- सबके मिले-जुले नशीले असर में मैं लगभग भावुक होकर फिर से प्रेम में भर गया, और जल्‍दी ही इस बात से दहशत भी खाने लगा कि किसी लड़की के सामने पड़ते ही कहीं उससे शादी का प्रस्‍ताव न कर दूं!

दिमाग अभी भी पशोपेश में था कि अंतोनेल्‍ला को छोड़कर मैंने सही किया या गलत. इस ऊहापोह को सुलझाता, साथ ही आस पास के सौंदर्य को सराहता जंगल में टहलता हुआ काफी आगे तक निकल गया. मगर ताजुब्‍ब की बात कि कहीं कोई आदिवासी लड़की-औरत पत्‍ते या लकड़ी बटोरती काम में बझी नहीं दिख रही थी. सब तरफ सभ्‍यताविहीन एक जंगली सूनसान पसरा हुआ था. तभी दूर हरे के भीतर वह हरी झलकी दिखी. क्रूरता का काफिला, हरे यूनीफॉर्म में मिलिट्री टुकड़ी, चुपचाप बीचों-बीच जंगल से गुजरता हुआ. विचारमग्‍न आगे-आगे अविनाश चल रहा था. उसे पहचानते ही घबराकर मैं एक पेड़ की ओट हो गया. मासुमेह का बंदी आज़ाद हो गया, वापस अपने अभियान पर? यह कैसे संभव है! फिर मासुमेह का क्‍या हुआ? मूवमेंट फॉर डेमोक्रेसी और रैडिकल रुरल्‍स और मेरी रेहाना का क्‍या हुआ? हलक़ सूखने लगा, सांस अटक गयी, हाथ के नाखून मैंने पेड़ के तने में गड़ा दिये. फिर दर्द से छटपटाकर हाथ खींच लिया!

तभी आस पास फुसफुसाकर एक आवाज़ गूंजी- अविनाश को तुम जितना भोला और बेदाग़ समझते हो, ऐसा वह है नहीं!

मैंने पलटकर पीछे देखा, पेड़ के ऊपर झुरमुट में देखा कि बोलनेवाले से सीधे मुखातिब होऊं, सवाल करुं- जवाब पाऊं, मगर कहीं कोई नज़र न आया. अलबत्‍ता अदृश्‍यवाणी जारी रही- मूवमेंट फॉर डेमोक्रेसी में दो फाड़ हो चुका है. रैडिकल रुरल्‍स के सभी तहख़ाने पुलिस की गिरफ्त में आ चुके हैं, और पोलित व्‍यूरो के सभी जिम्‍मेदार मेंबरों को दीवार से खड़ा करके मारा जा चुका है.. और इस फूट और समूचे विनाश के पीछे एक व्‍यक्ति की सनकभरी बुद्धि काम करती रही है.. तुम्‍हारा अपना, जिगरी अविनाश..!

- रेहाने? रेहाने का क्‍या हुआ?.. मैं भरे गले से बुदबुदाता हूं.

आवाज़ ख़ामोश हो जाती है. मैं चीखकर अपना सवाल दुहराता हूं. अविनाश को राक्षस और पिशाच, मासूम जानों का हत्‍यारा कहकर पुकारता हूं. दूर तक गूंजती आवाज़ वापस मेरे पास लौट आती है. मैं तने से लगा-लगा ज़मीन पर गिरकर फूट-फूटकर रोने लगता हूं. कि तभी एकदम-से बिजली कड़कती है, और बड़ी-बड़ी बूंदे गिरना शुरू हो जाती है. पलक झपकते पत्‍तों पर पानी के गिरने का तूफानी शोर होने लगता है, मुसलाधार की झड़ी लग जाती है. ऐसा गहन अंधेरा छा जाता है कि हाथ को हाथ न सूझे. मैं लापरवाही से तेज़ी से कीचड़ में बदलते ज़मीन में लिसड़ा पड़ा रहता हूं.

दूर कहीं मां का बुलाना सुन रहा है- आज फिर ये लौंडा छाता लेकर नहीं निकला है!.. सर्दी लग जाएगी, वापस आ जा, बदमाश!

धीरे-धीरे सब ख़ामोश हो जाता है. या शायद मैं बेहोश हो जाता हूं.

(जारी...)

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