Tuesday, April 24, 2007

इस वर्ष के साहित्‍यरत्‍न पुरस्‍कार की घोषणा और बूझिये विजयी कौन?

साहित्‍य की भारी अव‍नति के बीच अभी भी उम्‍मीद का एक दीपक (सुनील नहीं) बाकी

लेखक: मैं मैं मैं

बाबूजी ने लम्‍बी उम्र का फायदा उठाकर जीवन में ढेरों गंदे काम किये थे. अच्‍छे केवल दो किये. पहला यह कि गिरगांव में एक तिमंजिला मकान बनाकर मेरे नाम छोड़ गए, कि मैं निर्विघ्‍न, चिंतामुक्‍त भाव से साहित्‍य को समर्पित हो सकूं (जो मैं हुआ भी), दूसरे अपने साहित्‍य-प्रेम को अमर करने के लिए वे साहित्‍यरत्‍न मंजूषा जैसा पुरस्‍कार स्‍थापित कर गए और इस तरह साहित्‍य में वह और साहित्‍य को अपने में अमर कर गए. उसी अमरता की छांह में बैठा मैं नियमपूर्वक साहित्‍य उत्‍पादन में सेवाभाव से लगा हूं. कभी-कभी सारे दिन लगा रहता हूं कुछ नहीं निकलता और कभी निकलना शुरू होता है तो झड़ी लग जाती है. जैसे, देखिये, आज सुबह से लगी हुई है. एक बानगी लीजिये:

रेल की खिड़की पर बैठकर सफर करना कितना सुहाना लगता है
सुबह नियम से मोहल्‍ले न गया हमको तो वो दिवाना लगता है
रवीश, ऐ रवीश, बजाते रहें आप झुनझुना है यही आपका नसीब
हमसे अच्‍छा लिख ले कोई सोचता है वो बड़ा अनजाना लगता है.
ख़ैर, इस वर्ष के साहित्‍यरत्‍न मंजूषा पुरस्‍कार की घोषणा हो चुकी है, और जैसाकि अपेक्षित था बिना विवाद, बिना प्रतियोगिता मैं फिर विजयी चुन लिया गया हूं. ऐसा नहीं है कि विवादी हवाएं नहीं बह रही थीं या प्रतियोगी ठेलमपेल नहीं थी मगर बाबूजी की छत्रछाया में हम घास नहीं छीलते रहे हैं, हिंदी साहित्‍य का सूक्ष्‍मता से अध्‍ययन ही करते रहे हैं. तो अध्‍ययन, जैसाकि निकलना था, सही निकला और हम आगे आगे निकल गए. मुख्‍य पांच प्रतियोगियों में सबसे ज्‍यादा हाथ-पैर रवीश कुमार ही मार रहे थे. सीधे उंगली घी निकलती न देख धमकियों के लेवल तक गिर गए. फोन पर कहने लगे- साहित्‍य के फेरे में मत रहना, मोतिहारी के पहुंचे हुए गुंडे हैं! साहित्‍यरत्‍न हमें नहीं मिला तो मंजुषा को उठा ले जायेंगे. ऑफिस फूंक देंगे, हां! मैं फोन पर मुस्‍कराता रहा और अंदर ही अंदर ऑफिस की बीमा पालिसी का स्‍मरण कर और ज्‍यादा मुस्‍कराता रहा. उसके बाद रवीश कुमार से निपटने के लिए अपने गुंडे नहीं भेजे. उनके प्रकाशक के पास एक फोन भेजकर उनकी किताब रुकवा ली. रवीश कुमार की देखा-देखी अविनाश भी फुदकने लगे थे. पत्र में हंसते हुए लिखा प्रतियोगिता से रवीश हट गए, अच्‍छी बात है, रास्‍ता साफ हो गया है! पांचवी कक्षा से ही मंच पर जाकर पुरस्‍कार पाने की बड़ी हसरत है, इस बार हमीं को जीत जाने दीजिये, भैया? मैं सन्‍न रह गया. चौबीसों घंटे समाज और साहित्‍य की चिंता का नाटक खेलनेवाला सीधे-सीधे बचपन और बचपने की हसरत के नाम पर साहित्यिक प्रसिद्धी क्‍लेम करना चाहता है! मैंने सन्‍नता प्रकट नहीं की, जेब से अचूक अस्‍त्र निकालकर उसकी तरफ उछाल दिया. ठंडे स्‍वर में कहा- एक बात बताओ, पुरस्‍कार कमेटी के गुजराती सदस्‍य तुम्‍हे वोट देंगे?.. इस बार अविनाश सन्‍न रह गए और उसके बाद से लगातार सन्‍न ही बने रहे हैं. अपने पत्रों में बचपन, हसरत, साहित्‍य, पुरस्‍कार जैसे शब्‍दों का प्रयोग बंद कर दिया है.

अगले प्रत्‍याशी- अभय तिवारी ज्‍यादा टेढ़ी खीर थे. एक तो बाबाओं की तरह भय जगानेवाली दाढ़ी बढ़ा रहे थे, दूसरी ओर राम की शांति-पूजा जैसी लंबी कविता लिखने का प्रपंच भी खेल रहे थे. मैंने सीधे रणभेरी बजाने की बजाय कूटनीति लड़ाने का शांतिप्रिय रास्‍ता पकड़ा. जींस और स्‍नीकर्स फेंककर धोती-कुर्ते में निर्मलानंद पहुंचा, प्रणाम इत्‍यादि के बाद बोला- पुरस्‍कार तो इस बार आप ही को मिल रहा है, पंडित जी! पंडित जी किसी मोटे ग्रंथ पर झुके हुए थे, आठवें स्‍कन्‍ध का सस्‍वर पाठ कर रहे थे, दाढ़ी के लहरीलेपन में हाथ घुमाते हुए आंखों ही आंखों मुस्‍कराये. मतलब था आप बता क्‍यों रहे हैं वो तो हम जान ही रहे हैं. भीतर की तकलीफ को स्‍वर में ढालकर मैंने कहा- यह सब आप क्‍या कर रहे हैं, पंडित जी? इस तरह के आयोजन में उलझकर अपने को लघु बना रहे हैं? अब यही स्‍तर रह गया है आपका कि अविनाश, रवीश और हमारे जैसे चिरकुटों के स्‍तर की प्रतियोगिता में आप भाग लें? इसी दिन के लिए आप राम की भक्ति में आकंठ उतरे थे? क्‍या सोचेंगे पुरुषोत्‍तम? और सृजनशिल्‍पी? सोचा है आपने कैसी-कैसी लम्‍बी प्रतिक्रियाओं का आपको जवाब लिखना होगा? साहित्‍य में है क्‍या? देख ही रहे हैं बोधिसत्‍व तक अपने को डाक्‍टर लगाकर चार-चार पुरस्‍कार दाबे बैठे हैं, उसी स्‍तर तक गिरना चाहते हैं आप? वाजिब लगता है आपको? आपकी तो असल जगह है आश्रम और युगनिर्माण योजना! गीता प्रेस, गोरखपुर से भी पुरस्‍कार मिल रहा होता तो कोई बात थी मगर साहित्‍यरत्‍न मंजूषा? थू-थू-थू! छो‍ड़ि‍ये, सरकार, लात मारिये! अभय जी पर एकदम-से वांछित असर पड़ा, तत्‍क्षण पंडित हजारीप्रसाद की नकल करने लगे. मुस्‍कराहट चली गई और लौटी तो मंजूषा छोड़ ही नहीं चुके थे, लात भी लगा दिया था और हमसे युगनिर्माण योजना को पत्र लिखवा रहे थे!

आखिरी मोर्चा विदेश में बैठे आदमी का था इसलिए हम थोड़ा दायें-बायें हो रहे थे. फिर लेमन सोडा की ठंडई से ताज़ा होते हुए हमने ख्‍याल किया कि दारा शिकोह, सुलतान शुजा, मुरादबख्‍श को ठिकाने लगा चुके हैं तो बुड्ढे शाह आलम से किस बात का डर? बड़ी बेग़म जैसी किसी कहानी की ख़बर होती तो वहीं से लपेटते मगर चूंकि ऐसा कोई भेद हमारे पास था नहीं, हमने उन्‍हीं के हथियार से उन पर चोट किया. पूछा- तो आप भी पुरस्‍कार के प्रत्‍याशी हैं? सुनते ही परदेसी बाबू चहकने लगे- सोलह वर्ष की अवस्‍था से ही कवितायें लिख रहा हूं! कविताओं के चक्‍कर में ही दो बार इम्‍तहान के नतीजे खराब हुए. करियर छूट गया, कवितायें नहीं छूट सकीं! पाठक और पुरस्‍कार मोह स्‍वाभाविक है.. आपको नहीं लगता?.. मुझे क्‍या लग रहा था बताने की जगह मैंने काउंटर क्‍वेस्‍चन किया- पुरस्‍कार के आवेदन हेतु अपना नाम बताइयेगा आप?.. सवाल सुनना था कि अनामदास हांफने लगे, फिर पाला छुड़ाकर पुरस्‍कार से विपरीत दिशा में भागे. पुरस्‍कार की दिशा में मैं भागा!

(ऊपर: जाने किसका प्रतिनिधित्‍च करता एक बेमतलब का चित्र, नीचे: मेरे साहित्‍य से लाभान्वित होती एक ज्ञानशील पाठिका)

5 comments:

  1. वाह आपके की बोर्ड (लेखनी) में जादू हैं. सचमुच मजा आ गया.

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  2. आपके साहित्य मंजूषा जैसे पुरुस्कार को लात हम लगा सकते हैं..(भले ही आपके बहकावे में.. वरना कौन मंच पर जाकर विनीत और विनम्र भाव से सबका धन्यवाद नहीं करना चाहता.. पर फ़िलहाल हम यही कहेंगे कि) उसका मोह हमें बाँधने में असफल है.. मगर आपके लेख पर टिपियाने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा हूँ.. आनन्द है..

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  3. कहा मिलता है मै भी लाईन मे हू नवोदित वाला ही देदे अजदक जी :)

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  4. मजा आ गया पढ़कर, अभय ने ठीक ही लिखा है, टिप्‍पणी करने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा हूं। मोह मैं भी सवंरण नहीं कर पाई।
    - मनीषा

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  5. बहुत बढ़िया लेखन लगा, और मैं इस सोच में हूँ कि आज तक क्यों नहीं आया यहाँ?
    आपका चित्रों का सन्दर्भ सबसे उत्तम लगा इस पोस्ट में। ऐसे ही लेख तो चाहिए, पुरस्कार के लिए।

    मुझे तो आप चयन समिति में शामिल करवा दीजिए, बस्स!

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