Wednesday, April 18, 2007

लिंग भेद की उलझन

सच पूछिये तो इस विषय पर हम तो क्‍या हमारा कुत्‍ता भी नहीं सोचना नहीं चाहता. मगर चूंकि कुत्‍ता पालने का खर्चाभाव है, खर्चाभाव से ज्‍यादा स्‍थानाभाव है, और खुद हमारी हालत कुत्‍ते से बहुत बेहतर नहीं, हम इस विषय की फाईल खोलने को मजबूर हो रहे हैं. राष्‍ट्रीय भांड़गिरी का विष पी रहे हैं. सीमाओं को तोड़कर समय के तकाजे में सामाजिक हो रहे हैं, तो इसीलिए हो रहे हैं कि लिंग भेद की एक सामान्‍य उलझन हो गई है. समझने में दिक्‍कत हो रही है कि यहां दरअसल दुल्‍हा कौन है और दुल्‍हन कौन! यार लोगों व प्रेस की बेचैनियों से तो यही लगता है अभिषेक कुमारी हैं जिनकी श्री ऐश्‍वर्या से शादी होने जा रही है. ऐसा है क्‍या? शादी ऐ की अ से हो रही है या हल्‍ला इसका है कि अ जी ऐ जी के हो रहे हैं? प्रेस वालों को दुर-दुर किया जाता रहा मगर भाई लोग प्रतीक्षा की सजावट की झांकी उतार ही लाये! ऐसा क्‍या होनेवाला है प्रतीक्षा में? श्री ऐ जी क्‍या बारात लेकर वहीं पहुंचने वाले हैं? श्री बड़े अ जी वर पक्ष से हैं या वधु पक्ष से? बैठे-बिठाये खामखा का असमंजस हो गया है. आसपास कोई कुत्‍ता भी नहीं कि एक लात लगाकर मन शीतल करें. रिपोर्टो की झड़ी लगी हुई है मगर लिंग भेद के सवाल पर सब चुप्‍पी मारे बैठे हैं. रवीश कुमार, आप कहां हो, भाई? कुछ क्‍लैरिफाई करो, यार!

(विशेष सामाजिक इनपुट: आजमगढ़ वाले श्री विमलचंद्र वर्मा)

1 comment:

  1. आ गया भाई । क्या सवाल उठाया है आपने । सारे मीडिया प्लानरों की पोल से लेकर पैंट तक खोल दी आपने । बताइये दुल्हन के घर सजावट होती है, संगीत होता है, लड्डू बनते हैं, साल के पत्ते आते हैं, दही आता है, इत्र वाला आता है । दुल्हा तो सिर्फ वीआईपी अटैची लेकर बाराती के साथ घर से निकलता है । उसके यहां तो काम ही नहीं होता मगर देखिये कि लोग लड़के वाले के यहां ही कैमरा लेकर जमे हैं । वाह मज़ा आ गया । मैं जा रहा हूं ऐश की नानी का इंटरव्यू करने । मीडियो को अब अपने गांव के ठाकुर को नौकरी देनी चाहिए जो ऐसे मौकों पर बताएगा कि शादी के वक्त कहां क्या होता है और कैमरा कहां होना चाहिए ।

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