Friday, April 6, 2007

पेटी में बंद हारमोनियम

तुम टो कर फिर देखती हो कि पैर फटता है. मैं तहा कर अख़बार रखता हूं दिल फटता है. खाने के बाद चुपचाप सोचती हो तुम मैं अस्थिर टहलता हूं रात कटती है. तुम झाड़कर निकालती हो बाहर पेटी. बैठती हो हारमोनियम लेकर. प्रण किये आज इस घर का सन्‍नाटा हर लोगी. संगीत से भर दोगी. मुंह पर साड़ी धरे याद करती हो सुर साधा था कब आखिरी बार. मंजु की शादी थी या मामा आये थे जब. कितना चंचल हुआ करती थीं तुम. और मैं हंसमुख. दिन भर उधम किये रहता रंजीत. अम्‍मां कहती बहस करते मुंह नहीं दुखता तुम लोगों का. तरबूज की फांक काटकर सबको पूछ-पूछकर खिलाती. अचानक गाना गाने लगती. मामा हंसने लगते. कुछ याद है तुम्‍हें.

लगता है कितना पहले की बात है. लगता है किसी और के जीवन-चित्र हैं.

7 comments:

  1. ईश!!! की दारून, एई पाब्लोनेरू दा से कोमती आच्छे ना. कोमाल है. आरो आच्छे ना कि?

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  2. खींच लीजिये.. खींच लीजिये, गुमनामदास जी, किसी प्रेमप्रकाश तिवारी की बजाय सीधे पाब्‍लो तक पहुंचा दिया.. चलिये, कभी हमारी भी चिप्‍पी मारने की बारी आएगी.

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  3. इसे लाइन बाई लाइन लिखते...बिना कोई फेर बदल के...तो एक बेहतरीन नव कविता कहलाती. बहुत बढिया.

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  4. बेहद उदास करने वाला सुंदर और भावपूर्ण गद्य . हम इस तरह क्यों बदलते हैं ? क्या यह हम सबकी नियति है ? वे जो इसके पार गए हैं कुछ सुझाएंगे ? क्या अधेड़ होने पर संघर्ष और वक्त के थपेड़े हमें ऐसा कर देते हैं . वह जीवन रस कौन सोख लेता है जिसके पीछे-पीछे मन-मृग यहां तक खिंचा चला आता है. प्रेम की वह कीमियागरी कहां चली जाती है जो मिट्टी को भी सोना कर देती है

    शायद पेटी के हारमोनियम में कोई ऐसा सुर छुपा हो जो इस उदासीनता,तनु अवसाद और निरपेक्षता को बुहार दे . और एक नया चंचल स्वर गूंजे . यह घर जो हमारे दाम्पत्य की रसवती,उर्वरा पृथ्वी है,पुनः उदात्त और अह्लादकारी ध्वनियों से गूंज उठे .

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  5. तरल है.. भिगा गया..

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  6. अच्छा लिखा है...रवीश कुमार वाली फंतासी के ढेर के ढेर गद्य से कई दर्जा बेहतर...

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