Sunday, April 22, 2007

क्‍या मनुष्‍य पशु-पक्षियों के बराबर पहुंच गया है?

एक अप्रगतिशील चिंतन

लेखक: चतुर्भूज शास्‍त्री

पहली बात तो यह कि मनुष्‍य-पशु चर्चा में पक्षियों को हटाइये. पक्षी होते क्‍या हैं? जान कितनी होती है, देह में कितना मांस होता है? गुलेल का एक छोटा कंकड़ खाकर ढेर हो जाती हैं ऐसी नाचीज़ चीज़ पर क्‍या चिंता करना! डॉ सलीम मोइज़ुद्दीन अली ने पूरी ज़ि‍न्‍दगी चिंता में गुज़ार दी- काफी नहीं है? चिंता करते-करते मर गए, खामखा पंछियों तक स्‍वयं को केंद्रिंत करने की वजह से ही वैसी ही पतली-दुबली काठी के नाचीज़-से इंसान रह गए थे! पक्षियों की बात मत कीजिये. ना-ना-ना. पशुओं की बात अलग है. हिंदी ब्‍लॉगजगत में पशुवत भाव आते ही देखिये, कैसी जीवंतता आ गई. पक्षी पचास पैसे वाला स्‍टैंप हैं जबकि पशु महानगर के फ्लाइओवर पर अस्‍सी इनटू अठारह फीट का पोस्‍टर है. गैंडे को लीजिये, भालू, भैंस, चिंपैंजी को देखिये, सब मनुष्‍य के बराबर खड़े हो सकते हैं. मनुष्‍य भी उनके बराबर खड़ा हो सकता है (कुछ अपवादस्‍वरुप उदाहरण भी होंगे, मसलन- जब अप्रगतिशील मित्र पी सिंह ओंकारेश्‍वर के बन्‍दरों के बराबर खड़े होने की बजाय भाग खड़े हुए थे, मगर उन्‍हें अपवाद की तरह ही देखा जाना चाहिये- सामान्‍यीकरण करते हुए हम प्रगतिशील ब्‍लॉग मोहल्‍ले की टंटेबाजियों का शिकार होंगे जैसाकि आज के माफ़ीनामे वाले पोस्‍ट पर पंडित-प्रोफेसर-डाक्‍टर अभय जी तिवारी जी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए साफ किया भी है- क्‍योंकि समाज के सामने दारा सिंह और धर्मेंद्र जैसे सशक्‍त उदाहरण भी उतनी ही मात्रा में हैं जहां ये महानुभाव न केवल पशुओं के बराबर खड़े हुए बल्कि पशुवत मुकाबला करके उन्‍हें पराजित भी किया.

धर्मेंद्र ने बॉक्‍स ऑफिस पर बुरी तरह पिटी मशहूर फिल्‍म ‘आज़ाद’ में बबर शेर- राज बब्‍बर नहीं- को पछाड़ ही नहीं दिया था, दुम दबाकर भागने पर मजबूर कर दिया था. फिर अन्‍य ढेरों फिल्‍में हैं जिसमें सिर के गंजे पशु के मानवीय अवतार शेट्टी को धर्मेंद्रपा लगातार धोते रहे हैं. शेट्टी के आते ही दर्शकगण समझ जाते कि अब यह धुलेगा, चांद में दरार और खून की धार फुटेगी आदि-आदि). पशु के ढेरों ऐसे गुण हैं मनुष्‍य जिनका अनुकरण करने में सक्षम हुआ है. क्षमा कीजियेगा मैं पुन: धर्मेंद्रपा पर लौट रहा हूं- राज खोसला जी की उस युगांतकारी कृति ‘मेरा गांव मेरा देश’ के उस अमर दृश्‍य का स्‍मरण करें जिसमें नायिका आशा पारेख के ध्‍यानाकर्षण के लिए वह पशुवत पंछी की तरह आवाज़ निकाल रहे हैं! (किस पंछी की तरह निकाल रहे थे इस जानने के लिए कृपया डॉ सलीम अली की संपूर्ण रचनावली, ऑक्‍सफर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्‍ली कंसल्‍ट करें) फिर हमारे एक अभिन्‍न मित्र की ग्‍यारह वर्षीय पुत्री हैं जो अभी भी सीधे सवालों का जवाब अजीब-अजीब तरीकों से मुंह बनाकर ऐसे स्‍वर निकालकर देती हैं जो मित्र के परिवार से अलग कोई पहुंचा हुआ पशु विशेषज्ञ ही डि-कोड कर सकता है. स्‍वर के साथ-साथ क्रिया-समानता के भी विस्‍तृत प्रमाण हैं. दरभंगा के पुनिया ओझा अपने गांव की दीवारों व झाड़ में ही नहीं, दरभंगा बस डिपो के बसाते परिसर में भी- लघुशंका से निवृत होते वक्‍त जिस अदा से एक टांग थोड़ा ऊपर करके दूसरे टांग की मनमोहिनी टेक लेते हैं, अपना नहीं किसी श्‍वान का ही बोध कराते हैं. ढेरों उदाहरण हैं. इस पर बात करना शुरू कर दूंगा तो पंडित अभय जी तिवारी अपनी पंडिताई और रवीश कुमार अपनी पत्रकारिता और प्रत्‍यक्षा अपनी ग्रीवा टाईप अप्रगतिशील कवितायें भूल जायेंगी इसलिए चुप रहकर यहीं इतिश्री करता हूं. आपकी जिज्ञासा के बंध अगर फिर भी खुले रह गए हों तो कृपया राजकमल से छपकर आ रही मेरी आसन्‍न पुस्‍तक ‘पशुवत’(पैसों के सवाल पर श्री माहेश्‍वरी ने कोई नया खेल न खेला तो) के आ जाने तक धीरज रख लें (पत्‍नी, प्रेमिका, बच्‍चों की पिटाई करते हुए, ‘भेजा फ्राय’ देखते हुए किसी तरह टाईम पास कर लें, प्‍लीज़).

(अप्रगतिशील लोकोदय माला, ग्रीष्‍मकालीन पशु विशेषांक से साभार)

2 comments:

  1. किताब का बड़ी बेचैनी से इंतजार है।

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  2. आज पहली बार मैं आपके ब्‍लॉग पर आई हूं। आपकी भाषा और लिखने का अंदाज अच्‍छा लगा तो कुछ पुरानी पोस्‍ट भी पढ़ीं। पढ़ी तो बस पढ़ती गई। आप बहुत अच्‍छा लिखते हैं। आपकी अगली पोस्‍ट का इंतजार रहेगा।

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