Saturday, April 28, 2007

तम्‍बू रोयाल

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: छत्‍तीस

मेरा नाम, कुल, शील जानकर गोविंदा ने ठंडी सांस भरी. तुम तो, यार, पिटे हुए पुजारी हो! संचारी हो न कायदे से बिहारी हो- क्‍यों? फाग और सोहर का फर्क समझते हो? कभी गोइंठे की आग में खिचड़ी पकाया है? साइकिल पर रंगीन झंडी डाल मउगी को मेला घुमाया है? हाट-बजार में हंड़ि‍या पी के लुढ़के हो? फिर कौन बात के घेंवड़ा बिहारी हो!

छाती फैलाकर, और फैली हुई छाती पर वापस गिल्‍बेर्तो पान्‍ना का जैकेट कसते हुए, गोविंदा गंभीर अदायें दिखाकर फिर से मुझे असहज करने लगा. मगर दो कदम पीछे हटकर वापस अपना रस्‍ता पकड़ूं इसके पहले ही उसने अचानक स्‍वर बदलकर नयी रागिनी छेड़ दी. गाने लगा- माई पकाई गरर-गरर पूआ/ हम खाइब पूआ, ना खेलब जुआ.. अइसे आंख फाड के मत देखअ, बबुआ, हमूं कुछ बुझल-साझल बानि.. आवअ देखलाइं तहरा के असल जुआबाज अऊर जुआबाजी!.. हिंया-हुंआ टहल रहे हो, कौनो बुरी बात थोड़े है. कोस-कोस पर पैर धोना/ चार कोस पर खाना/ जहां-जहां मन आवे/ तहां-तहां जाना!

हाथ खींचकर बाबू गोविंदा हमें तम्‍बू के अंदर लिये चले. स्‍वर की धमक और गाने की गमक बनाये रहे. चार कदम आगे मान्‍या मिल गई. सिर झुकाये गुमसुम बैठी थी. मैं हैरान हुआ. कहे बिना रह नहीं पाया- क्‍या बात है, भई.. बहुत दिनों से तुम्‍हारी शेरो-शायरी, दोहा-चौपाई कुछ दिख नहीं रहा? गोविंदा फुसफुसाकर बोले- छेड़ो मत! हमने पहले ही पूछ लिया था, नज़रों की कटार से पा गया था जवाब.. अपने ‘उनको’ लेकर चिंतित है! शेर सूझ रहा है न शायरी.. पिघला हुआ शीशा हो रही है. एक पाती आ जाने दो फिर देखना, उमड़ती हुई नदी हो जाएगी. भर्र-भर्र वापस बहने लगेगी. गुल से गुलिस्‍तान हो गई हूं वाला गाना गाने लगेगी. क्‍यों, मैडम, एम आई करैक्‍ट?

छाती में खंज़र धंसा हो मान्‍या ने ऐसी नज़र से एक बार देखा फिर आंखें फेर लीं. पाती की राह तकने लगी. गोविंदा गाना गाने लगा: जय बजरंग-बली धजाधारी/ कसो लंगोट, उठाओ गदा भारी/ खबर लो हमारी, सरन तिहारी/ लंगोट का पक्‍का मर्द औ सत की पक्‍की नारी/ बात का कच्‍चा भंड़ुआ नेद की कच्‍ची छिनारी.

अंदर की दुनिया ही बदली हुई थी. बाहर की फीकी दुकान से अलग अंदर बहार गुलज़ार था. लाल-नीली बत्तियों के बीच तंग कपड़ों में कमसिन कन्‍यायें ज़ाम सर्व कर रही थीं. कसीनो के लंबे टेबल सजे हुए थे. जायंट स्‍क्रीन पर दुनिया भर के बाज़ार-भाव चढ़-उतर रहे थे. बुशम और बेली डांस चल रहा था. अलबत्‍ता देख मेरे सिवा और कोई नहीं रहा था. उजबकों की तरह मुंह और आंख खोलने के बाद मैं कहना चाहता था- ये कहां ले आए, गुरु? मगर उसके पहले ही गोविंदा दार्शनिक हो गया- कितना सेक्‍स ठेलते रहते हैं, यार! इतनी साली सप्‍लाई हो गई है कि मार्केट में पैसा बहाकर भी अब डिमांड जेनरेट नहीं हो रहा! बंबई की बार-बालाओं की तरह इन लड़कियों को भी जल्‍दी अपना कारोबार समेटना होगा. दुनिया कितनी सैड जगह हुई जा रही है, यू नो!

बेली डांसर से हटकर मेरी नज़र कहीं और अटक गई थी. गोविंदा का प्रवचन अविरल चालू था- मैंने तो पीना-पिलाना एकदम-से बंद कर रखा है. नो डांस, नो बार, नो सेक्‍स, नथिंग. इसीलिए तो फिल्‍म लाईन से हट गया, राम नाईक से जाकर गले मिल आया, पासवान की दोस्‍ती तोड़ दी. सोनिया फोन करती रहती थी मैं उठाता नहीं था. फायदा क्‍या था? एक बार लाइफ का फंडा समझ लो तो बड़े-बड़े सब बौने नज़र आने लगते हैं! मैं तो कैलाश-मानसरोवर में सेटल करने की सोच रहा था फिर सुनीता ने कहा थोड़ा ईस्‍टर्न योरोप देखते हैं तो मैंने कहा, देखो, भई. तुम राधा हो हम कृष्‍ण मुरारी मना कैसे कर सकते हैं?.. मैं यहां तब से ठेल रहा हूं तुम कहां खेल रहे हो, भाई?..

लंबे टेबल के जिस एंगल पर मेरी आंख अटकी हुई थी वहां गोद में एक मिस्री बाला बिठाये रवीश कुमार अपनी चाल खेल रहे थे. हमेशा की तरह जीत रहे थे और जोर-जोर से हंसते हुए आसपास के लोगों को कॉम्‍प्‍लेक्‍स दे रहे थे. गोविंदा ने फुसफुसाकर कहा- पहुंचा हुआ संत है और एकदम सड़ा हुआ अंडा है.. ऐसा अजीबो-गरीब आमलेट मैंने लाइफ में और कहीं नहीं देखा!

मैं रवीश कुमार को देखकर हैरान हो रहा था. और सोच रहा था यह सब यहां छोड़कर रेहाना भला और कौन-सा काम निपटाने कहां गई है!

(जारी...)

6 comments:

  1. का प्रमोद भाई, एक खो पढ़कर खत्‍म भी नहीं कर पाते कि आप दुसरका छाप देते हैं। भई, कउनो मसीन लगाए हुए हैं का, धड़ाधड़ छपकर निकलत जात है।

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  2. तो मिल गया सा। अब तो बस ये जा और वो जा।

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  3. बहुत अच्‍छा है, छंद के तो कहने की क्‍या। लेकिन संभलो गुरु, कहीं मान्‍या ने देख लिया तो दौड़ाकर मारेगी।

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  4. अहाह.. रवीश की वापसी..मस्त है..

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  5. वाह प्रमोद जी शानदार लिखा है…। मान्या को भी जगह दे दी… :)

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