Thursday, May 10, 2007

1857 की याद का एक मतलब यह भी..

मैं इस विवाद में नहीं पड़ूंगा कि 1857 अंग्रेजों के खिलाफ भारत का पहला मुक्ति संग्राम था या अपनी सत्‍ता बचाने की सामंतवाद की आखिरी जुझारु कोशिश. या कि 1857 में इन दोनों ही पहलुओं की उपस्थिति थी. फिलहाल मुझे निजी तौर पर जो ज्‍यादा काम की बात दिख रही है वह ये कि 1857 एक ऐसे मौके में ज़रूर बदल गया था जिसमें एक काफी बड़ी मिली-जुली आबादी, एक बड़े सामाजिक हित में साथ-साथ मोरचा बांधे लड़ाई लड़ रही थी. 1947 की आज़ादी के बाद ऐसे मौकों की संख्‍या और कम होती गई है. विज्ञजन प्रकाश डालेंगे कि 1962 का भारत-चीन युद्ध, पाकिस्‍तान के संग की दोनों बड़ी लड़ाइयां और 1974 के जेपी आंदोलन में मोरचा बांधे व सड़कों पर उतरी आबादी की शक्‍ल कितनी मिली-जुली रही. मगर, अपने होश में, इतना तो हमने देखा और समझा ही है कि 1977, और खास तौर पर सन् अस्‍सी के बाद किसी बड़े सामाजिक हित के सवाल ने इस देश को एक मंच पर इकट्ठा नहीं किया है.

आज सच्‍चाई यह है कि क्रिकेट और हिंदी फ़ि‍ल्‍मों से अलग राष्‍ट्रीय भावना महसूसने में लोगों को बड़ी ताकत लगानी पड़ती है (वैसे हिंदी फ़ि‍ल्‍मों का भी अब वह पहलेवाला असर नहीं रहा. टीवी और बदले समय की वर्गीय अभिरुचियों ने उस पुराने लोक में सेंघ मारकर उसे देश से ज्‍यादा विदेशोन्‍मुख कर दिया है. ले-देके बचता है क्रिकेट जिसमें सारे अरमान धंसे हुए हैं). बांग्‍लादेश से हार का दु:ख देशवासी राष्‍ट्रीय स्‍तर पर और समूची इंटेंसिटी में महसूस करते हैं. मगर खेल से ऊपर अर्थजगत और राजनीतिक लोक की जो जटिल परतें हैं, उनसे रूबरू होनेवाला कोई एक गंभीर राष्‍ट्रीय मानस नहीं है. उसमें न किसी की सचमुच गंभीरता से शिरकत होती है, न ऐसे सवालों पर देश को उत्‍तर से दक्षिण तक जोड़ सके ऐसा कोई राष्‍ट्रीय राजनीतिक मंच है. छोटे छिटपुट संगठनों का संघर्ष व प्रतिरोध है. इससे अलग देहात-शहरों में बिखरे वैसे ही छिटपुट असंतोष हैं. जो कभी तकलीफ नाक से ऊपर चढ़ जाए तो उबलकर सामने आते हैं; स्‍थानीय प्रशासन से टकराव में जाकर थोड़े वक्‍त के लिए खबर बनते हैं, तो बाज वक्‍त वह भी नहीं होता. झगड़े की वजह कभी सुलटती दिखती भी है (जैसा सिवान के शहाबुद्दीन को सज़ा सुनाये जाने के मामले में होता दिख रहा है, या सोहराबुद्दीन व कैसर बी के हत्‍या के मामले में तूल पकड़ते डीजी वंजारा के विरुद्ध जांच से साबित हो रहा है) तो बहुत बार उसका कारण न्‍याय की पुनर्स्‍थापना नहीं, पृष्‍ठभूमि में अन्‍य समीकरणों की फौरी ताक़त, दूसरे राजनीतिक-सामाजिक तकाजे व ज़द में लाये अपराधियों की बढ़ती ‘लायबिलिटी’ होती है.

आज़ादी के बाद लोगों का लोकशाही में विश्‍वास नहीं बढ़ा है, भय और अलगाव बढ़ा है. परिवार में बच्‍चे की शिक्षा, रोज़गार व बाज़ार की खरीदारियों से अलग देश के अर्थ और सिमटे, ज्‍यादा संकीर्ण हुए हैं. हाथ मिलाकर साथ बढ़ने की बजाय शक और संशय ज्‍यादा बढ़ा है. देश आगे, और बहुत आगे, जहां भी जा रहा है, वह एक बहुत छोटे प्रतिशत के हितों की ही साधन-पूर्ति कर रहा है. बाकियों के झमेले कम नहीं हुए हैं, आनेवाले समयों में वे और बढ़ेंगे ही. और जैसाकि केंद्रीय सरकार प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सहायता से हाथ खींच रही है (जो किसी भी नैतिकता से, किसी भी स्‍वाभिमानी राष्‍ट्र के लिए भयानक शर्म की बात है. कहना चाहिए अक्षम्‍य अपराध है), वह अन्‍य क्षेत्रों में भी देर-सबेर वही रवैया अख्तियार करेगी. सवाल यह है कि हम इन सवालों पर कंधे से कंधा मिलाकर बड़ी सामाजिकता में सोचने का मन बना पाएंगे, या क्रिकेट से अलग अन्‍य कोई भी सवाल (बशर्ते वह एकदम हमारा और हमारे घर का न हो) हमें झकझोरने में अब पूरी तरह असमर्थ हो चुका है? और उस ऐतिहासिक लड़ाई की याद में एक दिन का जलसा हम भले मना लें, सच्‍चाई यही है कि 1857 की सामाजिक सहभागिता की भावना को हमने तहेदिल से राम नाम सत्‍य कह दिया है?

जलसे के हल्‍ले-गुल्‍ले से अलग ज़रा एकांत में विचार कीजिएगा...

3 comments:

  1. इस लेख के एक एक शब्द से सहमत हूं और शायद यह पहली बार होगा कि आपसे पूर्णरुपेण सहमत हो रहा हूं।
    लेख के लिए साधुवाद

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  2. सिर्फ विचार ही कर रहे हैं हम. नहीं, साथ में डर भी रहे हैं.

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  3. अपने बिल्कुल सही बात कही है। इसलिए यह साझी शहादत की साझी विरासत है। यहां तक कि सावरकर, जो बाद में चलकर हिन्दुत्व (हिन्दू धर्म नहीं) के पैरोकार बने, उन्होंने भी इस साझी विरासत को ही रेखांकित किया। यही वो सूत्र था जो अंग्रेजों को भाया नहीं। फूट की सियासत की बीज पडी। हम कहते तो रहे कि अंग्रेजों ने फूट डालो राज करो कि नीति अपनायी लेकिन उससे सबक नहीं सीखा। उस वक्त अंग्रेज थे जिन्हें हिन्‍दुस्तानी समाज का साझापन पसंद नहीं था, आज भी कुछ ताकतें ऐसी हैं जिन्हें वो सब नापंसद है जिनमें साझापन है। 1857 की याद साझी विरासत से सीख लेने की याद हो, यही ख्वाहिश है।

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