Friday, May 18, 2007

19वीं सदी के मध्‍य में ओड़ि‍सा की गंवई शिक्षा

फकीरमोहन सेनापति

शहर के बीच हर बड़ी बस्‍ती में और बस्‍ती छोटी हो तो दो-तीन बस्तियों में एक-एक प्राथमिक पाठशाला थी. संपन्‍न घरों में स्‍वतंत्र रूप से अध्‍यापक (अवधान) थे. गांव में ‘बाउरी’, ‘कंडरा’ आदि अस्‍पृश्‍य जाति के लड़के भी ऊंची जात वाले बच्‍चों से दूर बैठकर पाठशाला में पढ़ते थे... उस समय पढ़ाने के लिए अध्‍यापक कटक जिले से, विशेषकर कटक जिले के झंकड़ परगने से बालेश्‍वर जिले में आते थे. अध्‍यापकों के आने का समय था चैत का महीना. अध्‍यापक पहनावे से पहचाने जाते थे. घुटनों तक को ढकने वाली मोटी-सी धोती, सिर पर मटमैला गमछा, कंधे पर बंधी दो पोटलियां- एक ओर आधा सेर तक पकाने के लिए पतीली और एक हल्‍का-सा लोटा; दूसरी ओर दो-चार पोथियों के साथ एक जोड़ी कपड़ा. ये ही चीजें काम ढ़ूढ़नेवाले अध्‍यापकों की पहचान थीं. फागुन आधा बीतने से लेकर चैत तक अध्‍यापक गलियों में घूमते नजर आते थे.

इनमें अधिकांश कायस्‍थ होते थे. कुछेक माटिवंश ओझा (एक जाति, पढ़ाना जिनकी आजीविका का पारंपरिक साधन था) बालेश्‍वरवासी अध्‍यापक ज्‍योतिषी हैं. माटिवंश के ओझा प्रारंभिक शिक्षण में सबसे दक्ष होते हैं- ऐसी मान्‍यता थी. लोक-विश्‍वास था कि उन्‍हें ‘लीलावती सूत्र’ मालूम था. पाठ के बल से ओझा लोग पेड़ों के पत्‍ते और उड़ती चिड़ि‍या के पर तक गिन सकते हैं, यह बात मैं बचपन से सुनता आ रहा हूं.

अध्‍यापक सिर्फ बालेश्‍वर ही में पाठशाला खोलकर बच्‍चों को पढ़ाते हों, ऐसा नहीं था. बालेश्‍वर के आस-पास के रजवाड़ों में, मेदिनीपुर जिले के दांतुण, पटाशपुर, महिषादल, कांधि, हरिपुर आदि इलाकों में भी उनका कार्यक्षेत्र फैला हुआ था.

पाठशाला में गैरकानूनी काम एक भी नहीं था. सब कानून के पाबंद थे. कार्यविधि का उल्‍लंघन करनेवाले के लिए दंड अनिवार्य था. अध्‍यापक के आदेश या उनसे अनुमति लिए बगैर उठना-बैठना तक छात्र के वश की बात नहीं थी. एक जगह बैठे-बैठे पैर दुखने लगे या झनझना उठे तो उसी तरह उसी जगह बैठकर प्रार्थना करनी पड़ती थी- “मास्‍टरजी, एक”, यानी पेशाब करने जाऊंगा. “मास्‍टरजी, दो”, यानी ‘टट्टी’ जाना है. “मास्‍टरजी, पांच”, यानी पानी पीने जाना है.. आदि-आदि.

पाठशाला की दंडविधि में कई तरह की सजाओं की व्‍यवस्‍था थी.
पहली- बेंत की मार.
दूसरी- ‘एक गोड़ि‍या’, अर्थात एक ही पैर पर खड़ा रहना.
तीसरी- ‘नाक और बाल’- एक हाथ से नाक और दूसरे से सिर के बाल पकड़कर खड़ा रहना.
चौथी- ‘आष्‍ठुगोपाल’, अर्थात घुटने के बल बैठकर, बायां हाथ सर पर रखकर, दायीं हथेली पर ‘खड़ी’ रखकर आगे हाथ बढ़ाए बैठे रहना.

उस समय बाइबिल के अलावा ओड़ि‍या में और कोई छपी हुई किताब नहीं थी. कटक मिशन प्रेस के अलावा और कोई छापाखाना भी नहीं था. बालेश्‍वर में पादरियों का एक स्‍कूल था. वहां ओड़ि‍या में लिखी बाइबिल के अलावा और कोई पढ़ाई नहीं होती थी. पर पादरी के स्‍कूल में छपी हुई किताब पढ़ने से जात चली जाएगी, इस डर से कोई हिंदू लड़का वहां पढ़ता नहीं था.

फकीरमोहन सेनापति के 'आत्‍मजीवनचरित' से साभार.
अनुवाद: श्रीनिवास उद्गाता, प्रकाशक: नेशनल बुक ट्रस्‍ट

2 comments:

  1. शेष जाँय पहूँचिबा सुधा भाबुथिली अनुवादटा तमर । साधुवाद।

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  2. कण कहुछंति, ददा,
    अनुबाद करा एते सहज कार्ज कण कि?.. एहर-ओहर जात्रा करि-करि ओड़ि‍या सबु भूलि जाइछि जे!

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