Tuesday, May 1, 2007

मई दिवस पर मज़दूर मित्र का बुद्धिजीवी को फ़ोन

देह पर वाजिब कुर्ता था पैर में उचित सैंडल. चेहरे का भाव भी तदनुकूल गंभीर ही था (जैसी कि अब आदत पड़ गई है). बुद्धिजीवी की सही-सही भंगिमाएं थीं हाथ में अख़बार था सिर में ढेरों घुमड़ते विचार थे. टूटा-फूटा रस्‍ता था पहली मई की धूप थी और सर्विस सेक्‍टर के इस ज़माने में दुनिया के जो भी सर्वहारा मज़दूर थे उनके प्रति जितनी हो सकती थी मेरी सहानुभूति थी. बगल से अगर कोई जलसा-प्रदर्शन गुजरता तो सच कहूं आपसे, हवा में मुट्ठी बांधकर नारे लगाता, बीस कदम ज़रूर उनके साथ-साथ जाता. इतने तो नेक मानवीय भाव थे मन में कि आपके फ़ोन ने सारा क्रम बिगाड़ दिया. आसमान में था खींचकर नीचे उतार दिया. छूटते ही क्‍या-क्‍या उलटे सवाल करने लगे, पहली मई के सुनहरे दिवस को ज़हर से भरने लगे. आप भी, मित्र, जाने किस धरातल पर रहते हैं, अपनी कुंठा दूसरे के कपाल पर फोड़ने को सामाजिक चिंतन कहते हैं.

अब ऐसे सवालों का क्‍या मतलब हुआ- आखिर बुद्धि या ज्ञान किसलिए? इसीलिए न कि मनुष्‍य जिन समस्‍याओं व संकटों से रूबरू होता है, उनका समाधान खोज सके, उनको समझने-बूझने का दिशा-दर्शन प्राप्‍त हो? आगे आपने फ़रमाया- पिछली सदी के उत्‍तरार्द्ध की यह घोर विडम्‍बना रही कि साठ के दशक के बाद जितनी समस्‍याएं मनुष्‍य-समाज के हिस्‍से आईं, उनके बारे में नागरिकों को समझाने की क्षमता बुद्धिजीवियों में नहीं रह गई! गरीबी, बीमारी, अशिक्षा, बेरोज़गारी, भ्रष्‍टाचार, गुलामी, युद्ध, असम्‍मान, आत्‍महत्‍याएं किसी एक भी मुश्किल से समाज कैसे छुटकारा पाये इसका कोई जवाब था तुम बुद्धिजीवियों के पास? विश्‍वासपूर्वक बता सकते हो गांव और धर्म का भविष्‍य क्‍या है? अगली सदी में बचा रहेगा गांव का अस्तित्‍व, रहेगा तो किस तरह का होगा वह गांव? उसके आगे गांधी, लोहिया, चीन से युद्ध की स्‍मृति और भी जाने क्‍या-क्‍या तो आप बकते रहे. सुनना तो हमने कभी का बंद कर दिया था बस हूं-हां कर-कर के थकते रहे थे.

आप भी गजब करते हैं, मित्र! तीसरी दुनिया के देश में जहां प्राथमिक शिक्षा व स्‍वास्‍थ्‍य का सवाल अभी भी गड्ढे में गिरा हुआ है, आप बुद्धिजीवी पर कीचड़ उछाल रहे हैं. खुद एक पैर एनजीओ दूसरा कंपौंडरी तीसरा गांव की ज़मीन में धंसाये हमको बुद्धिजीवीपना सीखा रहे हैं. अब जो हैं सो हैं क्‍या कीजियेगा. कंप्‍यूटर के बाजू में अगरबत्‍ती जलाते हैं ज़रूरत लगने पर पूंजी की प्रशस्ति गाते हैं और बुड़बकों के बीच बुद्धिजीवी कहाते हैं.

(किशन पटनायक के निबन्‍धों को पढ़ते हुए)

2 comments:

  1. Sahi hai.... Pramod ji...

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  2. समीचीन है.. और आनन्ददायक भी है..

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