Wednesday, May 2, 2007

फारसी में फ़ोन पर चेतावनी और क्‍लाइमैक्‍स की ओर..

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: सैंतीस

अचानक गोविंदा के गिल्‍बेर्तो पान्‍ना के जैकेट की जेब में फ़ोन का वाइब्रेटिंग बज़र बजा. तब तक रवीश की आंखें टेबल की अपनी चाल से उठकर मुझपर पड़ी और पथरीले सन्‍नाटे में वहीं गड़ी रहकर मुझे अस्थिर बनाने लगीं. गोविंदा यह देखकर चौकन्‍ना हुआ, फ़ोन मेरे हाथ में फंसाता फुसफुसाकर बोला- सम्‍भालो इसे, तुम्‍हारा कॉल है! तुम साले हमें भी फंसाओगे!..

रवीश की पथरीली निगाहों से अपना एक्‍सरे कराता मैंने फ़ोन कानों से सटाया- हैलो?..

दूसरी ओर घबराई हुई रेहाना थी. फारसी में चीखकर अपना गुस्‍सा निकाल रही थी- व्‍हॉट द हेल यू थिंक यू आर अप टू? आई आक्‍स्‍ड यू टू स्‍टे विद् द इंडियन बट यू डिसरिगार्डेड मी एंड वेंट इनसाइड द डेंजर ज़ोन! इफ समथिंग नैस्‍टी हैपेंस हू वुड बी रेस्‍पोंसिबल फॉर यूअर आस, बास्‍टर्ड?

तपती गर्मी में जैसे पहली बरसाती फुहार पड़ी हो, रेहाना की आवाज़ सुनकर मन वैसे ही ताज़ादम हो गया. उसे सफाई देकर मैं खुद को डिफेंड करना नहीं चाहता था, बस थोड़ी देर उस आवाज़ को और सुनते रहने की भोली तमन्‍ना थी. एक बार फिर उससे बीस वर्ष पहले के ओरहान पामुक के ‘बर्फ़’ वाला सवाल निर्दोष तरीके से पूछ लेना चाहता था कि उसकी मार्फ़त मेरे जीवन में प्रेम और सुख वापस लौटेगा, या पामुक की तीन सौ पृष्‍ठोंवाली किताब के अभिशप्‍त नायक की तरह सपने व नीमबेहोशी में यहां-वहां भटकता मैं सिर्फ़ एक लाचार व निर्मम मृत्‍यु की तरफ बढ़ रहा हूं? शायद इतने आर्टिकुलेटेड तरीके से नहीं लेकिन कुछ ऐसी ही प्रा‍थमिक चिंता थोड़ा घरेलू अंदाज़ में रेहाना के आगे रखना चाहता था. रवीश कुमार की बर्फीली नज़रों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करते हुए, स्‍वर में अतिशय मिठास भरकर फ़ोन को लगभग पुचकारते हुए मैंने कहा- यह सही है, डियर, कि हमारे बीच उम्र का इतना फ़ासला है, और इस विषय में तुम्‍हारे घरवाले क्‍या सोचते हैं इसका तुमने कभी खुलासा नहीं किया, लेकिन मुझे लगता है जब सच्‍चे अर्थों में प्रेम गहरा हो..

मैं भूमिका बनाकर अभी असली मुद्दे पर आता इससे पहले ही लड़की उखड़ गई. फारसी में ऐसी गंदी और भद्दी गालियां बकने लगी जिसका व्‍यवहार अंतरंग रूप से एक-दूसरे को जाननेवाले प्रेमी-युगल ही किया करते हैं, और जिसमें तांकझांक करने का समाज को कोई हक़ नहीं बनता. इसीलिए गालियों का बुरा मानने की बजाय, कान के रास्‍ते उन्‍हें देह के अन्‍य हिस्‍सों में उतारता मैंने बात आगे बढ़ाई, मगर तब तक रेहाना बेग़म झल्‍लाकर फ़ोन काट चुकी थी! और बुझे मन से फ़ोन लौटाने के लिए मैं गोविंदा की तरफ पलटा तो ये जनाब भी जाने भीड़ में कहां कट चुके थे!

फ़ोन का बज़र फिर बजना शुरू हुआ. इंस्‍ट्रूमेंट कान से लगाया तो दूसरी ओर अभय की बौखलाई आवाज़ थी- आप भी हद करते हैं, भाई साहब! हम यहां दूसरी चीजें संभालें कि अब आपकी सुरक्षा के पीछे परेशान हों? अगला निर्देश मिलने तक वहां से हिलियेगा नहीं, समझ रहे हैं?..

बिना पलक गिराये रवीश की आंखें अब तक मुझे घूर रही थीं. गोद की मिस्री बाला को एक ओर परे ठेल अबकी रवीश अपनी जगह से उठ खड़े हुए. एकदम मुस्‍कराने लगे. मानो गांव से आए मेहमान के स्‍वागत की मानसिक तैयारी कर रहे हों. मुझे समझ नहीं आ रहा था यह कहानी आगे कौन-सा टर्न लेनेवाली है. आखिर रेहाना और अभय मेरी सुरक्षा पर इतना जोर क्‍यों दे रहे थे? मेरी जान अगर मसला थी तो वह रवीश बहुत पहले और बहुत आसानी से ले सकता था! बात शायद उससे कहीं ज्‍यादा पेचीदा थी. मगर क्‍या थी? गोविंदा के फ़ोन को हाथ में लिए मैं अपने विरूद्ध और सबूत खड़े करना नहीं चाहता था. जितनी जल्‍दी हो फ़ोन से मुक्‍त होना चाहता था. कि तब तक किसी ने कंधे पर हाथ रखकर मेरी मुश्किल आसान कर दी. लाइये, इसे मुझे दीजिये कहकर हाथ से फ़ोन खींच लिया. मैं हकलाकर प्रतिकार करना चाहता था मगर थ्री पीस सूट में रघुराज के रौबिलेपन पर नज़र गई तो उसी तरह बीच हकलाहट में ख़ामोश भी हो गया. रवीश धीमे-धीमे मेरी तरफ आ रहे थे और धीमे-धीमे ही पूरे हॉल की हवा बदल रही थी. हर कोई मेरी ओर ऐसे देख रहा था मानों मैं बीस वर्ष पहले के निठारी का कुख्‍यात हत्‍यारा होऊं!

हाथ में माइक लिये बीसेक साल की एक लड़की जिसे मैंने पहले कभी देखा नहीं था, मेरी ओर इशारा करके चिल्‍लाई- इसी बदमाश की वजह से हम सबका जीवन नर्क हो गया है! इसके ब्‍लॉग ने हम सभी के ब्‍लॉग को खा लिया है!..

(जारी...)

1 comment:

  1. दिलचस्प मोड़ पर आ गई है कहानी.. अब अगली कड़ी जल्दी दीजिये..

    ReplyDelete