Thursday, May 3, 2007

फिर वही बेसुरा

सच कहता हूं लाल-नीले रंगो के मैंने ढेरों संगीतमय सपने देखे हैं. सितार तबला जानता तो वही पीटता बजाता. बहुत छुटपन से एक शब्‍द सीख गया था कला, घर में जगह और जीवन में ज़रा सहूलियत होती तो एक पूरे कमरे में एक्रिलिक का कारोबार फैलाता. चार कदम पीछे हटकर कैनवस निरखता, गुनगुनाता. मेज पर अधखुले ट्यूब्‍स और सफ़ेद वाईन के बोतन की कम्‍पो‍ज़ि‍शन सजाता. बीच कला में रहता और कितना तो अमूर्तन में जाता! मगर देखिए, चिथड़ा तकिये की खोल-सा जर्जर, शब्‍दों की बेमतलब लटकन-सा रह गया हूं. तौल है न जिनमें अनुभव का मोल है. यह ज़ि‍द है कि क्‍या है जो खुद से की ज़ि‍रह को खिंचे चला जाता हूं. सोचता हूं क्‍या बकवास कर रहा हूं, और फिर बिन रुके वही बेसुरा गाये जाता हूं.

4 comments:

  1. बेखुदी का ये अलम न पूछो, मंजिलो से बढा जा र्हा हू :)

    ReplyDelete
  2. आप जिसे बेसुरापन कह रहे हैं. उसके भी बहुत क़द्रदान इस दुनया में हैं इसलिए दुखी होने की ज़रूरत नहीं है. पेंटर ना हुए तो क्या ख़ुद से जिरह करने वाले लेखक तो हैं ही. यहां से जाइये अमूर्तन में.

    ReplyDelete
  3. मैंने जो गलियों कूचों के कोनों अँतरों से खोज खाज के जो सस्ता सा हर्मोनियम खरीदा है.. वो भी तो ऐसी हे एक दबी कुचली हीनता से उमड़ता अरमान है.. गा पाने का.. आप जो जब कभी भी मुँह उठा के गा देते हैं.. बात करनी कभी मुश्किल.. सोचा है दूसरों के दिल पे क्या गुजरती है..

    ReplyDelete
  4. गाये जाएँ..
    इस मधुरता को सुनने वाले बहुत मिलेंगे, उन संभाव्य मिलने वालों के लिए गाये जाएँ!

    ReplyDelete