Friday, May 4, 2007

कवि का झोला

झोले में किताबें कविताओं की तीन और दो उपन्‍यास थे. एक आलोचना थी जिसकी भाषा पर आलोचक-समाज चमत्‍कृत था. सामाजिक चिंता पर भाषण का एक पुराना बदशक्‍ल ज़ेरोक्‍स था लखनऊ में छपी मार्क्‍सवाद की एक प्रागैतिहासिक कुंजी थी. नौकरी की बदली रुकवाने का एक आवेदन-पत्र था. जै श्री सत्‍यसाई की संध्‍या-सभा का निमंत्रण था. थोड़ी सब्‍जी और गेंहू के तीन दाने थे. एल्‍योपैथी की चार गोलियां और होम्‍योपैथी की एक पुड़ि‍या थी. पत्‍नी को फटकार और बच्‍चों के सुधार के नैतिक हवाई उपदेश थे. अंतर्देशीय पर गांव के मकान का पता और शहर की रिहाइश का प्‍लैन था. ढेरों भय और काफी सारी कातरता थी. नन्‍दन जी से गुहार और चन्‍दन जी से चिरौरी थी. एक नई लेखिका को लिखा ताज़ा पत्र और पुरानी से हाथ झाड़ने के चार सूत्र थे. मोबाइल का नया रिंगटोन और जलोटा जी के जालिम भजन थे. चिरकुटई की हाय-हाय और करुणा का एक गीतग्रंथ था. राज्‍य परिवहन निगम के बस का टिकट और जेट एयरवेज़ का रेट-लिस्‍ट था. गालियां और गलियां थीं. घमासान था दूर-दूर तक आसमान नहीं था.

7 comments:

  1. स‌ाल भ‌र किन किन विष‌यों प‌र क‌वित‌ा क‌रनी है इस‌की एक सूची भी थी.. और किन किन‌से उठ‌ाप‌टक के क्य‌ा क्य‌ा हिस‌ाब चुक‌ाने हैं इस‌क‌ा एक लेख‌ाजोख‌ा भी थ‌ा..

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  2. और भी बहुत कुछ था.

    चिरकुटई थी, चिरकुट के पते थे , शब्द थे , शब्दों के नये अर्थ थे , सूखी हुई स्याही वाली पैन थी, लीक होती हुई डॉट पैन थी. बिना काम की चाबियों का गुच्छा था. आंखों की निरीहता थी,मन का गुस्सा था. बच्चों के उलाहने थे, बीबी की फटकार थी, संपादकों से लौटे अस्वीकृति के पत्र थे .

    लेकिन आपको ये सब पता कैसे चला कि क्या क्या था. कहीं आप भी .....??

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  3. काकेश प्‍यारे,
    काफी सारा कांव-कांव भी है.. वह तो बताने से रह ही गया.. आपके कान में कह रहा हूं.. दूसरों से मत कहियेगा.. ट्रेड सीक्रेट है.. यही तो ले-देके ज़रा-सी पूंजी है.

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  4. Khaalis Pramodi shilp.Bahut achhe.

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  5. आसमान की उम्मीद तो कम अज कम बचा के रखते प्रमोद जी.

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  6. अपने झोले में (कवि के नहीं)हमारी थोड़ी 'वाह-वाह' रख लीजिए.

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  7. कवि बहुत अमीर लगते हैं। कवि जी को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में जेल जाने से बचने के लिये अग्रिम जमानत की व्यवस्था कर लेनी चाहिये!

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