एक ललित निबंध

लेखक: लालित्‍यपूर्ण मैं

जो कहते हैं मुश्किल है वो गलत कहते हैं. आप देखियेगा बुरी हिंदी लिखना वज़न घटाने या ब्रह्मचर्य का पालन करने जितना कष्‍टकर नहीं है. न आज के ज़माने में शरीफ़ या ईमानदार बने रहने जैसा टेढ़ा काम है. इसके लिए बस आंखें खुली रखने व थोड़ी सी चतुराई की दरकार है. अगर आप हमारे सुझावों को मोटा-मोटी नियमित रूप से अभ्‍यास में लाते हैं तो आप फट या झट (फटाफट कतई नहीं!) देखेंगे, आप बुरी हिंदी में चल निकले नहीं, दौड़ रहे हैं! हमें ताजुब्‍ब होता है इस संबंध में भारतीय क्रिकेट टीम से सबक लेने की बात अभी तक किसी ने प्रस्‍तावित कैसे नहीं की? चलिये, किसी ने नहीं की, हम करते हैं. अब इस बार के विश्‍व कप में भारतीय टीम के प्रदर्शन को लीजिये. उसने विशेष तैयारी की? रात-दिन अपना जीना हराम किया? (वो तो आप और हम कर रहे थे और पूरी तरह से गलत कर रहे थे!) फिर टीम इंडिया क्‍या कर रही थी? अपनी आंखें खुली रखी थी, और थोड़ी नहीं काफी चतुराई से खेलती रही और खराब प्रदर्शन का बेमिसाल रिकॉर्ड बनाने में अभूतपूर्व रूप से सफल रही! क्‍या यह बुरी हिंदी सीखनेवालों के लिए प्रेरणा-पुंज नहीं है? सोचने की बात है. सोचिये, सोचिये. क्रिकेट में आपकी दिलचस्‍पी नहीं है? अरे, सचमुच? तो ठीक है, भाड़ में जाने दीजिये क्रिकेट को, हिंदी फ़ि‍ल्‍मों से प्रेरणा लुटिये, बटोरिये! तुषार कपूर, एमरान हाशमी, देओल बंधुओं व बच्‍चन जूनियर को अपना आदर्श पुरुष बनाइये. कितनी स्‍वत:स्‍फूर्त सहजता से वे खराबेस्‍ट अभिनय करते रहे हैं और उनके चेहरों पर शिकन तक नहीं आती! क्‍या इन स्‍वस्‍थ, हृष्‍ट-पुष्‍ट उदाहरणों का समाज इस्‍तेमाल करने से वंचित रह जाएगा? आप नहीं करेंगे? फिर आप कैसे बुरी हिंदी में चरम उत्‍कृष्‍टता पाने की हसरत पाले बैठे हैं?

बुरी हिंदी के लिए दो-तीन-चार-पांच बातों का विशेष ध्‍यान देने की ज़रूरत है. पहला तो यह कि किताबें और अख़बार पढ़ना पूरी व बुरी तरह से बंद कर दें. किताबें पढ़ने का वैसे भी आजकल किसी के पास वक्‍त नहीं रहता, धीरे-धीरे चलन छूट रहा है, तो उसमें समस्‍या नहीं है. मगर अख़बार बंद करने के ख्‍याल से कुछ मित्र किंचित उद्वि‍ग्‍न हो सकते हैं, क्‍योंकि सुबह-सुबह अख़बार से ही उन्‍हें चित्रपट के अपने ईष्‍टदेवों के प्रथम दर्शन सुलभ होते हैं. हम समझ रहे हैं यह बड़ा बलिदान होगा लेकिन बुरी हिंदी के हित में उन्‍हें यह बलिदान करना ही होगा! ईष्‍टदेवों के दर्शन के साथ डोलता मन इधर-उधर तांकझांक के लोभ से मुक्‍त नहीं रह पाता और साहित्‍य-खंड पर नज़र जाते ही बुरे भाषाई प्रभावों की तत्‍काल संभावना बढ़ेगी, और हमें डर है, बुरी हिंदी का इससे बड़ा नुकसान होगा. तो किताबों के साथ-साथ अख़बार से भी बचें. स्‍ट्रॉंगली रेकमेंडेड. जिन्‍हें किताबों को तकिये के नीचे डाले बिना सोने में परेशानी होती है, या कमरे में इधर-उधर किताबें बिखेरे बिना जीवन सूना-सूना लगता है, उन मित्रों को सलाह है- वे जासूसी की तरफ उन्‍मुख होवें. पिछले दिनों बुरी हिंदी के शत्रु खेमे में रवीश कुमार ने अपने बदनाम लेख में गलत ही बयानबाजी की है कि निम्‍नमध्‍यवर्गीय घरों में ‘टाईम्‍स ऑफ इंडिया’ मंगवाकर बच्‍चे अंग्रेजी सीख रहे थे. हमारे तो संस्‍मरणात्‍मक शोध यही बताते हैं कि इस उच्‍चादर्श की पूर्ति जासूसी के सरताज जेम्‍स हैडली चेज़ और हैरल्‍ड रॉबिन्‍स की रचनायें कर रही थीं! शत्रु खेमे के उल्‍टे-सीधे बयानों पर ध्‍यान दें न कान दें. और चेज़ को नहीं हिंदी के वेदप्रकाश काम्‍बोज को अपना प्रेमचंद और ओमप्रकाश शर्मा को निर्मल वर्मा मान लें. फिर भी जी नहीं भरता तो अस्‍सी-अस्‍सी पेजी पुस्तिकायें आती हैं (समझदार को इशारा काफी), उनसे ज्ञानाजर्न करें. इससे अलग बुरी हिंदी की उच्‍च स्‍तरीय ट्रेनिंग के लिए ब्‍लॉग-साहित्‍य का मार्गदर्शन है ही! चरम-परम प्रेरणा कीर्तिस्‍तंभ मेरा ही ब्‍लॉग है! हां, कुछ बदकार ब्‍लॉगकार हैं जिनसे विशेष तौर पर सावधान रहने की ज़रूरत है! खासकर अनामदास या निर्मल-आनन्‍द. इनके सामने पड़ते ही आगा-पीछा सोचे बिना तत्‍काल कंप्‍यूटर शट डाऊन कर दें! इनका और चाहे जो भी गुप्‍त एजेंडा हो, बुरी हिंदी को बिगाड़ने का काम ये बहुत स्‍फूर्ति व चतुराई से कर रहे हैं! कस्‍बा देख सकते हैं बशर्ते रवीश कुमार हिंदी की जगह अंग्रेजी में अपने पोस्‍ट चढ़ाने लगें.

बुरी हिंदी दुरुस्‍त करने के लिए इसके सिवा चंद और बातों को ध्‍यान देने की बात है. पहली तो यह कि एक छोटा, टिकाऊ, मजबूत नोटबुक खरीदें. वो सारे शब्‍द जो अलग-अलग मौकों पर आपमें भय जगाते रहे हैं, मसलन- ‘अकिंचन’, ‘शब्‍दाहत्’, ‘निस्‍त्राण’, ‘अनिमेष’- इनकी एक विस्‍तृत सूची बना लें, और लिखने के द‍रमियान जब उलझन हो, वाक्‍य में ऐसा एक शब्‍द गूंथ दें. देखियेगा भाव की मार्मिकता कैसे तत्‍क्षण सप्राण हो उठेगी! इसके साथ-साथ यह भी कर सकते हैं कि हर पैरा के अंत में दोहा-ग़ज़ल की दो लाइनें ठेल दें. ज्‍यादा अच्‍छा हो ऐसी ज़बान से टिपियाई गई हो जो आपकी अपनी न हो! इससे एक सीधा फ़ायदा यह होगा कि भाव का सामंजस्‍य बैठ रहा है कि नहीं सोचते हुए आप माथाफोड़ी नहीं करेंगे. बुरी हिंदी लिखना शुरु करेंगे और दौड़ते हुए सबसे आगे निकल जाएंगे!

शाबास, चलिये, आज ही से अभ्‍यास पर लग जाइये!

(अप्रगतिशील ग्रंथमाला, बुरी हिंदी का भाषाशास्‍त्र; रणनीति और सबक, मजदूर दिवस पर विशेष आयोजन)

 
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अनामदास - May 5, 2007 5:48 AM

बहुत अच्छे. बदनाम करना कोई आपसे सीखे.

अनूप शुक्ला - May 5, 2007 7:19 AM

खराब हिंदी के प्रचार-प्रसार की जब भी बात चलेगी
आपके इस लेख को ऐतिहासिक महत्व दिया जायेगा!

"....बुरी हिंदी लिखना शुरु करेंगे और दौड़ते हुए सबसे आगे निकल जाएंगे!....
मैं तो समझता था कि सबसे आगे निकलने के लिये लिखना नहीं सिर्फ कट/कॉपी-पेस्ट करने में सिद्धहस्तता पर्याप्त है.
हिन्दी - चाहे जैसी हो, बुरी या अच्छी, लिखने में मेहनत है.

Anonymous - May 5, 2007 11:05 AM

अजदक न हो तो हंसी के सारे कारण खत्‍म हो जाएं।

Pramod Singh - May 5, 2007 11:10 AM

बेनाम महोदय,
इस बार चुपके से कहकर निकल गए मगर आईंदा से ध्‍यान रखें.. ऐसे गूढ़ भावार्थों वाली टिप्‍पणी भेजकर बुरी हिंदी को खराब करने का षड्यंत्र न करें! हद है!

Mired Mirage - May 5, 2007 11:42 AM

तो भाई हम अब तक क्या कर रहे थे ? इसि महा संगरामय मैं तौ लगै हुवे थै !
घुघूती बासूती

अभय तिवारी - May 5, 2007 1:32 PM

अब ह‌म क्य‌ा बोलें.. आपने तो पह‌ले दिन से ही ह‌में प‌त‌न‌शील स‌ाहित्य की ज‌म‌ात से ब‌ाह‌र रख‌ा है.. और आज भी व‌ही किय‌ा..

Hariraam - May 5, 2007 1:35 PM

हिन्दी और बुरी? इसके लिए प्रयास की क्या जरूरत? कुछ कहते हैं...

शेष कहते हैं... सचमुच बड़ा भारी प्रयास करना होगा...

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