Sunday, May 6, 2007

क्‍या कवि कविता से बड़ा है?

सौ प्रतिशत. शंका हो तो इंचीटेप लेकर नाप लीजिये. मगर बहुत सारे लिखवैया हैं, जिनका लिखा उनकी पत्‍नी को समझ आता है न पत्‍नी के प्रेमी को, मौका मिलते ही पजामे से बाहर होने लगते हैं कि नहीं, नहीं, कविता बड़ी है! कविता बड़ी है!- ऐसे में हमारी इच्‍छा तो यही होती है कि इनके आगे इंचीटेप ले जाके माप नहीं दें, गर्दन में इंचीटेप फंसाकर वहीं इनको चांप दें! हद है. इन्‍हीं लिखवैयों की वजह से हिंदी कवि का कद आज तक मोहल्‍ले के धोबी तक की नज़र में छोटा बना हुआ है. घर की बाई, नेतराम हलवाई, बंटु की इंगलिश टीचर, दीनानाथ फटीचर सबकी नज़र में छोटा बना हुआ है. कविता भी बहुत हाइट नहीं पाई है मगर उस विषय पर हम फिर कभी लौटेंगे. आज अभी कवि की लंबाई फरिया लें! आप बस इस सिंपल से तथ्‍य पर गौर कीजिये. कभी भी पैदा करनेवाले से पैदा होनेवाला बड़ा हुआ है भला? हो सकता है? इज़ इट पॉसिबल? राज कपूर से रंधीर कपूर बड़े हो सके थे? नेहरु के बाद इंदिरा को देखिये. हिंसा और अत्‍याचार में भले बढ़ीं मगर कद में? अमिताभ कितना विज्ञापन बेच रहे हैं, बेटा क्‍या बेच रहा है? एक कार और मोटोरोला! यही ना? धीरुभाई ने ऑस्‍ट्रेलियन पत्रकार की रिलायंस संबंधी किताब की सारी कापियां पूरे देश से उठवा ही नहीं ली, देश में उसके घुसने तक को सील कर दिया था! बेटे क्‍या कर रहे हैं? आपस में ही एक-दूसरे का भंडाफोड़ कर रहे हैं! अमर सिंह और लालू यादव के बारे में आप कितना जानते हैं लेकिन उनके बेटों के बारे में जानने का यही आत्‍मविश्‍वास है आपके पास? इसीलिए नहीं है कि बेटे, बेटे हैं. छोटे हैं. उसी तरह से कविता, सांध्‍यकालीन दैनिक के साहित्यिक परिशिष्‍ट में या बेगुसराय की लघु पत्रिका की चिरगिल्‍ली छपाई में दबी कहीं एक चिरगिल्‍ली कविता मात्र होती है, आयकर विभाग में नियुक्‍त या पॉवर ग्रिड का कार्यभार उठाये कवि की ऊंचाई की किसी भी सूरत में बराबरी नहीं कर सकती! दावा तक नहीं कर सकती.

सिरफिरे लिखवैया हल्‍ला करते हैं कि कवि मर जाता है, कविता नहीं मरती (अबे, तुम कवि को मार क्‍यों रहे हो? क्‍यों मार रहे हो, बे? हम आके तुम्‍हें मार दें फिर सारा बें-बें बोलना बंद हो जाएगा! एक ही बार! साले, बात करते हैं! और आपलोग सुनते हैं!)! यह बात सरासर गलत है. अब ज़रा आगे उद्धृत पंक्तियों पर गौर करें: ‘धीर-नीर सब बह गए मन मुरझाया पाता (पत्‍ता) है. किस कोने-अंतरे, ओ प्रिये, अटकी हो आ जाओ अंकवार भरो.. आदि-इत्‍यादि’ इन पंक्तियों का आपको स्‍मरण नहीं होगा. इसीलिए स्‍मरण नहीं होगा कि इन परम-प्रिय पंक्तियों के रचयिता श्री देवानंद जी चौरसिया, जिन्‍होंने हमारे अंधेरी क्षेत्र में ही दुग्‍ध-विक्रय के सुस्‍वादु पेशे से न केवल अपार धन व जन जीता था, जान फूंकनेवाली ऐसी प्रेमिल कवितायें भी रची थीं. अब चूंकि वह जान छोड़कर परलोकवास सिधार चुके हैं, तो उनके पीछे-पीछे उनकी कवितायें भी बेजान और मुर्दा हो रही है! अब एक दूसरा उदाहरण देखिये: ‘ले गई ले गई दिल ले गई ले गई’. कविता से चट से कनेक्‍शन बनता है! क्‍यों बनता है? भई, इसीलिए बनता है कि इन पंक्तियों का जनक- मैं- अभी आपके बीच जिन्‍दा हूं, हाथ-पैर मार रहा हूं. जिस दिन हाथ-पैर फेंकना बंद कर दूंगा, आप देखेंगे, ‘ले गई ले गई दिल ले गई ले गई’ भी उसी दिन तेल होकर फर्श पर लोटने लगेगी.

कवि सत्‍यत: कविता से बड़ा होता है. प्रमाणसिद्ध है. कविता कुछ नहीं होती. कागज़ की पुड़ि‍या होती है. आप आयकर विभाग की नौकरी में हों, तो विभागीय लेटरहैड पर दस कवितायें टाइप कराके किसी पत्रिका के संपादक के पास भेजिये. देखिये, कैसे बायें-दायें गिर-गिरकर वह आपकी कवितायें छापता है. आप कहेंगे, अरे, क्‍या कर रहे हैं, संपादक जी, छापने की क्‍या बात, हमने तो ऐसे ही आपको देखने के लिए दिया था? संपादक जी गिड़गिड़ाकर रोने लगेंगे, कि ऐसे अनूठे मणिरत्‍नों को छापने से रोककर आप हमारा ही नहीं, समूचे साहित्‍य का अपमान कर रहे हैं! अब उन्‍हीं कविताओं को आप नेतराम हलवाई के नोटपैड पर टीपकर उन्‍हीं उक्‍त संपादक जी तक पठाइये. एक ही हफ्ते के अंदर सप्रमाण जान जाइयेगा कि वह समूचे साहित्‍य का तो कर ही रहे हैं, नेतराम हलवाई के अपमान में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं!

बाज़ आइये कविता को कवि से ऊपर नापने में. नहीं आइयेगा तो इंचीटेप लेकर हमें आना होगा. आपको नापने!

(रविवारी अप्रगतिशील स्‍टडी-सर्किल में पढ़ा गया पर्चा)

7 comments:

  1. भाइ वाह.......................
    वाह
    वाह
    वाह
    वाह
    वाह
    वाह
    वाह
    \वाह
    वाह
    वाह
    वाह
    वाह
    वाह
    वाह
    वाह................क्या करूं....इसके अलावा कुछ निकल ही नही रहा है मुंह् से..............

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  2. कौन नापेगा इंचीटेप से…जिसे आज तक कोई साध न पाया वह कैसे सधेगा…आश्चर्य!!
    कवि तो बड़ा हो ही नहीं सकता…बड़ी तो भावना होती है…जो नदी की तरह प्रवाहमान और गतिशील है जिसपर बैठकर कवि अपनी नैया खेता है…।
    जो मन से कवि होता है वह यह नहीं सोंचता की उसे या उसकी रचना को याद किया जाएगा या नहीं वैसे भी मन के स्वयं गीत को खुद ही गुनगुनाया जाता है…निराला ने तो सोंचा भी न था की उनके मरने के बाद कहाँ होगें…ऽउर जो भूले हैं उसमें हमारी गलती है नहीं तो बाहरी साहित्य को पढ़ने और दिखाने का शौख तो सभी को होता है मगर टैगोर को कौन पढ़ना चाहेगा!!

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  3. कवि बड़ा होता है । बस । कविता कवि के बड़े होने से बड़ी होती है। मगर कुछ कविता ऐसी भी होती है जो कवियों को बड़ा बना देती है। लेकिन फिर बात वही। पहले मुर्गी या अंडा। हम सब कवि के साथ खड़े हों। कविता अपने आप खड़ी हो

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  4. भई हम तो यह नही समझे कि आप इस तरह की जाँच कर ही क्यो रहे है ? और जो उदाहरण अपने दिये वे हास्यास्पद हैं ।
    कुछ कविताएँ कवि का कद बढ जाने से बडी हो जाती है तो कुछ अपने बडे कद से कवि का पद बढा देती हैं।
    निराला, प्रसाद ,मुक्तिबोध जैसे कई कवि जीवित नहीं पर उंकी रचना जीवित है और आदर पा रहीं है । कवि नही , रचना काल्जयी होती है , और इसलिये कवि अमर हो जाता है । केवल साहित्य नही किसी भी विषय की रचना के साथ यह होता है ।
    कम से कम मेरे ऐसे विचार है।

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  5. भई नोटपैड जी, उंकी किंकी रचना जीवित है? प्रसाद, निराला, मुक्तिबोध? आपको कंठस्‍थ है एक भी? चलिये, 'डालो न नाव इस ठांव' सुना दीजिये. या फिर 'बादल राग'! याद नहीं पड़ता? अब यही बात 'ले गई ले गई दिल ले गई ले गई' के बारे में नहीं कही जा सकती. समाज के चित्‍त व मन में स्‍वस्‍थ्‍य हरे-भरे पौधे की तरह बसा हुआ है! प्रगतिशीलता के दोष हैं, उनकी जब तक ठीक-ठीक पहचान नहीं होगी, इस तरह की उलझनें बनी रहेंगी. आप हमारे मणिरत्‍नों को इस तरह स्‍वच्‍छंद भाव से 'हास्‍यास्‍पद' पुकार रही हैं, हमारे हृदय को अतिशय ठेस पहुंची है.. इस तरह से आपलोग न करें. शैशवावस्‍था में अप्रगतिशील आंदोलन लड़खड़ा गया तो आपके माथे बहुत पाप चढ़ेगा!

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  6. ऐ चन्दनवा.. का वाह वाह किये जा रहे हो.. कुछ जीबन को लेके कोई गम्भीर समझ है कि नहीं.. कि सारा बात हँसी खेल में ही करके समझ लेना चाहते हो.. हुर्र्र..हट..
    और सुनिये प्रमोद बाबू... ये का आप जब देखिये तब हिन्दी और हिन्दी के कवि की धोती खोलते रहते हैं.. आप को कौनो लाज सरम है कि नहीं..कवि जैसे सेनसीटिब और भद्द पुरुख का मखौल करते हैं.. का आप कहना का चाहते हैं.. कि इ जो सार कबि लोग बड़का साहित्यकार बन के घूम रहा है वो सिर्फ़ अपने रोब दाब के चलते.. ऐसा तो हम कोई कबि नहीं देखे जो कबि भी हो और रोबीला भी हो.. हां ये जरूर देखे हैं कि कवि भले ही बड़का होने का कितना ही डिरामा कर ले.. उस्का गीत कार से कभी कोई मुकाबला नई हो सक्ता..एक तो कबि का सामाजिक स्थिति वैसे दांड़ है और आप ऊपर से..
    और आप जिस ले गई ले गई का बार बार जिकर कर रहे हैं वो हमारे प्रिय गीतकार आनन्द बख्सी जी का काल्जई गीत है.. और ये बात हमई नहीं हिन्दुस्तान का हर वो आदमी जान्ता है..जिसने प्यार किया है ..और यश चोपड़ा जी की प्यार की अमर रचना दिल तो पागल है देखी है.. का पिक्चर थी भाईसाब.. अभी भी सोच के रोआँ खड़ा हो जाता है..
    तो आखिर में आप से बिनम्र निबेदन है कि बाज आइये.. और कबि को जीने दीजिये..

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  7. daalo na naav' naheen, baandho na naav. hindi me aisi bhool kar ke shreemaanji aap hindi ko kahan le jaaoge..
    irfan

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