Monday, May 7, 2007

राग केदार की ज़ालिम बहार

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: चालीस

धड़-धड़, भड़-भड़ हर तरफ फ़ौजी भरने लगे. थोड़ी देर पहले जहां सुन्‍दरियों की बेली और बुशम्‍स की छटायें थीं, अब फ़ौजी चहल-पहल की घटाओं से पट गया. अत्‍याधुनिक हथियारों की खनक और भावी हत्‍याओं की महक गूंजने लगी. अपनी दिनेश ठाकुर वाली अदा के साथ-साथ अभय का इस तरह सभा में हाथ हिलाते चले आना जोकरई लग रही थी. कहानी में एकदम-से मोड़ आ गया था और यह मोड़ मुझे कहां मोड़नेवाली थी इसे सोचकर सचमुच चिंता होने लगी. अपने को तो देखने का सवाल नहीं ही उठता था, मगर अभय को भी अपनी आंखों के आगे मरते नहीं देखना चाहता था! जीवन में देखी मौतें और उन क्षणों में अपनी बेचारगी की याद हिलाने लगी. हिलाती रही. अभय को देखकर लग रहा था जीवित व्‍यक्ति को नहीं, ज़ि‍बह होने जा रहे जानवर को देख रहा हूं..

हालांकि अच्‍छा हुआ अभय ही आया, रेहाना नहीं आई. रेहाना को ज़ि‍बह होने को जाते देखना मर्मांतक होता. या रेहाना नहीं आई थी, क्‍यों अभय आ गया था, और कहां जाने के लिए आया था- जिसका भेद अपने को मेरी समझ और चातुरी से कहीं ज्‍यादा गहरा साबित करनेवाला था- रेहाना को उन परतों में देखना मेरे लिए तो मार्मिक नहीं हृदयविदारक साबित होती. खड़े-खड़े यूं भी प्राण-पखेरु उड़ गए होते! लेकिन क्‍लाइमेटिक कहानी में फिर एक नये मोड़ को देखने के लिए मैं चौंकन्‍ना जीवित बना रहा!

अभय के आते ही रवीश फ़ौजियों पर हल्‍ला करने लगे. थोड़ी देर बाद जाकर बात खुली कि उन्‍हें ललकार नहीं हतोत्‍साहित करने को हल्‍लाय रहे थे. हल्‍लाये न होते तो पता नहीं कितनी मैगजीनों की तड़तड़ाती गोलियों से अब तक अभय छलनी, क्षत-विक्षत ढेर हो चुका होता. मेरी आंखों से जार-जार अश्रुधारा बह रही होती. रवीश और ज़माने को मैं गालियां दे रहा होता. किन्‍तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ! जिस तेजी से फ़ौजियों ने अटैकिंग पोजिशन ली थी उसी तेजी से ‘लेट इट गो, मैन’ वाली पोजिशन में लौटकर छंट भी गए. माहौल तनावग्रस्‍त सिर्फ मेरे लिए बना रहा. बकियों के लिए शांत और सामान्‍य हो गया और रवीश वापस हंसने लगे. हाथ की बंदूक एक ओर उछाल अभय भी साथ देता हा-हा, खी-खी करने लगा! अविनाश, रघुराज, रतलामी, सूज़ी, सुनील, सिंबी, प्रैट्स, बैट्स, शक्ति, सैंडी सब हंसने लगे- मानो लारैल हार्डी की फ़ि‍ल्‍म देख रहे हों. प्रियंकर किताब के पीछे और अनामदास तीन बोतल नीचे करके हंस रहे थे. सिर्फ एक मैं ही था जिसकी घिग्‍घी बंधी थी, बकिया सब मस्‍ती की बस्‍ती में विचर रहे थे. मगर अभय हंस क्‍यों रहा था? रवीश के साथ क्‍यों हंस रहा था? कहीं ऐसा तो नहीं?.. क्‍या सचमुच.. ? मगर ऐसा क्‍या जीवन में होना संभव था?..

जिसकी आशंका में दिल उछलकर मुंह को आ रहा था, उसका अभय के उछलकर मेरे पास आने के साथ उसी क्षण खुलासा हो भी गया! इसके पहले कि मुंह खोलूं अभय ने आते ही एकदम अन-अभय टाइप बातें बोलनीं शुरु कर दीं- चौंकिये मत, प्रमोद भाई.. मैं भी आखिर मनुष्‍य हूं.. आप ही ने जबरजस्‍ती ऊंचे पैडस्‍टल पर बिठाल रखा था.. सारे समाज में नीचता घुसी बैठी है तो मैं कहां से एंजेलिक अवतार बना रहूंगा? कब तक अकेला धमा-चौकड़ी करुंगा? फिर चौकड़ी-सौकड़ी की उम्र होती है, स्पिरिट होता है.. चौकड़ी वाली अदाओं से अब मैं थक गया हूं. गंभीर होना चाहता हूं.. शास्‍त्रीयता में जाना चाहता हूं.. संस्‍कृत-फ़ारसी सीखना चाहता हूं.. आप समझ रहे हैं ना? रवीश ने कहा है जैसी भी मदद लगेगी, करेगा.. इंकार कैसे करता, बताइये? आपको तो जो-जो करम करने थे आपने कर लिये. कुछ हमलोगों के करने का भी तो फर्ज़ बनता है कि नहीं?.. नहीं, गलत कह रहा हूं तो आप काटिये हमें!

प्रस्‍ताव रखा लेकिन फिर काटने का मौका नहीं दिया. बात न कान. रवीश के ताली बजाने पर सब संगीत बंद हो गया और कालीन, दरी, गाव-मसनद पर झट शास्‍त्रीय संगीत की महफ़ि‍ल सज गई. मुझे ध्‍यान से हटाकर, भुलाकर अभय तानपुरा लेकर बैठ गए. मानो मैं माचिस की महज़ एक डिब्‍बी था जिसे वह पंसारी की दुकान में भूल आए थे और अब शास्‍त्रीयता की अलमारी में अपने कागज़-पत्‍तर व्‍यवस्थित करने के काम में जुट रहे थे. पता नहीं कहां से दो कोरियन कन्‍याएं टपकीं और कांजीवरम की सज्‍जा में वो भी अपना गाजा-बाजा लेकर अभय के साथ संगत में बैठ गईं. मैं सन्‍न था. सन्‍न से ज्‍यादा और भी बहुत कुछ था. कितनी आसानी से अभय ने पल्‍ला झाड़ लिया था! कितनी आसानी से समय, समाज, साहित्‍य के बीच मैं निबिड़ अकेला हो गया था! बट व्‍हॉट काइंड ऑफ स्क्रिप्‍ट वॉज़ दिस? वुडंट देयर बी एनी अंतोनेल्‍ला टू रिपोर्ट ऑन दिस नैस्‍टी ट्वि‍स्‍ट ऑफ डेस्टिनी? व्‍हॉट काइंड ऑफ अ डॉग्‍स एंड्स अवेट्स मी? बहुत सारे सवाल थे जो भोजपुरी में तेजी से दिमाग में घूम रहे थे, हालांकि किसी एक का भी जवाब सामने नहीं आ रहा था..

सारी लड़कियां, लड़के, बूढ़े गवैया और बजवैयनाओं के आजू-बाजू बैठ गए! अभय कुमार गंधर्व और मल्लिकार्जुन मंसूर की नकल के बीच घूमते हुए, भाव और मुंह बनाकर चायनीज़ में राग केदार गाने लगे. रघुराज घुटने पर थाप देने लगे. अविनाश बेचैन होने लगा. बुकवर्म भागकर पास आए, चिंहुककर अविनाश से बोले- यार, हम भी अच्‍छा गा लेते हैं! हमसे किसी ने क्‍यों नहीं कहा?

अविनाश ने मुंह बनाकर घड़ी देखी, थके स्‍वर में बुदबुदाये- बिना कहे आप हर रोज़ इतना और पता नहीं क्‍या-क्‍या गाते रहते हैं! अभी और क्‍या सुनाने को बाकी बचा है, मित्र?

अनामदास कालीन पर पीठ के बल लेट गए थे. माथे के नीचे पंजों का तकिया बनाये –बहुत सही, क्‍या बात है!- जैसे सुलझे उच्‍छावास छोड़ रहे थे. किसी ने कहा ‘तहलका’ इस पर कवर स्‍टोरी करनेवाली है. कोई एक नई लड़की थी, भागकर अविनाश के पास आई. पूछा- सर, ‘अहा! ज़ि‍न्‍दगी’ से आप बात कर लें तो मैं यहां की रिपोर्टिंग कर सकती हूं. रांची के एक चैनल में मेरा चार महीने का एक्‍सपीरियेंस है. अविनाश ने लड़की को भाव नहीं दिया. हाथ काफी पीछे ले जाकर मध्‍य-पीठ खजुवाने की कोशिश में असफल होता दुखी होने लगा. एक हसीना रूमाल और आईना निकालकर चेहरे की साज-सज्‍जा में व्‍यस्‍त हो गईं. कुछ बुर्ज़ुगवार केदार के भारीपने से थककर हांफने लगे और बेवजह समवेत हसन जमाल को गाली देने लगे. रवीश मुंह के अंदर-अंदर सीटी बजाते, टहलते मेरे पास आए और फुसफुसाकर बोले- इनको संगीत का आनन्‍द लेने दीजिये. आइये, तब तक अपन लोग आपकी कहानी कनक्‍लूड कर लें! यहां लड़कियां, औरते हैं.. कमज़ोर दिल के बुड्ढे लोग हैं, चलिये, अंदर अकेले में चलते हैं!

मैंने डरी हुई नज़रों से रवीश को देखा कि वह क्‍या, कैसे कनक्‍लूड करने की बहकी बातें कर रहा है? मैं इतने लोगों की सुरक्षित उपस्थिति से हटकर कहीं और अंदर के अकेलेपन में नहीं जाना चाहता! मगर मेरे चाहने का अब कुछ नहीं होना था.. पहले से लिखी जा चुकी स्क्रिप्‍ट के निर्वाह का मैं बस साधन मात्र रह गया था.. बांह पर रवीश की गिरफ्त वैसी ही थी जैसी मिथकीय कथाओं में यमदेवों की हुआ करती होगी. चाहकर भी पकड़ छुड़ा नहीं पा रहा था. रवीश मुस्‍कराते रहे. मैं खिंचा-खिंचा उनके पीछे जाता गया! राग केदार की ज़ालिम बहार दूर तक मेरी आत्‍मा को धीमे-धीमे छीलती रही..

(जारी...)

2 comments:

  1. वाह! आत्मा को भी छीलती रही? सुना तो यही था कि आत्मा अजर अमर अविनाशी... है। और मधुर केदार राग... वह भी कष्टदार बन गया?

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  2. बंधु हरिराम भाई,
    एमिति निज आत्‍मार कथा.. आउ किछि हेइ पारिब नाहिं.. कण करा जाय?

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