Wednesday, May 9, 2007

घर का रास्‍ता

कचारु, झीरपानी जाने किन दूर गांवों से दौरी ढोकर स्‍टेशन के बाहर इकट्ठा हुई हैं काली संथाली औरतें. कौन समझाये इनको कि अब नहीं खरीदता कोई केंदु, ताल और नीम के दतुअन. शहर की उम्‍मीद से बंधी बेचारी मगर रोज़ चली आती हैं. सारा-सारा दिन धूप में देह जलातीं जैसे यही जीवन का पथ्‍य हो.

एएच व्‍हीलर की गुमटी बंद है पता नहीं आखिरी दफा कब खुली थी. कोई बुर्ज़गवार ‘युगनिर्माण योजना’ खरीदकर ले गए थे या शायद पूछा था, आपलोग ‘आर्यावर्त’ रखते हैं? बरामदे के बाहर साइकिल टिकाकर भागा आया था अपनी ही तकलीफों में ऐंठा एक नौजवान, पता करने कब आ रही है ‘प्रतियोगिता दर्पण’. इस शहर का यही है, शिक्षा सोहाती नहीं है. एक तो खुलती नहीं दुकानें किताब की और खुलती हैं तो गिनना शुरु कर देती हैं अपने दिन.

जालियों से लगे खोमचे पर बंगाली छोकरा ‘सिंघड़ा’ और ‘लाडू’ नहीं बेच रहा. गमछे से मक्खियां उड़ा रहा है जलती गर्मी में भात का अदहन गरमा रहा है. मिनट-मिनट पर मुड़-मुड़कर थूकता है मानो जीवन में एक यह कौशल तो अर्जित किया ही है. स्‍टूल पर ऊंघते हुए सिपाही जी अचक्‍के में जागते हैं थककर लात चलाते हैं. पास खेलते मरियल कुत्‍तों से रेल-संपत्ति बचा ले जाते हैं.

हर बार रेल से उतरकर लगता है अबकी दफा वह जाने क्‍या खास खोया हुआ शायद हाथ आ ही जाए. हर बार दु:स्‍वप्‍नों की नई परतें फीक़ी बदरंग रंगों में खुलती हैं और खुलती चली जाती हैं.

3 comments:

  1. ये मुक्त गद्य तो मुक्ति का एक पूरा दरवाज़ा खोल देता है.. जैसा अनगढ़ सौन्दर्य छोटे कस्बों की अनुशासनहीनता में मिलता है.. वैसा ही आपके मुक्त गद्य के शिल्प में.. एक सुन्दर अनुशासन की उपस्थिति के बावजूद..

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  2. माटी की गन्ध तो कोई इस लेखन से ले. भैया, आप लिखते तो सरकण्डे की कलम से नहीं होंगे पर मजा वही आता है. बधाई लिखना तो औपचारिक लगता है.

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  3. बहुत सरल.. प्रवाहमान.. और हृदय को झंकृत करते भाव हैं.. सत्य भी और सवाल भी...

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