Wednesday, May 9, 2007

बीस वर्ष बाद से बीस वर्ष पहले..

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग और रवीश कुमार: बयालीसवीं और आखिरी किस्‍त

नीम बेहोशी में डूबता मैं अंधेरे में.. और ज्‍यादा अंधेरे में.. उतरता गया! बस इतने की सुध रही कि अविनाश मुझ पर झुका हुआ बुदबुदा रहा है- ये तो गए! प्रतिक्रिया शोक की थी या हर्ष की, इसे पहचानने का अब होश नहीं बचा था. इसका भी नहीं कि रुपाली पिस्‍टल फेंककर, भाग कर कमरे की दीवार तक चली गई, और हाथों से चेहरा ढंक के चायनीज़ में बड़बड़ाने लगी- ओह, माइ गॉड, व्‍हॉट हैव आई डन?.. रवीश सब काम छोड़कर रुपाली के रंग या तेजी से लाश में बदलते अपने एक परिचित के दु:खदायी अंत से द्रवित होने नहीं लगे, प्रिंटर से एक लंबा प्रिंटआऊट निकाल जोड़-घटाव में लग गए. ‘ब्‍लॉग बवंडर खतम हुआ, भइय्या. हर पोस्‍ट पर 2000 युआन चार्ज करना ज्‍यादा नहीं होगा. और हर कमेंट पर 100 युआन?.. सब मान जाएंगे, नहीं हो? मानेंगे नहीं तो हम मनवाना जानते हैं!’

पता नहीं किसके लिए, मगर रुपाली फूट-फूटकर रोने लगी थी. द बग उसके रोने में नहीं रवीश के हिसाब-किताब से हर्षित हो रहे थे. पुरानी आदत से चहककर हिंदी में बोले- लिसन, रवीश! वी हैव टू टर्न दिस जोकर इनटू सम स्‍टोरी! माई इंस्टिंक्‍ट्स टेल मी दैट पीपल माइट लाइक इट.. ब्‍लॉग्‍स इज़ द न्‍यू थिंग ऑन द ब्‍लॉक..

रवीश ने अपने हिसाब से नज़रें नहीं उठाईं, बॉस को बकते रहने दिया. अविनाश मुस्‍कराने लगा. रवीश के साथ रहते हुए वह बॉस के साथ भी है की छवि बनाये रखना चाहता था. द बग बेचैन होकर बोले- एंड अनादर थिंग.. आई वॉंट टू नो व्‍हॉट परसेंटेज आई अम गेटिंग आऊट ऑफ दिस बिज़नेस ऑफ युअर्स?..

इस बार रवीश युआन की गिनती रोक कर द बग के पास टहलते हुए आए और उनके गाल पर एक झन्‍नाटेदार तमाचा जड़ा. हिंदी में ही बोले- ये रहा तुम्‍हारा परसेटेंज. फिर मुंह खोले तो यहीं भुरकुस बना दूंगा!

द बग ने मुंह नहीं खोला. खोलने की हालत में नहीं थे. मुंह से खून बहने लगा था. अविनाश को लगभग डराते और मुझे लात से ठेलकर नीचे गिराते हुए रवीश ने हुक्‍म दिया- जाओ, चौरासीवें मंजिल से इसे नीचे फेंक दो. ऐसा कचूमर बन जाएगा कि इंटरपोल तक पहचान नहीं पाएगी लाश किसकी है. चलो, चलो.

मगर मैं पहचान रहा था कि मेरी है. अभी थोड़ी देर तक और पहचानने की हालत में था. यह भी देखने की हालत में था कि फर्श पर गिरे मेरे माथे से ख़ून की एक धार-सी बनती रुपाली के नए सैंडल को छूने लगी. रुपाली ने नोट करते ही एक हृदयविदारक चीख भरी. और मैंने उसी क्षण आंखें मूंद लीं. रुपाली की बेमतलब चीख अब और नहीं सुनना चाहता था, इस सब कुछ के खत्‍म होने के पहले एक बार रेहाना को देखना चाहता था. बस एक आखिरी बार! आत्‍मा की सारी ताकत लगाकर अपने अंत को तब तक टालते रहना चाहता था जब तक रेहाना एक मर्तबा भागी-भागी आकर मुझे देख न ले, पागलों की तरह हत्‍यारे रवीश और हत्‍यारिन रुपाली पर चीखने न लगे, फिर मुझसे लिपटकर फफक-फफक कर रोती रहे कि ऐ खुदा, तूने ये क्‍या किया! फ़ारसी में और भी बहुत सारा कुछ. मरते हुए मैं ही नहीं, हमारा प्‍यार भी अमर हो जाए. मगर फर्श पर अपने खून और गर्द में लिथड़ा हर गुजरते पल के साथ मेरी सांस और-और टूटती जा रही थी.. रेहाना का दूर-दूर तक पता नहीं था. शायद जीवन के ढेरों सपनों का कुछ ऐसा ही अंत होता है. कांपते-सिहरते एक दिन वे ऐसे ही यकबयक निर्जीव हो जाते हैं!

अनामदास टहलते हुए कमरे में घुस आए. रक्‍तरंजित मुझको लांघकर रवीश तक गए, लंबी सांस छोड़कर बोले- इतना सुरीला राग केदार पहले कभी नहीं सुना था. इस जलसे में हमें शामिल करने का बहुत-बहुत शुक्रिया, मेरे दोस्‍त..

अनामदास की नहीं मां की आवाज़ कानों में गई- देखो, फिर ऐसे ही काम आधे-अधूरे छोड़ के हट गया! अइसे नहीं न करते हैं, बाबू?..

शशि सिंह भागे हुए आए, मां को एक बाजू करके बोले- ये क्‍या कर रही हैं, माता जी? हम पॉडकास्‍ट भारती के लिए मटिरियल रिकॉर्ड कर रहे हैं, आप सब मिट्टी कर रही हैं! चलिये, चलिये, हटिये? नई कहानी छपने के बाद प्रत्‍यक्षा नई साड़ी में घूम रही थी. इतना सारा ख़ून देखकर ठिठक गई; कुछ कहना चाहते-चाहते रुक गई, फिर बुदबुदाकर मगही में रवीश से कहा- इस ही रियली द मैन आई थिंक ही इस? रवीश ने बिना नज़रें उठाये ठंडे स्‍वर में जवाब दिया- सॉरी, मैम, आई डोंट स्‍पीक मगही.. इसके बाद नई साड़ी वाली नई लेखिका ने और कुछ नहीं पूछा, आंखों पर काला चश्‍मा चढ़ाई और चुपचाप मौका-ए-वारदात से हट गई. मैं अब तक मौका-ए-वारदात पर ही पड़ा था, और अब सचमुच लंबी नींद में गिर रहा था. दरअसल जीवन के उस आखिरी नाटकीय क्षण में किसी तरह का कोई भी ड्रामा नहीं हुआ. रुपाली नहीं चीखी. रेहाना का फिर पता नहीं चला. शायद रवीश के गुंडों ने.. उससे आगे मैं सोच नहीं पाया. उससे आगे मैं सो चुका था..

***

म्‍युज़ि‍क सिस्‍टम पर पारंपरिक चीनी ऑपेरा के बीच कहीं छनकर आती फोन की घंटी से आंख खुली. ध्‍यान गया अभी तक हाथ में चीनी का मग था. मेज़ पर चीन की चीनी और मलेशियन सिगरेट व चीनी लाइटर थे. चायना मैनिफैक्‍चर्ड फोन पर हाथ रखते हुए एक बचकाना ख्‍याल आया फोन करनेवाला भी कहीं चीन का न हो. नहीं था. खालिस हिन्‍दुस्‍तानी था. अभय था. मेरे हैलो कहने पर एकदम बहकने लगा- प्रमोद भाई, मुंबई को जो शंघाई में बदलने की बकवास करते हैं, उनके मुंह पर तमाचा जड़ना चाहिये! आप घर से निकलकर हाईवे पर पहुंचिए जरा! देखिए, ट्रैफिक का क्‍या आलम है. यह शहर शंघाई नहीं गड्ढा बन रहा है, गड्ढा! खींचकर दस साल और निकाल ले, आश्‍चर्य की बात होगी!

मैंने खिन्‍नता से कहा- यार, तुम भी हद करते हो लेकिन, सारे मेरे डायलॉग बोल दिये?.. अपने निर्मल-आनंद में रहो, कड़वाहट और दु:ख मेरे पास ही रहने दो, क्‍या?

अभय ने हो-हो हंसते हुए कहा- ठीक है, लिए रहिये. मस्‍त रहिये!

मैंने कहा- और सुनाओ? हो क्‍या रहा है?

अभय- समकाल पर चौपट स्‍वामी दुखी हो रहे हैं!

मैं- ये चौपट स्‍वामी भी.. अजीब बंदा है.. मेरे रहते इसे दुखी होने की क्‍या ज़रूरत! सब यहां मुसीबत बढ़ा ही रहे हैं, हाथ, स्‍साला, कोई बंटा नहीं रहा!

अभय- छोड़ि‍ये, हटाइये, आप अपना बताइए. करते क्‍या रहे?

मैं- दु:स्‍वप्‍न में गिर गया था. तुम्‍हारे फोन की घंटी से आंख खुली है. अच्‍छी थकान हो गई, यार.. मन में पता नहीं कहां-कहां के दुख भर गए सो अलग!

अभय वापस हो-हो हंसने लगा. अजीब आदमी है! अरे, इसमें हंसने की क्‍या बात? मगर लड़का हंस रहा था! फोन एक ओर रखकर मैंने उसे हंसने दिया. चीनी मग को फर्श पर टिकाकर वापस सोने चला गया.

समाप्‍त. फिने. द एंड. फिन. कापुत..

6 comments:

  1. भाया, हम ने यो जो (बीस वर्ष बाद ब्लोग)कुछ पढा समझ नाहि आया। शायद हमरी समझ कम है।

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  2. बेनाम भाया, अपनी समझ के साथ-साथ मेरी समझ के प्रति भी कुछ वैसा ही उदार भाव रखें. आपको जितना आया है उतना ही हमारी समझ में भी आया है. जीवन में न समझ में आनेवाली स्थि‍तियां बने रहने देना ऐसी बुरी बात भी नहीं.. अपना ख्‍याल रखें.

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  3. ॐ शान्ति: शान्तिः शान्ति:

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  4. चलिए ये कसरत पूरी हुई. बाक़ी तो चलती रहती है ज़िंदगी. अब कसरत के और तरीक़ो पर नज़र रहेगी. कोई बिल्कुल नई-सी ढूंढ कर लाइए न.

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  5. everything is well if it ends well.. kaafi ghumaya aapne.. achhca raha kul milakr ye safar..

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  6. अंत भला तो सब भला।

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