Thursday, May 10, 2007

अच्‍छी हिंदी: एक

वजह शायद 1857 का स्‍मरण ही हो, कि मैं एक बार फिर समाज की चिंता में पसीना बहाने को भावुक हो रहा होऊं. शायद. ठीक-ठीक मालूम नहीं (ठीक-ठीक का ज्ञान शायद आपकी बायीं जेब में पड़ा रहता हो, हमारे यहां एकदम ठीक-ठीक आजकल कुछ भी नहीं. जीवन न ज्ञान. संशय और असमंजस के बीच डोलते हुए, थोड़ा ठीक क्‍या है- की खोज में ज़रूर लगे रहते हैं. पुराने वामपंथी मित्र कहेंगे बदल गए हो, बेटा.. एकदम लिबरल हो रहे हो, यार! हो सकता है हो रहे हों. मालूम नहीं). तो आप सुधी और (धुरविरोधी महाराज से उधार लेकर) दुर्जन पाठक से विनम्र निवेदन है कि हमारी चिंता में भूल-गलती हो तो माफ़ (या मुआफ़?) कर दीजियेगा, चप्‍पल लेकर हमें लखेदने और ठीक करने पर पिल मत पड़ि‍येगा, क्‍योंकि जिस दिन हम एकदम ठीक हुए, सारा कुछ कम्‍प्‍लीटली बेठीक लगने लगेगा! पर्सनल डेफिसियेंसी है, क्‍या कीजियेगा. जाने दीजिये. जिस चिंता में पसीना बहा रहे हैं, उसे सुनिये, और अपनी ठीक राय से हमारा मार्गदर्शन करिये.

चिंता अच्‍छी हिंदी की है. तो सिर्फ हमारी नहीं, आपसब की, इस समूचे ब्‍लॉगिये समाज की है. दो दिन पहले समकाल पर हसन जमाल प्रसंग में मसिजीवी महोदय को घेरते हुए स्‍वामी महाराज ने भावुकता में अन्‍य उच्‍छावासों के साथ एक काम यह भी किया कि हमारी हिंदी की तारीफ़ कर दी. औरों की जिनकी की, बेचारे वो जानें, मगर हमारी करके हमेशा के डरे हुए हमको और डरा दिया! हमारी हिंदी.. और अच्‍छी? स्‍वामी का वरद हस्‍त चेलों पर बना रहे, अच्‍छी बात है, मगर स्‍वामी जी ऐसे वचन भी न बोलें कि चेला शर्म में भस्‍म होकर भूमि में समा जाने को अकुलाने लगे! हिंदी ब्‍लॉगजगत में अच्‍छा लिखनेवाले अभी उंगलियों पर गिने जाने के काबिल भी नहीं हुए. कौन कितनी बड़ी हस्‍ती है और कौन कहां-कहां छपकर धन्‍य हो रहा है, और हिंदी जगत को धन्‍य कर रहा है, हम पर इसका भी रौब गालिब मत कीजिए. अपनी आत्‍मा से पूछिये, अपना जवाब पा जाइयेगा. वह जवाब अभी भी आपको हमसे ज़ि‍रह में उतारने को अमादा कर रहा है तो शायद हम एकदम अलग-अलग पैडस्‍टल पर खड़े निहायत अलग किस्‍म की चिंताओं को एड्रेस कर रहे हैं; और उचित यही होगा कि आप इस पोस्‍ट से बाहर निकल कर अपने समय का सदुपयोग अन्‍यत्र करें. जिनकी अभी भी हमारी चिंता में दिलचस्‍पी है, उनके लिए हम बात आगे बढ़ाते हैं.

क्‍या होती है अच्‍छी हिंदी? लखनऊ और पटना वाले के लिए वही होती है जो रतलाम और देवास जैसी जगह में पले-बढ़े व्‍यक्ति के लिए होगी? मैंने खुद उन्‍नीस वर्ष की अवस्‍था तक उड़ीसा के एक मिली-जुली आबादी वाले औद्योगिक शहर में पढ़ाई की. इस्‍पात नगर के इस्‍पात स्‍कूल के हम छात्रों की शब्‍दावली में ‘कक्षा’ जैसा शब्‍द नहीं था. हम कक्षा को ‘क्‍लास’ के नाम से जानते थे. और सहपाठियों का प्रतिनिधित्‍व भले केरल, बिहार, आंध्र प्रदेश, पंजाब, उत्‍तरांचल सब कहीं से रहा हो, हिंदी माध्‍यम के हम छात्रों की पढ़ाई हिंदी से कहीं ज्‍यादा ‘उड़ीयावाली हिंदी’ में हुआ करती. मैं और मेरा एक तेलुगु मित्र जो स्‍थानीय बंधाव से बाहर जाकर ‘दिनमान’ के वार्षिक ग्राहक और भगवतीचरण वर्मा व यशपाल के उपन्‍यासों के पाठक हो रहे थे, चाहे-अचाहे हमारे मुंह से ‘चिन्‍ता’ व ‘विचार’ जैसा शब्‍द छूट जाया करता, और दोस्‍तों के बीच हमें हंसी का पात्र बनाकर छोड़ता. उस पर गली-मोहल्‍ले के साथियों की यही प्रतिक्रिया होती कि देखो, ये अपने को गुलज़ार लगा रहे हैं (मुझीमें नहीं, सब साथियों में फ़ि‍ल्‍मों का दीवानापन था, ‘मेरे अपने’, ‘अचानक’ और ‘परिचय’ जैसी फ़ि‍ल्‍मों की हवा थी; और जावेद अख़्तर साहब के शब्‍दों को उधार लेकर कहें तो हम साथियों के बीच कम स कम हिंदी फ़ि‍ल्‍मों का दिया हुआ एक स्‍वायत्‍त भाषा-प्रदेश तो था ही)! उसके बाद मैं बीए की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद आ गया. कुछ वर्ष गुजर गए होंगे जब किसी मित्र ने थोड़ा संकोच के बाद मेरा ध्‍यान इस ओर खींचा कि मैं ‘ख’ और ‘श्‍व’ को एक ही जैसा लिखता हूं, और आगे से लिखने में इस भूल को सुधार लिया करुं! ऐसी अन्‍य और जाने कितनी भूलें रही होंगी जिनकी ओर स्‍कूल में पढ़ानेवाले अध्‍यापकों का ध्‍यान तो नहीं ही गया था, साथ के अन्‍य साथियों का भी ध्‍यान न गया होगा, या गया भी होगा तो वह संकोच में चुप रहकर हमारे भाषाई भविष्‍य का अपराधनामा लिख गए होंगे. कि वह तो जीवन की दूसरी राहों पर निकल गए, मगर हम अभी तक कभी ‘सुनिये’ तो कभी ‘सुनिए’ चला रहे हैं.

बात निजी तकलीफनामे से खिंचकर फैल रही है.. बाकी का झोला हम कल खोलते हैं.. आप भी ज़रा कल तक अपनी हिंदी अपने दिमाग में गुनिए.. कि इस भाषाई चिंता का कोई सामूहिक स्‍वर बने..

11 comments:

  1. आप कह रहे हैं तो सोचना पड़ेगा, सोचते हैं. सारी समस्या यही है कि स्थिति शोचनीय है लेकिन कुछ शौचनीय भी लिख रहे हैं, टोकने पर बुरा मानने का ख़तरा रहता है, मैंने किसी को नहीं टोका है, लेकिन टोकने वालों का हाल देखा है...बहरहाल, आप संघर्ष कीजिए हम आपके साथ हैं.

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  2. " शर्म में भस्‍म " या " शर्म से भस्म " ?

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  3. यही तो मज़ा है, अफ़लातून भाई.. कि हम भाषा में दो कदम आगे चलकर दो कदम पीछे भी लौटते रहते हैं.. 'में' और 'से' के बीच डोलते रहते हैं.. और आप हैं कि मज़ा बिगाड़ने चले आए.. मैं निम्‍न मध्‍यवर्गीय परिवार के एक ऐसे बिहारी बच्‍चे की हिंदी से जूझ रहा हूं जिसकी शुरुआती पढ़ाई उड़ीसा में हुई.. आप एक 'देसाई' के बनारस जैसी नगरी में हिंदी से जूझने की कुछ परतें क्‍यों नहीं खोलते? आज एक मित्र को सुझा रहा था कि मिल-जुलकर हिंदी के नाम पर एक समूह ब्‍लॉग खोला जाए जो भाषा, अभिव्‍यक्ति, विशिष्‍ट अनुभव व विज्ञान सारी तरह की पेचिदगियों का एक जगह संकलन करती चले. क्‍या कहते हैं? विचार कैसा है?

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  4. अच्छी हिंदी बोलना-लिखना *ज़रूरी* न हो, पर अच्छी हिंदी सुनने-पढ़ने में अच्छी लगती है इतना तय है.

    मेरा यह सोचना है कि अच्छी हिंदी (बल्कि किसी भी भाषा) के घटकों में मानक व्याकरण प्रयोग, सुन्दर और स्पष्ट वाक्य रचना, सहज शब्दों का चयन और उनके मानक रूपों का इस्तेमाल मुख्य हैं. अच्छे लेखक और वक्ता इसके लिए संदर्भ का काम करते हैं. इसके इतर की बातें सब्जेक्टिव हैं जो मेरी अच्छी हिंदी को आपकी अच्छी हिंदी से अलग बनाती है. और यही सब्जेक्टिवता हर लेखक को उसकी शैली देती है. माहौल और आनन्दमय होता है.

    अच्छी हिंदी की ज़रूरत पर भी सवाल उठते हैं. इसलिए बात किस धरातल पर हो रही है यह तय कर लेना ज़रूरी है. सिर्फ़ आम रोज़मर्रा बोलचाल से सम्प्रेषण की बात हो तो कुछ भी चलेगा. पर बात साहित्यिक, वैचारिक, तकनीकी (या मनोरंजक भी)लेखन की हो रही हो तो 'अच्छी हिंदी' सम्प्रेषण की शक्ति और सटीकता ही नहीं, निर्मल-आनन्द को :) भी बढ़ाती है. मेरे विचार से इस बहस में बोली और लिखी जाने वाली भाषाओं को भी अलग-अलग कर लेना चाहिए. बोलते वक़्त भाषा के अलावा हमारी शारीरिक भाषा और आँखें काफ़ी काम कर देती हैं. लिखते वक़्त ये औज़ार हमें उपलब्ध नहीं होते. इससे भी भाषा का तेवर बदलता है.

    इसके बाद घटकों को अलग-अलग करना (कम से कम पहचानना) भी ज़रूरी है, क्योंकि ये स्वतंत्र चिंतन माँगते हैं. जब आप सुनिये/सुनिए या ख/श्व में फ़र्क़ की बात करते हैं तो आप वर्तनी मानकों की बात कर रहे हैं. और चेष्टा/प्रयास/कोशिश के मामले में शब्दचयन और आंचलिक प्रभावों की.

    पर तकलीफ़नामा आपका निजी तो कतई नहीं है. मुझे विश्वास है कि कई साझेदार तो यहीं चिट्ठाजगत में मिल जाएँगे. झोला खोलिए. सोच सुनाइए. ज्ञान बढ़ाइए.

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  5. आज समय की इतनी किल्लत है कि बात का दो टूक होना जरूरी हो गया है। लंबी भूमिका, आत्मगत कथन और अवांतर प्रसंग भाषा को बोझिल बनाने वाली चीजें हैं। भाषा के बारे में ज्यादा सोचने से आप भाषा ही बुनने लगते हैं। मैंने ऐसे कई लेखक देखे हैं जो भाषा ही बुना करते हैं। अनुभव को भाषा में व्यवस्थित करने के लिए पहले अनुभव को व्यवस्थित होना होता है। असल बात यही है कि बात ही बोलती है।...जब हम बोलने लगते हैं तो गड़बड़ शुरू हो जाती है...
    S.P. said

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  6. प्रमोद जी, हिन्दी भाषा हर जगह अलग-अलग बोली जाती है। उस के लिए किसी को शर्मिंदा करना बुरी बात है। हम भारतीयों को तो खुश होना चाहिए जब कोइ हिन्दी बोले या लिखे। भाई हम तो हिन्दी ब्लोगरो का स्वागत करते रहेगे।

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  7. प्रमोद जी, हम भी उन अपराधियों में हैं जिनका जिक्र स्वामीजी ने किया है अपने लेख में। हम तब से अपना मुंह छिपाये घूम रहे हैं। आपने हमारी बात कह दी अच्छा लगा! :)

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  8. दुनिया को कडी नज़र से देखने वालो को अपने लिये न्रर्मी की उम्मीद नही रखनी चाहिये .

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  9. दुनिया को कडी नज़र से देखने वालो को खुद के लिये नर्मी की उम्मीद नही रखनी चाहिये ...फिर परम्परा भंजक पतनशील साहित्य सर्जको को दीनता और हीनता की परम्परा ज़रूरत ना सही मजबूरी के चलते ही जारी रखने के लिये कुछ इस तरह साधुवाद देना पडेगा के दरिद्रता के साम्राज्य मे एक और भिक्षुक का स्वागत है .

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  10. भाषा व्याकरणसम्मत होने से ही अच्छी नहीं हो जाती . उससे वह मानक भले ही होती हो . अगर ऐसा होता तो सबसे अच्छी भाषा व्याकरणाचार्यों की होती .

    अच्छी भाषा या अच्छी हिंदी के लिए तो और-और बातें चाहिए . बोलियों की छोंक चाहिए . शब्दों से प्रेमपूर्ण खिलवाड़ की आदत चाहिए .अपनी भाषा की कविता और अपनी भाषा के संगीत से थोड़ा लगाव चाहिए . प्रतिवेशी भाषाओं से सौहार्दपूर्ण संबंध चाहिए . थोड़ी क्षेत्रीय अस्मिता चाहिए और उसके साथ चाहिए सामासिकता-सिक्त जातीयता . थोड़ी प्रतिभा चाहिए और थोड़ा प्रेम उस भाषा और उसके बोलने वालों से;थोड़ी परम्परा चाहिए और थोड़ा औघड़पन;पर सब कुछ एक ठीक-ठीक अनुपात में . और उस अनुपात का माप किसी के पास नहीं है .

    और तब बड़े भाषा-शिक्षक कबीर याद आते हैं : 'का भासा का संस्किरत प्रेम चाहिए सांच'.

    व्याकरण जानना चाहिए पर यह भी समझना चाहिए कि व्याकरण भाषा के लिए है , भाषा व्याकरण के लिए नहीं .

    भाषा व्याकरण से नहीं प्रेम से बनती है .

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  11. प्रमोद भाई,
    यह उद्धरण 'का भासा का संस्कृत प्रेम चाहिए सांच' तुलसी का है . पर मेरी टिप्पणी से ऐसा लगता है मानो यह कबीर का हो .
    इसी लिए यह स्पष्टीकरण .

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