पिछले दिनों अनामदास के लिखे आपके शब्द बताते हैं आपकी हैसियत पर अविनाश ने प्रतिक्रिया दी थी, “उन किरायेदारों के बच्चों के पास कैसे शब्द आएंगे, जिनकी अपनी कोई ज़मीन, कोई कस्बा, कोई शहर नहीं.. इस तरह जो इस देश में किरायेदार होने के लिए अभिशप्त हैं, उन्हें अपनी भाषा को लेकर जो कुंठा है- और अगर वे कुंठाएं कुछ शब्दों में ही बाहर आती हैं, तो क्या हम उन्हें मूर्ख कहेंगे? यह प्रश्न सहज रूप से पूछ रहा हूं, क्योंकि मैं अभी एक साल पहले तक किरायेदार रहा हूं- बचपन से. और शब्दों के मामले में मेरा अज्ञान मुझे बार-बार शर्मसार करता है..” आप किराये के घरों में रहे हों या पिता-परिवार के रोज़गार के चक्कर में अजाने/अपनाये प्रदेशों में, आपकी भाषाई संस्थापना को वह ज़रा ऐंड़ा-बेड़ा तो कर ही डालता है. विस्थापन और बेग़ानेपन में शाब्दिक संस्कार की वह वैसी नींव नहीं डालता जो आपको तनी रीढ़ के साथ चाक-चौबंद दुरुस्त खड़ा करे. मगर साथ ही यह भी सही है कि इस अजनबीपन के अनजाने लोक में नये अनुभवों (शब्दों) की खिड़की भी खुलती है. अब यह आपके तय करने की बात है कि ये नई खिड़कियां आपकी (मानक) भाषाई हवेली में खुलेंगी या नहीं. ऐसी नई हवाओं का वहां स्वागत होगा या वे दुरदुराई जाएंगी.हिंदी, या किसी भी बड़ी भाषा की विविधता व उसका स्टैंडर्डाइज़ेशन (मानकीकरण) बहुत पुरानी बहस है. कल के पोस्ट के जवाब में विनय बाबू ने अच्छी ज्ञान की बातें कही हैं: “मेरा यह सोचना है कि अच्छी हिंदी (बल्कि किसी भी भाषा) के घटकों में मानक व्याकरण प्रयोग, सुन्दर और स्पष्ट वाक्य रचना, सहज शब्दों का चयन और उनके मानक रूपों का इस्तेमाल मुख्य हैं. अच्छे लेखक और वक्ता इसके लिए संदर्भ का काम करते हैं. इसके इतर की बातें सब्जेक्टिव हैं जो मेरी अच्छी हिंदी को आपकी अच्छी हिंदी से अलग बनाती है. और यही सब्जेक्टिवता हर लेखक को उसकी शैली देती है. माहौल और आनन्दमय होता है..”
विनय बाबू की बातों से हमारा पूरा इत्तेफ़ाक है. बस एक छोटी, इतनी-सी शिकायत है कि देश में हिंदी की दशा व दिशा को तय करते वक्त ‘हिंदी-हितैषी’ प्रबुद्धजन विनय बाबू की सरल व स्पष्ट समझ को क्रियान्वित नहीं कर रहे थे. हिंदी के मानकीकरण और विशिष्ट किस्म के प्रयोग से जुड़ा इस देश में पिछली सदी की शुरुआत से एक पेचीदा इतिहास रहा है, सामाजिक-राजनीतिक मंचों पर इसे लेकर समझदारी भरा ज्ञानात्मक विमर्श नहीं हुआ, तीखी झड़पें व सिर-फुटव्वल होती रही है. बहुत कुछ इसी नज़रिये का विस्तार था कि आज़ादी के बाद के वर्षों में तकनालॉजी से लेकर शैक्षिक ज्ञान के अन्य क्षेत्रों में ऐसे शब्दों का प्रचलन बढ़ा जिन्हें उनके सिरजनेवालों व कोषों से बाहर कभी पहचान नहीं मिली. हिंदी को इसने इधर का रखा न उधर का. कुछ लोगों को विभिन्न सरकारी दफ्तरों में ‘हिंदी अधिकारी’ के बतौर रोज़गार मुहय्या करवाया, और गैर-हिंदीभाषियों के बीच हिंदी को कौतुक और हास्य का विषय बनाया, इतना भर और यही किया. सार्वजनिक जीवन में इन मान्यताओं का छूटा हुआ बम-बारुद अभी भी काफ़ी मात्रा में मौजूद है, और इस लीक से हटनेवाले किसी भी नए प्रयास पर बड़ी तेजी से उत्साही, शहीदाना हमलों की ज़मीन निकल आती है. बहरहाल, यह एक अलग और उलझा प्रसंग है, अभी यहां इसकी चर्चा छेड़कर हम नया सिर-फुटव्वल मोल लेना नहीं चाहते. जिज्ञासा का जो झोला खोलना चाहते थे, उसपर लौटते हैं.
यह एक अप्रीतिकर सच्चाई है कि शिक्षा की ही तरह भाषा के क्षेत्र में भी हमने भयानक राष्ट्रीय ऊर्जा का अपव्यय किया. आज़ादी के इतने वर्षों बाद अभी भी भाषा संबंधी एक बेसिक समझ व व्यवस्था बनाने में, एक राष्ट्र के बतौर, हम बुरी तरह से विफल रहे हैं. इसका सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि बड़ी संख्या में आपको ऐसे ‘शिक्षित’ लोग मिल जाएंगे जो तीन से चार-चार ज़बान जानते हैं मगर अपने को सटीक ढंग से अभिव्यक्त कर सकें, ऐसी एक भी ज़बान उनके हिस्से नहीं आई है. निश्चित ही अंग्रेजी के बर्चस्व की अलिखित राजनीति की इसमें सर्वोच्च भूमिका रही है. मगर बच्चे अलग-अलग स्थितियों में जिन विविध भाषाई अनुभवों व संस्कारों से गुजरते हैं, उसकी सुसंगत व्यवस्था करने में समाज की पूर्णरुपेण असफलता भी उतने ही बड़े शर्मनाक तथ्य के रूप में सामने आती है.किसी भी भाषा का जीना-मरना, बनना-बुनना बहुत हद तक उस धरती की राजनीतिक सत्ता से उसके संबंध व समीकरणों पर आश्रित होता है. हिंदी के पास, जैसा आज़ादी के दौरान चंद नेतागण (साहित्य और राजनीति दोनों ओर के) कामना कर रहे थे, अगर सचमुच राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक सत्ता होती (जो अब दुर्भाग्यवश हिंदी नहीं, अंग्रेजी के पास है. हम दुर्भाग्य कह रहे हैं, दक्षिण समेत अन्य काफी प्रदेशों के लोग शायद न कहें- जो ग्लोबलाइज़ेशन के इस वक्त में अपने अंग्रेजी ज्ञान का मुनाफ़ा काट रहे हैं), तो राष्ट्र के बड़े व गैर-हिंदीभाषियों के हित में, इस पहले से खिंची आ रही मानक हिंदी के तर्कों का शायद कुछ तुक बना रहता. मगर अब जबकि वह स्थिति ही नहीं रही (बतौर राष्ट्रभाषा हिंदी का भविष्य अब एक बंद हो चुका अध्याय है) तो क्या यह युक्तिसंगत नहीं होगा कि हिंदी को हम- मराठी, बंगाली या मलयालम, तमिल की तरह- क्षेत्रीय मार्मिकताओं की तरफ- जितना संभव, सुगम बनता हो- लिये चलें. स्टैंडर्डाइज़ेशन की चिंताओं से अलग निराला के ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ व ‘चतुरी चमार’ के खांटी अवधी गद्य को निर्द्वंद्व भाव से सेलीब्रेट करें. नोयेडा और नवी मुंबई की हिंदी ज़रा आड़ा-तिरछा चलती है तो उसे चलने दें उसकी आड़ी-तिरछी अटपट चाल, नाक-भौं न सिकोड़ें. क्योंकि ‘शुद्ध’ हिंदी के मोह में ऐसा न हो हमारे पास शुद्धता ही बची रहे, हिंदी विलुप्तप्राय हो जाए. मुख्यधारा हिंदी फिल्मों की तरह पैन-इंडिया द्वारा भाये जाने का व्यर्थ मोह न पालें; वह मिडिल आफ द रोड का एक नया रास्ता खोज व खोद रही हो तो एक मर्तबे ज़रा यह करतब भी खुले मन से देख लें, हाय-हाय का हल्ला न मचायें.
उंगलियों पर गिनने लायक दिल्ली के चंद शिक्षाविद, आलोचक व प्रकाशक बहुत समय से हिंदी पर नितम्बारूढ़ रहे हैं. हिंदी को ज़रा इन महापुरुषों के ‘इससे’ और ‘उससे’ मुक्त करवा के खुले की हवा खिलवाई जाए, कक्षाओं व पुस्तकालयों के नीरव सन्नाटों से बाहर मेले का सैर-सपाटा करवाया जाए!
ख़ैर मनाइये कि ब्लॉगजगत को अपने आशीर्वचनों से धन्य करने का महान कार्य ये महापुरुषगण अबतक रोके हुए हैं. अच्छा हो कि नागपुर, कानपुर कैंची लेकर कोई फीता काटने पहुंचे और अपनी ज्ञान-मेधा से चिट्ठाकारिता का 'उद्घाटन' करके हमें उपकृत करें, आइये, उस ज्ञानात्मक उपकार से पहले हिंदी ब्लॉगजगत पर प्लुरलिज़्म का उत्सव मना लिया जाए. थोड़ा सुरीला तो काफी सारा कर्कश भी बजा और गा लिया जाए. क्या कहते हैं, देबाशीष भाई, आप कुछ बोलिए!.. और मिस्टर अनामदास और श्रीमान निर्मल-आनंद आप ऐसी गर्म-गर्म सांसें न छोड़िए!
2 कमेंट:
हमारे पास शुद्ध कुछ भी बचा है क्या ? खिचडी भाषा , खिचडी संस्कृति । मजाल है कि दो वाक्य बिना अंग्रेज़ी शब्द इस्तेमाल के हम बोल लें । और अगर बंगला , तमिल, तेलुगु ,मराठी जानते हैं तो उसके भी कुछ शब्द सजा लें ।ये किये बिना हमारी जान नहीं चली जाय ?
जितने प्रदेशों में आप रहे हों आपकी भाषा उतनी ही समृद्ध होती जाती है । तो वैसे सवाल तो पूछ गया है सिर्फ तीन गुनी जनों से पर बोलेंगे तो हम भी कि चलिये मनाते हैं जलसा खोजते हैं उन शब्दों को दोबारा जिन्हें बिसरा दिया था , मनाते हैं उत्सव प्लुरलिज़्म का , लगाते हैं एक अक्रोबैटिक कूद शब्दजाल में , करते हैं इस्तेमाल देशज शब्दों का यानि चलिये लिखते रहते हैं हमसब जैसे लिखते आ रहे है , अब तक ।
हिंदी फिल्मों की तरह पैन-इंडिया द्वारा भाये जाने का व्यर्थ मोह न पालें
बल्कि अब तो एक क़दम और आगे (?) बढ़ गए हैं भाईलोग. अब तो उनके लक्षित दर्शक या तो देश से बाहर के हैं या वे जो रहते भले देश में हों जीते बाहर ही हैं. लगभग सभी हिंदी फ़िल्मों में नामसूची (क्रेडिट्स) का सिर्फ़ अंग्रेज़ी में आना इसका एक दुखदायी लक्षण है. दुनिया की किसी भाषा की फ़िल्मों में यह प्रवृत्ति इतनी व्यापकता और लज्जाहीनता से दिखाई नहीं देती. पर ऐसी इंडस्ट्री (जिसमें फ़िल्मकार और फ़िल्म-पत्रकार दोनों शामिल हैं) से और क्या उम्मीद की जा सकती है जो अपने आप को "बॉलीवुड" कहलाने में गर्व अनुभव करे.
(सेकंड ट्रैक: मुझे पता नहीं इस बारे में कोई क़ानून है या नहीं पर मेरे ख़याल से तो यह सीधा सीधा उपभोक्ता अधिकारों का भी मामला बनता है. उसी तरह जैसे दवाइयों के नाम हिंदी में न होना था (जो अब सुधारा गया है). क्या 'केवल हिंदी' जानने वालों को ये जानने का हक़ नहीं कि फ़िल्म का छायांकन किसने किया या फ़िल्म के सहायक संगीत निर्देशक कौन थे. कुछ होना ज़रूर चाहिए. शर्म तो इन्हें आएगी नहीं.)
क्या यह युक्तिसंगत नहीं होगा कि हिंदी को हम- मराठी, बंगाली या मलयालम, तमिल की तरह- क्षेत्रीय मार्मिकताओं की तरफ- जितना संभव, सुगम बनता हो- लिये चलें. नोयेडा और नवी मुंबई की हिंदी ज़रा आड़ा-तिरछा चलती है तो उसे चलने दें उसकी आड़ी-तिरछी अटपट चाल, नाक-भौं न सिकोड़ें.
पूरी सहमति. पर मेरे ख़याल से "जितना संभव, सुगम बनता हो" इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. सवाल है "कितना". और इसी कितने का जवाब मानक का निर्धारण करता है. मैं सरकारी या संस्थागत मानकों की बात नहीं कर रहा, हालाँकि वे भी इसका हिस्सा हो सकते हैं. पर मूलतः वे मानक जो उस भाषा समाज के साहित्यिक लेखकों और पाठकों की आम स्वीकृति से उपजे हों. कम से कम लेखन में एक सीमा-मर्यादा ज़रूरी है. यही मर्यादा भाषा का व्याकरण है.
पठनीयता, सुगमता, और संप्रेषण क्षमता बिना पूर्व संदर्भों से जुड़े या बिना व्याकरण सम्मत हुए आनी मुश्किल होती है. आंचलिक लहजों को बोली में तो पकड़ा जा सकता है पर अगर उन्हें लिखने भी लगे तो वे पठनीयता में मुसीबत ही करेंगे. संजय की समस्या नज़दीकी मिसाल है. 'सुना', 'सूना' हो जाएगा और 'कोशिश', 'कोशीष'.
पर हाँ, ये ज़रूरी है कि यह व्याकरण हमारी बोली से ही उपजे. यानी वर्णनात्मक (डिस्क्रिप्टिव) हो, निर्देशात्मक (प्रिस्क्रिप्टिव) नहीं.
मुझे नहीं लगता कि आप भी व्याकरण या मानकों से हटने की वकालत कर रहे हैं. ये न हुए तो 'रहना हैं तेरे दिल में' और 'मैंने जाना है' ('मुझे जाना है' के अर्थ में) से आपको कौन बचाएगा.
Post a Comment