Saturday, May 5, 2007

नानी की बानी

बुरी हिंदी की एक अन्‍य अन्‍यतम रचना. भाई चौपट स्‍वामी ने मूल मणिपुरी का हिंदी तर्ज़ुमा करके अभी-अभी बिजलीवाली डाक से भेजा है. भाषागत अशुद्धियों के लिए स्‍वामी जी को क्षमा कर देंगे और स्‍नेह बनाये रखेंगे, ऐसा अनुरोध है. क्‍योंकि सरकारी पैसे से पिछले वर्ष मणिपुर की पहली पारिवारिक यात्रा से पूर्व चौपट जी मणिपुर के इतिहास से परिचित थे न भूगोल से. साहित्‍य-संस्‍कृति से तो नहीं ही थे. आज तक यही समझते रहे थे कि मणिपुर मधुबनी के आजू-बाजू एक अनामधन्‍य ठिकाना है. हम अभी भी यही समझ रहे हैं. तो इसमें चौंकने और फुदकने की कोई बात नहीं है. आप अपनी जगह पर ही बने रहें और धीमे-धीमे इस अनूठे, अनोखे अन्‍यतम अनुवाद का आस्‍वाद लें!



धम्‍म् दे चढ़ गई धूप उतर गया रूप
सूख गया कूप रोयें भैया राही अनूप.
खटिऔला उठंगी पगुराई रहीं नानी
हाथै पनबट्टा दाबे बोल रहीं बानी
दिन है न रात है अंधियारा अबेर है
जांतें पिसाये रहैं जिनगी का फेर है
हुक्‍के में जान है न देह में परान है
हर घड़ी दहके धूप ई कैसा बिधान है
अरे सुनि जाव बेटवा, ओ सुनि जाव बबुनी
खा जाए घाम तू तनि खिलाय जाव मकुनी
देंगे असीस पुनि पुनि पुन्‍न पाओगे
हमरे संगे-संगे गंगा-लाभ को जाओगे.

2 comments:

  1. चौप‌ट स्व‌ामी से प‌ह‌ले भी इम्प्रेस थे.. अब तो और हो ग‌ये हैं.. क्य‌ा अनुब‌ाद किए हैं.. ब‌अह.

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  2. अरसा बाद ऐसी मह-मह करती रचना पढ़ी. नानी को हमारा पायलागन पहुँचा दीजिए. बेहतरीन कृति. अनुबाद ऐसा है तो मूलपाठ कैसा होगा, ज़रूर आपके अनुवाद में अपनी तरफ़ से एक्सट्रा तड़का लगाया है.
    अनामदास

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