Saturday, May 12, 2007

भविष्‍य की बहुसंख्‍यक शहरी आबादी का गैर-सुनहरा भविष्‍य

मानवीय इतिहास में यह पहली मर्तबा होगा कि एक से दो वर्षों के भीतर, समूची दुनिया की शहरी आबादी गंवई जनसंख्‍या से आगे निकल जाएगी. बहुसंख्‍यक शहरी रिहाइश की यह नई दुनिया सभ्‍यता-सिविलाइज़ेशन- जिन अर्थों में उसे आजतक हम जानते रहे हैं- की एक निहायत नई पहचान बनायेगी. क्‍या और कैसी होगी वह पहचान? भविष्‍य के शहर शीशे और इस्‍पात के वे वृहताकार फ्युचरिस्‍ट ढांचे तो नहीं ही होंगे जैसा पिछली सदी की शुरुआत में आधुनिकता का आशावादी स्‍वप्‍न देख रहे शहरी प्‍लैनरों ने सोचा था. वह संभवत: ऐसा कुछ भी नहीं होंगे जो आम तौर पर शहर की कल्‍पना करते हुए हमारे दिमाग में शहर की तस्‍वीर बनाता है. कैलिफोर्निया बेस्‍ड पर्यावरणवादी और मार्क्सिस्‍ट माइक डेविस जिन्‍होंने पहले भी शहरी रिहाइश और पर्यावरण के संबंध में किताबें लिखी हैं, अपनी ताज़ा किताब ‘प्‍लैनेट ऑफ स्‍लम्‍स’ में बताते हैं, “21st century cities will be fashioned from crude brick, straw, recycled plastic, cement blocks, and scrap wood. Their residents squatting in squalor, surrounded by pollution, excrement and decay..."

डेविस कहते हैं भविष्‍य में जनसंख्‍या में होनेवाली सारी बढ़त का 95 प्रतिशत विकासशील देशों के शहरों में हो रहा होगा. पीढ़ी बाद के शहरों की ज़रा कल्‍पना कीजिए: अस्‍सी लाख से ज्‍यादा आबादी वाले मेगासिटीज़ फूलकर दो-दो करोड़ों के हाइपरसिटी में तब्‍दील हो चुके होंगे (मुंबई के संदर्भ में यह अनुमान 33 करोड़ तक खिंचा दर्शाया जा रहा है!), हालांकि डेविस भी मानते हैं- “no one knows whether such gigantic concentration of poverty are biologically or ecologically sustainable.”

क्षमा कीजियेगा मैं बहुत घटिया अनुवादक हूं, वर्ना ऊपर-नीचे की इन पंक्तियों के साथ-साथ डेविस की पुस्‍तक की समीक्षा का यह पूरा लेख आपके लिए हिंदी में सजा कर पेश किये होता. दुनिया में बड़े कष्‍ट हैं, हमारे यहां ही नहीं हैं, साओ पाओलो, नैरोबी, मैक्सिको सिटी, कराची सब कहीं शहरी कचड़ा व झोपड़पट्टि‍यों के झमेले हैं, आनेवाले वक्‍तों में मुंबई शायद सचमुच पता नहीं कैसी और किन मार्मिक पेनफुल ऊंचाइयों को छूने लगे, ऐसे में थोड़ी अंग्रेजी हैंडल करना तो, बंधु, आपका फ़र्ज बनता है, जिम्‍मेदार शहरी की जिम्‍मेदारी बनती है. आगे देखिए: How to account for this nightmarish turn, this negation of all that urban life was once held to promise: jobs, culture, openings for personal and social progress? The old optimism, Davis argues, has been flattened by the brutal tectonics of neoliberal globalization, in particular the Structural Adjustment Programmes (SAPS) slapped on the debt-strapped nations in the seventies and eighties.. for rural migrants as well as for millions of newly impoverished town-dwellers, slums became an implacable future.

अंग्रेजी में छपा फ्रंटलाइन का समूचा लेख यहां पढ़ें.
द गार्डियन की समीक्षा यहां पढ़े.
पुस्‍तक का एक अंश इस ब्‍लॉग पर.

2 comments:

  1. क्या भयावह दृश्य होगा! आपने अच्छा किया इसके बारे में बताकर!

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  2. मैं स्वार्थी हो कर ऐसी किसी हालात उपजने पहले किसी दूर दराज़ के इलाक़े की शांत जगह पर बस जाना चाहूँगा.. ऐसा मेरी चाहत है..मैं कुत्ते की मौत नहीं मरना चाहता..

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