Wednesday, May 9, 2007

ख़ून सने खूबसूरत हाथ

बीस वर्ष बाद ब्‍लॉग्‍ा और रवीश कुमार: इकतालीस

बंधी हुई बकरी की तरह जिस अंधेरे एकांतिक ऑपरेशनल हॉल में मैं खिंचा-खिंचा चला आया, वहां अंधेरा था न एकांत. मिली-जुली जर्नो-क्राउड बैठी थी और सिगरेट के धुएं और बेमतलब की ख़बरों से हवा भारी कर रही थी. दरवाज़ा खोलते ही सबसे पहले जिस पर नज़र पड़ी वह अंतोनेल्‍ला बुकारेल्‍ली थी जो सिगरेट नहीं स्‍कॉच पी रही थी, और हमारे अंदर दाखिल होते ही- ‘स्‍त्रोंसो! पोर्का मिज़ेरिया!’ जैसी गालियां बकती उठकर खड़ी हो गई. रवीश ने बिना मेरा हाथ छोड़े मृदुता से इटैलियन में सवाल किया- हैव आई डन एनीथिंग रॉंग, तेज़ोरिना? जैसे किसी और सपने में सोकर किसी और सपने में जागी हो उन खोयी नज़रों से अंतोनेल्‍ला ने रवीश को देखा, फुसफुसाकर बोली- नहीं, मुन्‍ना, इट्स नॉट अबाऊट यू!- और उसका गाल चूमकर हॉल से बाहर निकल गई. गाल चूमना तो दूर मुझे एकनॉलेज तक नहीं किया! दूसरी कोई बहुत अलग तरीके से पेश नहीं आई! हां, दूसरी वही- रुपाली टिंगटिंगाली खाये पोचा माछ! अपने बॉस द बग से साथ बैठी थी वहां. होंठों की मुस्‍कान और लैपटॉप खोले. मुझे पहचानने से साफ इंकार करते हुए रवीश को छेड़ रही थी. मुझे जलाकर राख कर रही थी. अपने अंत का मैं इतने घटिया तरीके से साक्षी होना नहीं चाहता था.. मगर क्‍या रुपाली मुझे बचा सकती थी? लेकिन इससे ज्‍यादा बड़ा प्रश्‍न था क्‍या वह मुझे बचाना चाहती थी? फ़ि‍लहाल मुझे नहीं देखते हुए वह ऐसा कोई इशारा नहीं कर रही थी. सारे इशारे और नज़ारे रवीश की दिशा में टांक रही थी.

- व्हेयर हैव यू बीन, यार? नो रिर्पोट, नथिंग? व्‍हॉट आर वी टू पुट ऑन फॉर द नेक्‍स्‍ट?

रवीश ने चिढ़कर मुझे एक कुर्सी पर ढकेल दिया. चिढ़ी आवाज़ में ही रुपाली से चायनीज़ में बोला- डोंट यार मी! आई एम नोबडी’स यार हियर. आई ट्राई माई बेस्‍ट फॉर व्‍हाटेवर आई कैन.. बट आई एम नॉट सम स्‍पाइडरमैन! सो, डोंट पुश मी टू द वॉल, गेट इट?

रुपाली मुस्‍कराकर मुझे नहीं अपने बॉस को देखने लगी. बॉस मुझे देख रहे थे. अब रवीश की तरफ देखकर बोले- हू इज़ दिस गाय? इज़ ही सम स्‍टोरी?

रवीश ने कुर्सी पर फैलते और मेज़ पर पैर फैलाते हुए जवाब दिया- गाय नहीं बकरी है. बहुत लंबी स्‍टोरी चला ली इसने.. अब खत्‍म करना है!

द बग चहककर बोले- कांट वी मेक अ स्‍टोरी आऊट ऑफ दिस? विल इट सेल?

रुपाली ने मचलकर बॉस की बांह पर अपनी महीन उंगली धंसाई, मुस्‍कराकर रवीश से बोली- कैन आई एक्‍सीक्‍युट दिस? आई हैव नेवर एक्‍सीक्‍युटेड एनीवन इन माई लाइफ! आई लव वॉयलेंस!

और मैं इस लड़की को अपना रक्षक समझ रहा था! पता नहीं और क्‍या-क्‍या समझ रहा था! तब तक हॉल में टहलता हुआ भूपेन घुस आया. सबको मुंदी-मुंदी आंखों से ऐसे देखने लगा मानो गलत कमरे में चला आया हो. गलत कमरे में ही आया था, और राग केदार नहीं दारु के नशे में धुत्‍त था. उसके पीछे-पीछे मुक्‍ता भागी हुई आई. सबसे माफ़ी मांगकर बेवड़े को बाहर ले के गई. रवीश ने बोतल से ढालकर अपने लिए एक लंबा पैग बनाया. उसमें बर्फ़ के दो क्‍यूब डाले, फिर मेरी ओर मुखातिब हुए- आई अम सॉरी, मिस्‍टर सिंह, दिस होल बिज़नेस ऑफ ब्‍लॉग्‍स हैस गॉन फार बियोंड अवर एक्‍सपैक्‍टेशंस. बहुत पंगे हो गए हैं. कोई खुश नहीं. सब पके हुए हैं, यू नो ऑल दैट. व्‍हॉट आई मीन टू कम्‍यूनिकेट हियर इज़.. लेट मी पुट इट दिस वे.. दीपक, रतलामी, बासुती, कनपुरिया, तश्‍तरी, देबु सबकी राय में विवाद के शांतिपूर्ण समापन का एक ही रास्‍ता बचता है- कि किसी को बली का बकरा बनाकर हम सोल्‍यूशन रीच करें. आई आल्‍सो थिंक द सेम थिंग. फाईनली आई हैव टू थिंक ऑफ माई बिज़नेस, यू नो. डील हो भी गई है बट फर्स्‍ट वी विल हैव टू किल सम बलि का बकरा. और मुझे लगता है आप सबसे उपयुक्‍त कैंडीडेट हैं. वैसे भी आपके ब्‍लॉग को कोई पढ़ता नहीं. फैमिली है न जॉब है. मीनिंग आप ही सबसे ज्‍यादा फालतू हैं. चले जायेंगे किसी को ख़बर भी न होगी. व्‍हॉट डू यू से?

मैं बहुत कुछ कहना चाहता था मगर बात हलक में अटकी पड़ी रही. रवीश मेज़ पर उंगलियां बजाते हुए जम्‍हाई लेने लगे. द बग ने घूरकर बरजा- ‘वी आर ऑनलाईन, मैन!’ वाले अंदाज़ में. रुपाली चहककर मुझसे बोली- कोई लास्‍ट विश है? आखिरी ख्‍वाहिश टाइप?

मैंने बुदबुदाकर कहा- मरने से पहले एक बार कैरो जाना चाहता था.. दमासकस, तेहरान.. बहुत सपने देखे थे.. लेकिन लगता है सब गड़बड़ हो गया.. रेहाना को कुछ बातें बताना चाहता था.. लेकिन लगता है उसके लिए भी बहुत देर हो गई.. फिर मां से मिले बिना इस तरह एकदम-से चले जाना अच्‍छा नहीं लगेगा.. वह चाहती थी उसका बेटा..

तभी दन्‍न्-से गोली चली. साइलेंसर वाली. माथे के बीचों-बीच. रुपाली ने दाग़ा था. पिस्‍टल की नली से अभी भी धुआं निकल रहा था. एक आंख मुंदे मेरी ओर देखकर वह मुस्‍करा रही थी. माथे के बीच उंगलियां ले जाकर मैंने गरम ख़ून का एहसास किया. धीरे-धीरे आंखों में बेहोशी उतरना शुरु हुई. धीरे-धीरे सबकुछ धुआं होकर गायब होने लगा...

(जारी...)

4 comments:

  1. जारी...अगले अंक में सपना टूटेगा?

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  2. kyaa itnaa dukhdaai anth hogaa.. y aaur bahut kuchh baaki hai.. fir se ek naya mod..achanak.. hope n wishing boutgud.. ye bhi aapka koi sapna hi ho..

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  3. क्या सब कुछ खत्म हो गया..?

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  4. ये क्या कर दिया ? अच्छॆ लोगो को इतनी देर से गोली क्यो लगती है? सही है या अभी भी छ्ल है?आगे जल्दी लिखियेगा इन्तज़ार रहेगा...!!!!

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