Sunday, May 13, 2007

खिड़की: एक संस्‍मरण

खिड़की पर अरहर की दाल का एक साबूत दाना पड़ा हुआ था. अम्मां के लिए खिड़की पर दुरव्यवस्था पड़ी हुई थी. समाजशास्त्रियों के लिए खिड़की पर एक विशिष्‍ट पारिवारिक सूचकांक पड़ा दीखता. हम भाई-बहन देखते तो हमें खिड़की पर अपना घर दिखता. बाबूजी नहीं देखते.

बाबूजी के लिए खिड़की घर नहीं थी. वे दरवाजे से अंदर आते और उसी तरह दरवाजे से बाहर चले जाते. यह देखने के लिए कि घर खुला है या बंद वे खिड़की नहीं दरवाजा देखकर जांच करते थे. कोई आवाज़ लगाये तो वह खिड़की से बाहर झांकने की बजाय उठकर दरवाजे से झांक जाया करते थे. दरवाजे से दिखने पर उन्हें यकीन हो जाता कि तिवारी जी, पांडे जी या रिपुदमन सिंह बाबू आये हैं.

खिड़की पर सूती का रंगीन, छींट का चमकदार पर्दा हुआ करता. उसकी रंगीनी और छींट अम्मां तय करतीं और उसका सूती होना अम्मां के पास का पैसा. सूती देखते रहने के इस सहज अभ्यास से बाद में पंजाबी व बंगाली घरों में पेलमेट के नीचे लगे महीन कपड़ों के परदे देखकर हमें ताजुब्ब और दुख होता. हमें लगता अम्मां इतने वर्षों से हमें ठगती रही है. मगर इस अनुभूति को हम शब्दों में बांधकर उससे सवाल नहीं कर पाते थे. एक चिढ़ और झुंझलाहट जाहिर करते थे कि अबकी पहलेवाला जैसा पर्दा नहीं आएगा. सब भाई-बहन कहते हां हां. अम्मां सुनती थी और उधारी के बजाजी के यहां बड़े जतन से परदे का कपड़ा चुनती थी. फिर से गलती न हो जाये की सावधानी के लिए दीदी अम्मां के साथ परदे का कपड़ा चुनने जाती. इस बार परदे का ढंग का कपड़ा दिखाइये, राधे बाबू, अम्मां कहती. बजाजी राधे बाबू बीड़ी बुझाकर पिछवाड़े की ट्यूबलाइट जलाते और अंदर से एक के बाद एक बहुत सारे पर्दों के थान लाकर अम्मां के आगे सजाते. अम्मां उन्हें दीदी की तरफ एक एक करके सरकाती चलती कि लो, अब जो सबसे बेस्ट है चुन लो. दीदी जिम्मेदारी की इस सार्वजनिक घोषणा से लजाकर अटकती हुई कपड़ों को उंगलियों में लेकर छूती-टटोलती. उसे सभी कपड़े एक-से लगते. रंगीन, छींटदार- और सूती. अम्मां गंभीरता से दीदी का देखना देखती. और नहीं है? दीदी संकोच की कमज़ोरी पर अधिकारी भाव का कलेवर चढ़ाने का प्रयत्न करती. राधे बाबू मुंडी हिलाकर अपनी जगह असमंजस में खड़े रहते, यहां तो यहीये चलता है, दीदी जी इतने साल से हमरे यहां से खरीदी करती हैं! और फिर उपलब्ध कपड़ों में से दीदी तथाकथित बेस्ट चॉयस के परदा पीस के साथ घर लौटतीं. सब बारी बारी से उसे देखकर बारी बारी से मुंह बनाते. दीदी को बारी बारी से सुनना पड़ता कि दीदी भी एकदम अम्मां ही है. अम्मां खुश होकर कि दीदी उनकी तरह ही बड़ी और सयानी हो गई है, दीदी के बालों पर हाथ फिराकर ढाढ़स बंधाती, इन लोगों को बरर बरर करने की आदत है- जाने दे, बेटी, तू मशीन निकाल!

और फिर दोपहर का चौका बर्तन निपटाकर जब दीदी अम्मां के पास लौटतीं तब तक ज़मीन पर घर्र घर्र कर रहे ऊषा मशीन से पर्दों को शक्‍ल मिल चुकी होती. पतले लोहे के तारों में खींचकर उनसे खिड़की चमका दिया जाता. दीदी के थके चेहरे पर भी मुसकान दौड़ जाती. दीदी को लगता अम्मां का सिला परदा उसकी अपने पसीने की मेहनत है. अम्मां जैसे दीदी के मन का यह गुप्त भेद भांप लेती और दीदी के संग संग दीदी से भी ज्यादा प्रसन्न होती. स्कूल से लौटकर हम भाई-बहन परदों को देखकर मुंह बनाते. दीदी हमारे मुंह बनाने का सामना करने से बचती. वह आंगन में जाकर अम्मां और भट्टाचार्य आंटी के साथ जाकर खड़ी हो जाती और उन्हीं के जैसे गर्दन हिलाकर बात करती. दीदी को इस तरह बड़ी होते देख मैं ग्लानि से भर जाता और मन ही मन प्रण करता कि चाहे जो हो जाये, मैं बिहारी लड़की से कभी शादी नहीं करूंगा. भट्टाचार्या आंटी की बेटी फेंस के पार अपनी मां को आवाज़ देती और माकूल जवाब न पाकर जिन नज़रों से भट्टाचार्या आंटी को देखती, मुझे बंगाली लड़की से शादी की संभावना पर सोचने को विवश हो जाना पड़ता और सोचते सोचते लाज से मेरा मन लाल हो जाता!

काम से लौटकर बाबूजी काम का जूता निकालकर हारे हुए से बैठे रहते. ऐसे क्षणों में जब तक वे गुल का कुल्ला न कर लें, यह हारापन उनके चेहरे पर चढ़कर उन्हें बुरी तरह बेसब्र बनाये रहता था. वे बिना मुंह खोले अभ्यास की आदत से आदेश दे चुकने के बाद आदेश का पालन होता देखने के इंतज़ार में बैठे रहते. मुन्नी पानी का भरा जग लेकर आये इसके पहले दीदी ने आकर बाबूजी को नये परदे दिखाकर पूछ लिया कैसे हैं. जवाब में बाबूजी ने थकी झुंझलाहट में पूछा गुल की डिब्बी खतम हो रही है, मनोज नई डिब्बी लेकर आया कि नहीं. मनोज अंदर के कमरे में कैरम की गोटियां समेटता जवाब देता कि वह शाम को जाकर ले आएगा. बाबूजी मुन्नी के हाथ से जग लेकर कुनमुनाते हुए कि सब हरामखोर हैं, दिन भर साइकिल पर पादते रहते हैं मगर उनका गुल किसी को याद नहीं रहता, बाहर चबूतरे पर गुल की कुल्ली करने चले जाते. दीदी मुरझाये मन से पर्दे की आड़ से बाहर देखती कि क्या मालूम बाबूजी बाहर की आड़ से पलटकर खिड़की का परदा देख लें. दीदी को समझाना मुश्किल था कि बाबूजी चेहरा घुमाकर पीछे देखने के आदी नहीं. और अगर उन्होंने चेहरा घुमाया भी तो नये परदों से सजे खिड़की की राह में दरवाजा चला आएगा!

खिड़की के तने हुए तार के ऊपर परदा तना तना रहता. अम्मां तने हुए परदों के अंदर घर को सुरक्षित महसूस करती. अम्मां की सुरक्षित सिलाई में परदों के लहराने या फड़फड़ाने की गुंजाइश नहीं थी. बाहर किसी साइकिल की घंटी बजे या गेट खुलने की आवाज़, परदा हटाकर देख लेने का सुभीता नहीं था. परदे से ऊपर उठकर उचककर देखने की जरूरत होती थी. मजेदार बात, बाबूजी जो बिना उचके सहजता से सबसे ऊंचा देख सकते थे, खिड़की और परदों के इस्तेमाल से परहेज़ रखते थे. देखने की हड़बड़ी में बहुत बार तने हुए परदे को तानने पर उनकी सिलाई उधड़ जाती थी. इसीलिए भी अम्मां खिड़की के आसपास खड़े बाहर झांक लेने को आतुर हम भाई बहनों को हमेशा बरजतीं. और हम लोग थे कि अदबदाकर बिना वजह भी खिड़की के पास डटे रहते. दीदी मेरे मज़ाक पर हंसते हुए ऐसे ही जाकर एक नज़र खिड़की से बाहर देख लेती. मैं भी खिड़की के बाहर की रोशनी पर कड़ी नज़र रखता कि कब तक मज़ाकों का घरेलू टाईम पास करना है और कब एकदम से भागकर क्रिकेट के लिये मैदान पहुंच जाना है. मनोज तो हाथ की थाली लिये खिड़की के पास ही खड़ा रहता. मुन्नी ताजुब्ब करती कि खड़े खड़े खाकर कैसे भला उसका खाना हजम हो जाता है. बाकी लोग भी ताजुब्ब करते थे मगर ताजुब्ब को इस तरह हमेशा प्रकट कर देने का चलन नहीं था. भैया के घर पर रहने के दौरान मनोज थाली लेकर खिड़की के पास खड़ा रहने की ज़िद नहीं करता था. तब उसे फर्श पर और लोगों के साथ बैठे बैठे ही खाना खाकर हजम करने की मजबूरी रहती. और ताजुब्ब की बात कि वह इस मजबूरी का सफलता से निर्वाह कर ले जाता था. कभी कभी मेरे मन में यह बात आती कि अपने पंजाबी और बंगाली दोस्तों को मनोज के खड़े खड़े खाने की हैरतअंगेज आदत के बारे में बताऊं, फिर संकोच और शर्म से मन मारकर रह जाता कि पृष्‍ठभूमि साफ करने के लिए पूरे परदे का क़िस्सा भी बताना होगा!

भैया घंटी बजाकर गेट के अंदर अपनी साइकिल दाखिल करते और फिर साइकिल को खिड़की से लगाकर खड़ी कर देते. अम्मां को भैया की यह आदत जंचती नहीं थी मगर वह भैया से ऐसा कह नहीं सकती थी. मुन्नी खिड़की से लगाकर गुलाब के तीन गमले लगाना चाहती थी तब अम्मां ने उसे मना कर दिया था. अम्मां मुन्नी को मना कर देती थी मगर भैया को मना करने का उसे ख्य़ाल नहीं रहता था, इस पर हम भाई-बहनों में किसी को ताजुब्ब नहीं होता था. शायद इसकी वजह यह भी हो कि हम सबको मालूम था कि भैया का गुस्सा बड़ा खराब है. जबकि मुन्नी का गुस्सा खराब होने की ऐसी कोई बात नहीं थी. मुन्नी जब चिढ़कर रोने लगती तो अलबत्ता सब उसे खराब लड़की कहते थे. तब मुन्नी चिढ़कर और रोती और फिर भैया के गुस्से से डरकर ही चुप करवाई जा सकती थी.

रात को सब सोये होते तो धीमे धीमे कांपता खिड़की का पर्दा जगा होता, जगा चुपचाप हमें तकता होता.

9 comments:

  1. kyaa kahun ek parde ke maadhyam se aapne kitni kissekah diye.. kitne pahluon ko ujaagar kiya.. paariwarik jeewan aur saamajik jeewan ke.. dil ko chhu gayi ye rachna.. dhanywaad... sirf yaaden hi nahi aur bhi bhaut kuchh hai.. is parde ki kahaani mein...

    ReplyDelete
  2. साइकिल पर पादने जैसी 'मौलिक' बात अब सिर्फ़ यादों के कस्बों में ही होती है..और अपनी विशिष्ट गन्धात्मकता के बावजूद आकर्षक बनी रहती हैं..

    ReplyDelete
  3. कमाल है, एक साँस में पढ़ गया. यह हर तरह से एक सुंदर कहानी है, इसे कहानी की तरह छपना चाहिए. एक बेहतरीन कहानी, शिल्प, भाषा, संवेदना, संरचना सब कुछ मौलिक, एक-एक शब्द खरा. आज ही नया ब्रॉडबैंड लगवाया है, एक ही दिन में लग रहा है कि पइसा असूल हो गया.
    अनामदास

    ReplyDelete
  4. बहुत अच्छी व मौलिक रचना है। बधाई।

    ReplyDelete
  5. प्‍यारी मान्‍या, निर्भय तिवारी जी, बंधुवर अनामदास, बाली साहब व फुरसतिया महाराज, इस स्‍नेह व प्रोत्‍साहन के लिए आप सबों का धन्‍यवाद.. मगर 'कमाल है' और 'बेहतरीन' ज़रा संभल के.. कहीं ऐसा न हो कि हम सचमुच अपने को लेखक लगाते हुए ठोढ़ी पर उंगली टिकाये गंभीर मुद्रावाली एक फोटू उतरवा लायें और दिखा-दिखाकर आप सबों का जीना दुलम कर दें!

    ReplyDelete
  6. बड़ा सँभल के कह रहा हूँ, कमाल है.

    ReplyDelete
  7. सचमुच कमाल है। शब्‍द मुंह में ही अटक गए हैं।

    ReplyDelete
  8. Hi parmod ji, Its really very intersting.I had been with you for long time but never got a chance to read such a beautiful original story. thums up for you..

    ReplyDelete