Monday, May 14, 2007

रामचंद्र गुहा की नई किताब के बहाने..

रामचंद्र गुहा की नई किताब आई है: ‘इंडिया आफ्टर गांधी’. साथ में उपशीर्षक है- एंड द आइडियास एंड एरर्स दैट शेप्‍स अस. गुहा साहब विविध रुचियों वाले उत्‍साही लिबरल हैं और क्रिकेट से लेकर पर्यावरण, इतिहास- एक फैले हुए रेंज पर अपनी लेखनी चलाते रहे हैं. ताज़ा किताब उनकी अबतक की सबसे महत्‍वाकांक्षी कृति है. लगभग सात सौ पृष्‍ठों के इस ग्रंथ में गुहा साहब इस खोज में निकले हैं कि आज़ादी के बाद से ही लगातार मुसीबतों में घिरा रहा भारतीय लोकतंत्र अबतक दरक कर बैठ कैसे नहीं गया, वे कौन-सी ताक़तें हैं जो उसमें जीवनी फूंकती रही हैं. इतिहास लेखन की जिज्ञासु नज़र व पर्सनल नैरेटिव के तत्‍वों से रची-बसी पुस्‍तक ढेरों ऐसे विषयों में उतरती है जिनका स्‍मरण या चर्चा पारम्‍परिक राजनीतिक मंचों पर बड़ी जल्‍दी तूफान खड़ा कर दिया करती है (कश्‍मीर और पाकिस्‍तान का सवाल, अशोक और अकबर के ज़माने से अक्षुण्‍ण चली आ रही राष्‍ट्र की धारणा, आपातकाल और जेपी इत्‍यादि), मगर अभी तक ऐसा कोई तूफान खड़ा नहीं हुआ है. बल्कि प्रिंट व टीवी दोनों ही जगहों किताब का अच्‍छा उत्‍साहवर्द्धक स्‍वागत हुआ है. इसके पीछे संभवत: एक बड़ी वजह यह भी हो कि किताब का मूल स्‍वर बेहद आशावादी है. आज के मिली-जुली सरकारों के दौर में, केंद्रीय सत्‍ता के क्रमश: कमज़ोर पड़ते जाने व पराश्रित होने की पृष्‍ठभूमि में संभवत: सत्‍ता में बैठे लोगों को ही यह सुनकर प्रसन्‍न होने की सबसे ज्‍यादा ज़रूरत है कि भारतीय लोकतंत्र अपने पायों पर अभी भी सही-सलामत है! वही नहीं प्रबुद्ध विचारक भी ऐसा बता रहे हैं.

समाज व निज के मेल की ऐसी ऊर्जावान, पैशनेट रचनाएं हमारे समाज में बहुत-बहुत अल्‍प मात्रा में उत्‍पादित होती हैं. इससे पहले जिस किताब ने भारत और भारतीयता की पहचान को गहरे, संवेदनात्‍मक तरीके से टटोला था, वह 1997 में छपी सुनील खिलनानी की पुस्‍तक ‘द आइडिया ऑव इंडिया’ थी. अपने देश में ऐसे साहित्‍य का भयावह अकाल है. भारतीय तरक्‍की का वास्‍तविक सामाजिक-आर्थिक सूचकांक, असमान विकास का वर्त्‍तमान और भविष्य‍, आज़ादी के बाद भारतीय गांव व शहरों का एक सामाजिक इतिहास, इंडियन फुड: ए कल्‍चरल एंड हिस्‍टोरिकल सर्वे, आज़ादी के बाद से अब तक प्राथमिक सेवाओं को मुहैया करवाने में सरकारी भूमिका- ये और इसी तरह के ढेरों संभावित टाइटल हो सकते हैं- एकेडमिक नहीं, पॉपुलर पठनीयता के टाइटल्‍स- जो हमारे आगे देश की सामाजिक, सांस्‍कृतिक व राजनीतिक मिज़ाज व सक्रियताओं का एक विहंगम तस्‍वीर खोलकर सामने रखें. किताब की दुकानें अमिताभ व आमिर आभा, क्रिकेट के पचास राज़ और दीपक चोपड़ा के सौ सत्‍य, ‘द अलकेमिस्‍ट’, ‘ब्लिंक’, ‘द मोंक हू सोल्‍ड हिज़ फेरार्री’, 'द तिबेतन बुक ऑव लिविंग एंड डाइंग' जैसे शीर्षकों से पटी रहती हैं, स्‍पाइडमैन का नया-पुराना आ-आकर गंजता रहता है (इसे गलत न लीजियेगा, मुझे इन विमर्शों व शीर्षकों से कोई निजी एतराज़ नहीं), मगर हमारे नागरी मानस को झकझोरे, ऐसे साहित्‍य के पीछे समाज की कोई ललक, कोई मेहनत नहीं दिखती. मुझे नहीं लगता ऐसे साहित्‍य की अच्‍छी खपत व बिक्री नहीं होती, या बाज़ार में उसकी मांग नहीं.. सवाल उठता है फिर इसके उत्‍पादन का उत्‍साही उद्यम क्‍यों नहीं है? दो दिन पहले हमने भविष्‍य में शहरों के नारकीय रुपांतरण पर एक पोस्ट‍ चढ़ाया था. इस संदर्भ में आप यह सोचना शुरू करें कि भविष्‍य नहीं वर्त्‍तमान में ही भारत के अलग-अलग शहरों पर सामाजिक अध्‍ययन की कैसी और कितनी मात्रा में सामग्री हमारे पास उपलब्‍ध है, तो इस क्षेत्र की कंगाली आपको भारी हैरत में डाल देगी. नब्‍बे की शुरुआत में सुजाता पटेल व एलिस थॉर्नर ने ‘बॉम्‍बे: मेटाफ़र फॉर मॉडर्न इंडिया’ का संपादन किया था, ऐसी किताबों की संख्‍या भी अपने यहां उंगलियों पर गिनने लायक है!

आखिर क्‍यों है ऐसा? क्‍या इस तरह की जिज्ञासाओं के लिए हमारे समाज में जगह व दिलचस्‍पी नहीं? खुशवंत सिंह की ‘विद मलाइस टुवर्ड्स वन एंड ऑल’ का कॉलम और आसाराम बापू के मधुर वचन सुनते हुए हम चिरकाल तक ‘अहाहा जीवन!’ का भजन गाते रहेंगे, रह सकते हैं? सामाजिक अध्‍ययन की रहने दीजिए, शहर केंद्रित अच्‍छे उपन्‍यास तक नहीं हैं. आप कहेंगे कलकत्‍ता पर शंकर की ‘चौरंगी’ है. मैं कलकत्‍ते में रहा नहीं, मुझे नहीं मालूम वह उस शहर की कितनी मार्मिक व्‍याख्‍या करती है.. मगर आप समझेंगे मैं कैसी चिंता की ओर इशारा कर रहा हूं.. ज़रा सचमुच दिमाग में घुमाइये और ठीक से याद करने की कोशिश कीजिये इलाहाबाद, पटना, बनारस, दिल्‍ली, भोपाल, लखनऊ की जटिल परतें खोलते हों, ऐसा क्‍या और कितना मार्मिक साहित्‍य है आपके पास! और नहीं है तो क्‍यों नहीं है?

कल या परसों अहमदाबाद पर कुछ दिलचस्‍प सामग्री का वादा.. नहीं, मौलिक विचार मेरे नहीं, सुनील खिलनानी के हैं, मैं सिर्फ उसे टाइप करके आपके लिए रखने का साधन बनूंगा..

5 comments:

  1. नहीं..कुछ तो गड़बड़ है.. सामाजिक अध्ययन में रुचि रखने वाले लोग भी.. फ़िल्मों और क्रिकेट के ज़रिये इस अध्ययन में उतरना अधिक पसंद करते हैं..एक समाज के तौर पर हमारी प्राथमिकतायें शायद मूलभूत रूप से कुछ अलग हैं.. इसका कारण समझना एक स्वतंत्र अध्ययन की तलब करता है..

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  2. गुहाजी की किताब के बहाने आपका लेख पढ़ना अच्छा लगा!

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  3. कारण स्पष्ट है । हम सब वह पढ़ना चाहते हैं जिसे पढ़ने में हमें आनन्द आए । व्यंग्य , चुटकुले मन को हल्का करने को पढ़ते हैं, जो भावुक हैं वे कविता पढ़ते हैं, कहानी व उपन्यास भाषा, शैली व एक नए संसार में खोने को पढ़ते हैं । गंभीर विषयों को तभी पढ़ते हैं जब वह परीक्षा में आने वाला हो या उससे हमें अपने पेशे में सहायता मिलती हो , या फिर जब हम उस विषय में बहुत रुचि रखते हों । यह आखिरी कारण बहुत कम देखने को मिलता है ।
    घुघूती बासूती

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  4. अज़दकजी,
    रामचन्द्र गुहा के लेख 'हिन्दू' में अक्सर छपते हैं। मॉडर्न स्कूल ,दिल्ली से पढ़े गुहा का 'उदारपन' प्रकट होता है जब वे 'अंग्रेजी विरोध' का विरोध करते हैं।

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  5. इधर सबको हल्का-फ़ुल्का चाहिए . सुपाच्य . कम से कम अवधान और कम से कम मगज़मारी से जो होता हो . लॉलीपॉप टाइप हो तो और अच्छा . थोड़ा-बहुत समाज-चिंतन अगर हो भी तो सैक्रीन में लपेटा हुआ . जबकि डाइबिटीज़ से ग्रस्त समाज को चाहिए करेले का रस . करेले को चीनी के हल्के छिड़काव के साथ बनाने की कला जिसे आ गई समझ लीजिए वह सफल हो गया . हमारे समाज-चिंतन में मूल पाठचर्या के साथ 'कलिनरी'-- पाक कला विषयक -- ज्ञान की भी ज़रूरत है .

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