Tuesday, May 15, 2007

नदी नगर

कितना समय कितने साल बीते हैं, फिर वही राग सजा रहा हूं. माथे पर समाज गोद में तानपुरा बजा रहा हूं. इतने सैकड़ा मील तय करके पहुंचा हूं वहां तुम हो न हवा है. नदी तो नहीं ही है. नदी नगर है और सुदूर तक पसरी नई इमारतों का सिलसिला है. खेलते बच्‍चे व सुखी परिवार के कौतुक की तस्‍वीरें हैं. साइनबोर्ड है नियन सजावटें हैं और पराक्रमी अंधेरा है. एक कोई अर्द्धसरकारी महोदय हैं या दलाल हैं जाने क्‍या हैं, क्‍वालिस रोककर पूछते हैं- क्‍या खोज रहे हो, बोलो, खरीदोगे क्‍या. मैं कहता हूं, क्षमा कीजिए, सर, जेब फट रही है चेहरे पर धूल चढ़ रही है. खरीदार नहीं हूं, नदी खोज रहा था, आपको ख़बर हो तो बतायें कृपया.

क्‍वालिस से उड़कर थमी तो धूल के पीछे दिखा सभ्‍यता का निर्जन है. मध्‍यवर्गीय मौन और दुर्जन चहल-पहल है. ठेलमठेली में एक रेला-सा गुजर गया. फिर कुछ तहज़ीब में रंगी और ज्ञान में पगी लड़कियां दिखीं. मैंने हिम्‍मत दिखाई बेधड़क सामने पहुंच गया. बेशरम होकर सवाल किया- एक बात बताइयेगा आपलोग, समय की अजस्‍त्र प्रवहमान धारा में हम क्‍या सचमुच कहीं पहुंच रहे हैं? या रहने दीजिए, कैसा तो उलझा बेमतलब का प्रिटेंशस-सा प्रश्‍न है! बस इतना समझाइए इस सभ्‍यता में नदी का स्‍थान और आपका अपने संबंध में आत्‍मज्ञान क्‍या है? मेरा मुंह खोलना था कि क्‍या तो संवादहीनता की भारी हवा तन गई. लड़कियां सिहरकर एक ओर हट गईं. मैं शर्म में गड़ा जाने कबतक रहा खड़ा. यूं ही एक के बाद एक और कितनेक सवाल बुदबुदाता.

कितना समय कितने साल बीते हैं, फिर वही राग सजा रहा हूं. माथे पर समाज गोद में तानपुरा बजा रहा हूं. तुम हो न हवा है. नदी तो नहीं ही है.

3 comments:

  1. is it about a nowhere man? on a no where land? very confusing. didn't get it at all.
    p. sinha.

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  2. जम गए जाम हुए फँस गए
    अपने ही कीचड़ में धँस गए
    ..नदी नहीं है..कीचड़ है.. कीचड़ में नगर है.. नगर में आप हैं हम हैं.. और फिर ये डर कि कहीं कुछ लोगों के पास बम हैं.. जाइये अपने अपने दड़बों में लौट जाइये..दूसर कोई चारा नहीं.. बाहर जाने के रास्ते शहर में कम हैं..

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