Thursday, May 17, 2007

हमारी बातें, उनकी लातें: एक अप्रगतिशील चिंतन

जम नहीं रहा हो तो इसको उलटकर भी पढ़ सकते हैं. हमारी लातें, उनकी बातें. निर्भर करता है आपका संवेदनात्‍मक धरातल क्‍या है. आप बातों में यकीन करते हैं या लातों में. जाने दीजिये, एक सीधी बात बताता हूं. बात और लात एक दूसरे से उतना दूर नहीं जैसाकि अक्‍सर समझा जाता है. समझिए, गहरे आबद्ध हैं. सरकार के पास आप नमकीन आंसुओं में लिपटी मीठी बातों की दर्दभरी कहानियां लेकर पहुंचते हैं, सरकार क्‍या करती है? पहले तो यह समझाती है कि आपको बात करने की तमीज़ नहीं है. उसके बाद भी आप तमीज़ ढूंढ़ते रहते हैं तो लातों से आपको ऊपर से नीचे तक नापना शुरू करती है. इतना नापती है कि तमीज़ तो क्‍या आपके पास बची-खुची कमीज़ भी नहीं बचती. बातों और लातों का जैसा आपसी हेलमेल है, सरकार के पीछे-पीछे (ब्‍लॉग) समाज में भी कुछ वैसा ही हिलने-मिलने का प्रचलन बढ़ा है. अभी कल ही का लीजिये. लाल्‍टू जी पुराने व गंभीर ब्‍लॉगिए हैं. चार हफ्तों के लंबे अंतराल पर आठ लाइनों की एक बात (पोस्‍ट) चढ़ाई, और अभी (पोस्‍ट की) स्‍याही सूखी भी नहीं थी कि (टिप्‍पणियों की) लातें बरसने लगीं. दूसरा केस देखिए, कल का ही मामला है: अविनाश अरुंधति को सामने रखकर संदेश लहरा रहे हैं- बातों की रातें बहुत हुईं, अब यह लातों की बरसातों का वक़्त है. स्‍वामी निर्मलानंद तत्‍काल मंतव्‍य हृदयंगम करके लात फेंकने भी लगे, जिसका अविनाश पर, जैसा मनोवांछित अनुकूल दार्शनिक उत्‍साहवर्द्धन वाला असर वह चाह रहे थे, पड़ने की बजाय धक्‍के और झटकों में असर पड़ने लगा, और ‘हां-हां, ना-ना’ करके अविनाश लातों की नहीं, शांति और अहिंसात्‍मक बातों का गाना गाने को मजबूर हुए! तो बात से लात और लात से बात माने इसके से उसके रूपांतरण में एक पोस्‍ट से भी कम का फ़ासला है. कभी-कभी तालाब को गंदा करनेवाली एक मछली की तरह, एक टिप्‍पणी सिर उठाती नहीं कि बहुत सारे ब्‍लॉगर बेचैनी में दिल्‍ली से देहरादून तक अपने-अपने पंक (टिप्‍पणी) में खड़ा होने लगते हैं. यकीन न हो रहा हो तो हसन जमाल प्रसंग में चौपट स्‍वामी से जाकर इसका स्‍पष्‍टीकरण लें.

लात ऐसे ही खलिहा लटके पड़े हैं और मैं बातें किये जा रहा हूं. क्‍यों कर रहा हूं? इसलिए कि आपही की तरह मैं भी बातों में यकीन रखता हूं (आप रखते हैं ना?). हो सकता है सचमुच रखते हों. शांतिप्रिय-विलासी व्‍यक्ति हों. मगर अनुकूल परिस्थिति न पा रहे हों? पत्‍नी आपकी बातों को भाव न दे रही हो. बच्‍चे पीठ पीछे ही नहीं सामने भी हें-हें कर रहे हों. खबरिया चैनल का बॉस आपको दो कौड़ी का पत्रकार समझता हो. बिदेसिया बंगलोरियन बाला आशिकवाली सारी नौटंकियों के बावजूद आपमें कुत्‍ता संभावना भी न देख पा रही हो. सात लाख शब्‍द टिपियाने के बाद भी ब्‍लॉगर समाज आपको बुद्धिदेव और बुद्ध मानने से कन्‍नी काट रहा हो, और फिर तारीफ़ करने पर पिल ही जाये तो भी आपको ‘गदहा’ ही बता रहा हो! इसकी चिरौरी और उसका मनुहार कर-करके आप बिक्षिप्‍तावस्‍था और मुर्च्‍छावस्‍था के बीच संक्रमण करते रहते हों. और अपनी कनवेसिंग में दो घड़ी की फुरसत पाने पर फलाने रवि आपका जीना मुहाल कर दें कि, ‘आपने हमारी कविता पर वैसे नहीं लिखा जैसे आपकी मेधा से अपेक्षित था!’, और यह शिकायत अभी थमी भी न हो कि ढिकाने कवि फोन करके आपके कान पर तबला पीटने लगें कि, ‘आपको तो ससुर, कविता की तमीज़ ही नहीं है? कैसे पढ़ कैसे ली आपने हमारी कविता? और पूरी पढ़ ली! उसपर टिप्‍पणी भी छोड़ दिये? अरे, आपकी मजाल कैसे हुई!’

ऐसे में आप क्‍या कीजिएगा? बातों की महीन डगर पर जान और लाज बचाकर चलिएगा? या गुंडागिरी में मर्दित होकर लात फेंकने लगिएगा? ठीक है, तो चलिए, नेक़ काम में देरी कैसी. अभी आसपास जो भी बैठा हो उसपर लात फेंकना शुरू कर दीजिए! देखिए, कितने समय तक फेंकते रह सकते हैं. कितने मिनट की कसरत हुई? बहुत समय तक नहीं फेंक पाइएगा. बदन में दर्द उठ रहा है? वहां-वहां से उठने लगेगा जहां से दर्द उठने की बात आप भूल चुके थे. सच्‍चाई यही है कि लात फेंकनेवाले भी एक दिन बात के गोलमेज़ सम्‍मेलन पर लौटते ही हैं!

वैसे एक तरह से लात खाये मुल्‍कों में लात की ही महिमा चलती रही है. आजतक. वक़्त आ गया है कि हम बात फेंकने के बारे में भी गंभीरता से विचार करें. बात फेंकने की ही बात की है अब आप फिर लात फेंकना न शुरू करें. कृपया.

3 comments:

  1. एक्‍कौ कमेंट नहीं, सबेरहां से सूखा पड़ा है।

    ReplyDelete
  2. प्रमोद जी ,आपने कोई गलत बात तो लिखी नही,शायद बहुत से लोगो का मनना है कि वे शान्तिप्रियता पसन्द लोग है, उनको शान्तिप्रिय मुद्दो पर बहस करने मे मज़ा आता है जैसे चन्द्रमोहन,हिन्दू- मुस्लिम साम्प्रदयिकता, क्रिकेट मे हार,आप भी कुछ दहकता सा कोई ’आग’
    लिखिए,जो थोडा शान्तिप्रिय”आग’ हो तो शायद बात बन जाय. दुनिया तो खत्म हो चुकी है.इसके अलावा और क्या बात हो सकती है ? जिसपे थोडी माथापच्ची की जा सकती है?ज़रा शीततापनियन्त्रित कमरे मे लेट कर सोचियेगा!!!!!!!!ये विचार बाकी के ब्लागर के लिये भी है जो शान्ति-पसन्द है.

    ReplyDelete
  3. हफ़्ते में एक दिन अज़दक पर ऐसा विवेचन हो ।

    ReplyDelete