आप कहीं लिंक्‍ड हैं कि नहीं? अरे, मैं आपके लिंकित मन की बात नहीं कर रहा, भई.. आपका ब्‍लॉग कहीं लिंक्‍ड है या नहीं? आपके ब्‍लॉग पर दूसरों के ब्‍लॉग्‍स के तमगे सजे हुए हैं कि नहीं? दरअसल, लिंकित ब्‍लॉग से एक तरह का घरेलूपन, एक होलसमनेस का अहसास चला आता है. लगता है आभासी दुनिया के किसी अजाने-बेगाने द्वीप पर नहीं खड़े, बल्कि शर्माजी, सुशोभन, संतोष, पांडियन और पार्थसारथीजी से बतियाते, लड़ि‍याते, अंतरंगियाते खड़े हैं. ऐसी सामाजिकता में लिसड़े-घिसड़े, अंड़सते खड़ा होके बड़ा अच्‍छा-अच्‍छा-सा लगता है. कालिदास या काफ्का का लिंक चढ़ा दीजिए, लोग फट्ट से आपको कालिदास और काफ्का का बाप समझने लगते हैं! बाप न भी समझें, बेटा तो मान ही लेते हैं. तो लिंकित ब्‍लॉग के बड़े फ़ायदे हैं.. मगर नुकसान भी है!

इस विषय पर मौलिकता से हमीं सोच रहे हों, ऐसा नहीं है, आपने भी सोचा होगा. ज्ञानदत्‍तजी दोपहर का लंच लेते हुए आज यही सोच रहे थे. रवीश कुमार कलकत्‍ता से लौटते समय इसी चिंता में अनमने थे कि क्‍या लिंकित रखें और किसका लिंक तोड़ दें. कुछ अनोखा नहीं कर रहे थे. इस दुविधा से वही नहीं, आप-हम रोज़ सोच-सोचकर हलाकान हुए रहते हैं. सीधा प्रत्‍यक्ष उदाहरण देता हूं. मान लीजिए आपने चहकते हुए अपने ब्‍लॉग पर वहीदा रहमान और सुचित्रा सेन का लिंक चढ़ा दिया. घंटा भर नहीं बीतता कि वैजयंतीमाला फ़ोन दनदनाने लगती हैं कि क्‍यों, हमको क्‍यों छोड़ दिए? हमारा रंग ज्‍यादा सांवला है, या हम भरतनाट्यम ठीक से नहीं नाचतीं? या करीना कपूर को डालिए, फिर देखिए, प्रियंका और मल्लिका शेरावत कैसे आपके बाल नोंचने को छटपटाती ही नहीं नोंचने भी लगती हैं! लड़कियों वाला लिंक डेंजर है. उत्‍साह में उमड़ते हुए अपने ब्‍लॉग पर साटने के पहले ज़रा दो बार नहाकर ठंडे मन से विचार कीजिएगा तभी अगला कदम उठाइएगा. पर्सनल एक्‍सपीरियेंस से कह रहा हूं. ऐसे ही नहीं है कि लड़कियों वाले लिंक्‍स से बचता हूं. हमारे यहां ऊपर से नीचे छान जाइए, एक्‍को लेडी लिंक न पाइएगा..

मगर मेल लिंक में मज़े-मज़ा है ऐसा सोचना भी ग़लत सोचना होगा. मान लीजिए, गोरखपुर के बारे में सोचकर लड़ि‍याते हुए आपने बाबू हरिशंकर जी तिवारीजी का लिंक जोड़ लिया. अभी लिंक चढ़कर ठीक से सूखा भी नहीं कि दूसरे एंड पर मुख़्तार अंसारी बमगोला होकर फटने लगेंगे! उनसे निपटिए तो जेल से शहाबुद्दीन बाबू छिनकते मिल जाएंगे कि ससुर, देख रहे हैं बहुत फुदक रहे हो! सारा फुदकपना एक्‍के दिन छोड़ा देंगे, बूझ लो, हां?

मगर ये सिर्फ़ दूनंबरी और दसनंबरिया लोगों की ही बात नहीं है, यार-दोस्‍त सबके साथ पंगा है, जी! आज के ज़माने में वैसे भी यार कौन और दोस्‍त कौन? सब लुच्‍चे और स्‍वार्थी! हमको क्‍या समझाइएगा, सबसे बड़े स्‍वार्थी तो हम, फिर? हम जानते नहीं हैं? अजी, सामाजिकता-टामाजिकता ठीक है, मगर बहुत झमेला है लिंकित होने में.. आज मुंहकाटा का रिश्‍ता है, कल बकोटा-बकोटी वाला हो गया, तब? सारा लिंकिंग फेल होकर रह जाता है. देखकर तक़लीफ़ होने लगती है कि यह अपना ही ब्‍लॉग है या पराये आकर कब्जिया लिए हैं!.. पुराने फटही कुरता की तरह लिंक लटका रहता है पासंग.. हटाते बनता है न चटकाते! लिंक ही क्‍यों, आप ही लटके रहते हैं. बेमतलब. बड़ा कैसा-कैसा तो लगता है.. आपको नहीं लगता?..

 
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अनूप शुक्ल - May 30, 2007 5:05 PM

लेकिंन हम आपको लिंक लगाने के लिये नहीं टिपिया रहे हैं। हमे पता है आपको हमारा पता ठिकाना मुंह जबानी याद है! है कि नहीं ? :)

काकेश - May 30, 2007 6:05 PM

अरे इ बड़े काम का बात बताये हैं... हम को इस लिकिंत कलंकित के बारे में पता ही नहीं था..वरना पहले ही तकादा करने आये होते ..कि हमरा लिंक काहे नहीं दिये ..चलिये तब ना सही अब कर देते हैं..लगा दीजिये ना एक ठो हमार भी लिंक ...कर दीजिये ना हमको भी लिंकित ..हमको बहूत अच्छा लगेगा जी ... वैसे मालुम है कि आप लिंकित तो ना ही करेंगे पर तकादा करने में क्या हरज ...वैसे भी हम लेडी नहीं लेडा हूँ....

अभय तिवारी - May 30, 2007 7:37 PM

कहाँ कहाँ से आप अपने लिये लिखने का मसाला खोज लेते हैं..

Sanjeet Tripathi - May 30, 2007 10:43 PM

अभय जी सच ही कह रहे हैं प्रमोद भाई, आप ना जानें कहां कहां से मुद्दे उठा लेते है, पर मजेदार!!
कहीं आपको नींद में भी तो मुद्दे नहीं सूझते ना?
अन्यथा ना लें

reyaz-ul- - May 31, 2007 12:53 AM

शुक्रिया कि बिना आग्रह के ही हमें लिंकिया दिया गया.

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