Friday, May 18, 2007

सिदो हैम्‍ब्रम और दुख की नदी: एक आधुनिक लोककथा

तैंतीस साल के छरहरे, सांवले सिदो हेम्‍ब्रम के जीवन में तंगी का संकट नहीं था. नवधनिक ठाठ नहीं थे मगर अच्‍छी नौकरी की कामचलाऊ ज़ि‍न्‍दगी थी. दो कमरों के साफ़-सुथरे घर में सुघड़ पत्‍नी की व्‍यवस्‍था थी. चाहता तो सब समय फ्रिज़ का पीना पी सकता, लेकिन मटकी के पानी और मटकी वाले हंड़ि‍या के बीच पले-बढ़े सिदो हैम्‍ब्रम को फ्रिज़ के बर्फीले पानी से असुविधा होती. लगता अपनी पहचान और नैतिकता से समझौता कर रहा है. जबकि गांव में पीने के पानी की एक गगरी के लिए औरतें चार कोस का रस्‍ता तय करती थीं, हाथ में ठंडा पानी लेकर वह उन सभी औरतों के साथ धोखा करेगा. ज्ञान की चेतना पाते ही पहली बात उसने समझी कि धोखेबाजी और रंगबाजी ही गांव में दुख का यथास्थितिवाद बनाये हुए हैं. सिदो हैम्‍ब्रम सुबह-शाम इस यथास्थितिवाद को तोड़ने की तरकीबें सोचता, मगर धोखेबाज बनकर उसका हिस्‍सा हो जाए, ऐसा अपराध तो उसे सपने में भी न सूझता.

राजधानी की खुशगवार सड़कों पर सस्‍ते शर्ट और सस्‍ते पैंट में पीठ के पीछे हाथ बांधे सिदो हैम्‍ब्रम सुखी नागरजनों के कौतुक देखता और मन ही मन विचार करता कि इनके जीवन में पानी है फिर उसके गांव में क्‍यों नहीं. क्‍या ये सही लोग हैं और उसके गांव की औरतें गलत? वर्त्‍तमान समय की कौन-सी तस्‍वीर सही और प्रामाणिक है. वह जो दिन-रात उसके दिमाग में खदबदाते भात की तरह खौलती रहती है, या वह जिसकी छाया वह नागरजनों की सुखी आंखों में देखता है? सिदो हैम्‍ब्रम देर तक विचार करता और अपने सवाल का सही उत्‍तर न पाकर घंटों उद्वि‍ग्‍न बना रहता. गांव-घर की पत्‍नी पूछती किस बात की चिंता है तो सिदो हैम्‍ब्रम ऊंची आवाज़ में उसके आगे अपनी चिंतायें बकता बेचारी सीधी औरत और पड़ोसियों की शांति में खलल बनता. ज़ि‍रह के पेंच और उलझते जाते तो सिदो हैम्‍ब्रम अचानक हंसने लगता. इस तरह अपनी उलझन व कुंठा जोर-जोर की हंसी के पीछे छिपाकर वह अपनी तक़लीफ भूलने की कोशिश करता.

सिदो हैम्‍ब्रम चाहता तो एक बड़ी छलांग मारकर दुख की नदी पार कर जाता. इतनी चेतना और राजधानी में रहकर इतनी चालाकी अर्जित कर ली थी उसने. मगर गांव के मोह से बंधा हुआ था. खुद को दुख से अलग करके वह गांव से अलग होने के अपराध का भागी होना नहीं चाहता था.

सिदो हैम्‍ब्रम ने बचपन से आदिवासी जीवन के दुख देखे थे. आदिवासी जीवन से बाहर आकर दुखों का एक वृहत्‍तर भूगोल देखा. बड़े गुनी-ज्ञानी लोगों की संगत में बैठकर दुख की इस नदी की वह ठीक-ठीक व्‍याख्‍या समझने की कोशिश करता. इतना शांत व समर्पित रहता कि लोग भूल जाते सिदो हैम्‍ब्रम ऊंची आवाज़ में बात करता है. और फिर इस खूराक़ से लैस होकर वह अपने सस्‍ते हवाई चप्‍पल में मीलों पैदल चलता. दिमाग में सवालों की व्‍यवस्‍था करता, नए ज़ि‍रह डिज़ाइन करता. और इस ख़्याल से उसे अपूर्व सुख की अनुभूति होती कि वह दुख का केवल अपने व अपने गांव के लिए ही नहीं, समूचे समाज का तोड़ पा लेगा, और उसकी कहानी का निजी सबक सामाजिक सबक के बतौर बरता जा सकेगा.

जितना सिदो हैम्‍ब्रम अपने को समझता था, उतना वह समझदार था नहीं. दरअसल भोला और बुद्धू था. क्‍योंकि जिस घड़ी वह इन सपनों में डूबा रहता, ठीक उसी वक़्त उसके दफ़्तर के सहकर्मी और शांत पड़ोसी उसके हल्‍ले के ख़ि‍लाफ़ पुलिस थाने में शिकायत लेकर बैठे होते. कुछ ही समय में फ़ैसला सुनाकर सिदो हैम्‍ब्रम से हमेशा-हमेशा के लिए दाल भात छीन लिए जाने की नीति रची जा रही होती.

आखिर में एक निजी चिंता. मैं सिदो हैम्‍ब्रम के साथ रहूं, या उसके शांत पड़ोसियों की शिकायत के साथ- इस प्रश्‍न को लेकर अभी तक असमंजस में हूं. मेरी मदद कीजिए- आप ही बताइए, क्‍या करना उचित व संगत होगा?

9 comments:

  1. sido aapki hamari tarah ek aadmi hai jiski aatma abhi tak mari nahi hai. lekin samaj use jeene nahi dena chahta. wo sochta hai, apne logon ke bare mein, unke liye kuch karna chahta hai yahi baat logon ko khalti hai.
    yahan ye poochne ki zarurat hai kya ki kiska saath den, yahan par ye sochne ki zaroorat hai ki sasti chappal aur kameez pahnene wale ki ladayi kaise ladi jaye. kaise uske gaon tak saaf pani pahunchaya jaaye. ho sakta hai iske liye aapko aur hamen koi samman ya award na mile. lekin chaliye ek imandaar koshish to honi hi chahiye.

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  2. ये जो लिखा है आपने बाद मे पढा भी है क्या ,तो फ़िर जरा हमे भी समझाईये की आप क्या समझे,भाई तभी तो आप किसी दूसरे कॊ बता पायेगे की आप क्या बताना चाहते है जब आपको खुदको पता हो की आप चाहते क्या है मुझे पूरा विश्वास है कि आप घर मे खाना मागते होगे और आपके बजाय गाय को पानी पिला दिया जाता होगा,
    क्या यही है वो तथाकथित बुद्धी जीवीयो का प्रगतिशील लेखन जो आप और आपकी मंडली दिन भर अलग अलग नाम से गाल बजाती है

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  3. काकेश्May 18, 2007 at 4:51 PM

    मैं आपका दुख समझ सकता हूँ मुझे सिदो के साथ सहानुभूति है..लेकिन उसके आदर्श कोरे हैं ..कोरे आदर्श यदि यथार्थ की जमीन पर खड़े ना हों तो किसी काम के नहीं होते...आप शायद यथार्थ वादी हैं ..इसिलिये इस प्रश्न में उलझे हैं नहीं तो आप भी अन्य साथियों की भांति फैसला सुना डालते..तो उसे भी यथार्थ से परिचित करवाइये.. लेकिन वो दूसरों का दाल-भात छीने नहीं वरन अपना काम करे और जब सही समय हो तो अपनी ओर से दाल भात बांटने लगे...बताइयेगा..क्या सोचा आपने...

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  4. 'hanste-hanste kisi ko
    jan-ne mat do kis par hanste ho,
    sabko maan-ne do
    ki tum sabkee tarah paraast hokar
    ek apnaape kee hansee hanste ho
    jaise sab hanste hain
    bolne ke bajay...'

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  5. बेनाम बंधु, मेरी कोई मंडली नहीं है. मंडल भी नहीं है. और जीवन में अभी बहुत सारे प्रश्‍न हैं जिनके बारे में जान लेने का वैसा आत्‍मविश्‍वासपूर्ण ज्ञान नहीं है जिससे आप भरे-भरे दीख रहे हैं. आप प्रसन्‍न रहिये कि आपका खाना आप ही जीमते होंगे, भूले से भी वह किसी गाय या बछिया की ओर न जाता होगा.
    और प्‍यारे काकेश, मित्र, अच्‍छा लगा जानकर कि आप हमारा दुख समझ रहे हैं और आपको सिदो से भी सहानुभूति है.. मगर थोड़ा इसपर भी सोचें. इस विकराल, उलझे असमान विकास के जंबो जहाज पर उड़ते देश में सामाजिक न्‍याय का सवाल सिर्फ छूछी सहानुभूति हल नहीं कर लेगी. सिदो दूसरों का दाल भात छीन नहीं रहा और न समय आने पर दाल भात बांटने जैसी चिंताओं में अटका है.. दाल भात बांटकर समाज की भूखमरी का तोड़ निकलना होता तो ढेरों मंदिर अपनी सीढ़ि‍यों पर भूखों को खाना खिलाते रहे हैं.. वह भूख मरी नहीं है, बल्कि उसकी मार्मिकता बढ़ी ही है. आप विचार कीजिएगा, सिदो को सही-सही ऐसे समाज में कैसे अपना जीवन जीना चाहिए.

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  6. आप हमारी तो सुने नहीं बस अपनी कहे चले गये...हमें सहानुभूति इसलिये नहीं है कि सिदो सामाजिक न्याय के सवाल उठा रहा है..बल्कि इसलिये कि उसका लड़ाई का तरीका गलत है.....हमें सहानुभूति है क्योकि सिदो ये नहीं समझ पा रहा है कि लड़ाई किस से लड़े ...कभी भयंकर रोग से पीड़ित व्यक्ति कड़वी दवाई देने वाले डॉक्टर को ही अपना दुश्मन समझ लेता है ...वैसी ही कुछ मानसिक अवस्था है सिदो की ..एक अकेला दिया एक बड़े तूफान से नहीं लड़ सकता...एक युद्ध को जीतने के लिये निरे उत्साह से ज्यादा अच्छे हथियारों और कुशल युद्ध कौशल की आवश्यकता होती है..सिदो केवल चिंतित है..और उस चिंतन ने उससे अच्छे और बुरे की समझ छीन ली है....आपने खुद ही कहा कि वो भोला और बुद्धू है...पहले उसके भोलेपन को दूर कर बुद्धि दीजिये फिर देखिये वो कैसे बुद्धू से बुद्ध बन जाता है...वो अभी व्यक्ति को विचार से अलग नहीं कर पा रहा...वैचारिक लड़ाई को व्यक्तिगत लड़ाई समझ बैठा है.. इसी समझ की उसे जरूरत है....

    नीलिमा जी ने जो कहा वो तो थोड़ी आदर्शवादिता हो गयी...हम तो सिदो को जानते है इसिलिये अपनी जाने सही सलाह दे रहे हैं...हमें उम्मीद हैं आप जैसे गुणी पुरुष जब उसके साथ हैं तो वो राह भटकेगा नहीं...ईश्वर उसे भली मति दे और उसकी लड़ाई को सफल बनाये..

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  7. विचित्र जमाना है..सिदो हैम्ब्रम के दुख को समझाने के लिए अपनी ही टिप्पणी पर एक टीका लिखिए, ताकि श्रीमान बेनाम को यह समझ आ पाए कि इंसान सिर्फ अपने वर्तमान में खाने और हगने के लिए ही नहीं जीता, अपने परिवेश और उसके भूत-भविष्य की किसी नैतिकता में भी जीता है।...

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  8. aapka asmanjas me rahna samjh aata hai..jab isse bahar nikal jaye to hame bhi bata dijiyega kyonki ham bhi usi asmanjas me hain

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  9. काकेश जी, लड़ाई का कोई सही तरीका आपको पता हो तो हमें भी बताइए। भले ही सिदो हेम्‍ब्रम सचमुच के चरित्रों का नाम रहा हो (एक भूख से मरे हुए आदिवासी का और दूसरा देवघर के एसपी का) लेकिन हम तो उसमें अपना ही अक्श देखते हैं। दिक्कत ये है कि हम किसी चरित्र को उसके रचनाकार के साथ नत्थी कर देते हैं, उसकी liability बना देते हैं। अरे, रचनाकार तो हमारे-आप जैसा कोई सामयिक चरित्र निकालने की कोशिश करता है। वह चरित्र आज के संवेदनशील-संघर्षशील इंसान का प्रतिबिंब कहां तक बन पाया है, तलाश इसकी होनी चाहिए, न कि काल्पनिक चरित्र को नसीहत देने की। आप ये तो देखिए कि भोला और बुद्धू होना ही इस चरित्र की ताकत है, गांव से जुड़े रहने की नैतिकता ही उसकी आंतरिक ऊष्मा का स्रोत है। अगर वह अपना बुद्धूपना छोड़ देगा तो बुद्ध बनने की बात तो दूर रही, खुद से भी हाथ धो बैठेगा।

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