Saturday, May 19, 2007

चोरियां: एक संस्‍मरण

मेरे लिए यह बात हमेशा रहस्य बनी रहती कि भैया अपनी जरूरतें कहां से पूरी करते हैं. मसलन फ़िल्म की टिकट के पैसे, जूतों की पालिश वाली डिबिया या लौंड्रीवाले को पैसे चुकाने की उन्हें जरूरत पड़ती होगी मगर इन ज़रूरतों के लिए मैंने भैया को कभी अम्मां से पैसे मांगते नहीं देखा. बाबूजी से पैसा मांगने का तो सवाल ही नहीं था क्योंकि बाबूजी से कोई पैसे नहीं मांगता था. सब जानते थे कि बाबूजी पैसे नहीं देते. बाबूजी सचमुच पैसे नहीं देते थे. महीने के हिसाब के लिए भी अम्मां को पैसा सौंपते समय वे इसी तरह हाथ से पैसा निकालते जैसे उनकी चोरी हो रही है.

बीच बीच में जब बाबूजी का मन दिल्लगी करने को होता तो वे धोने के लिए पुरानी गंजी उतारते हुए मनोज को छेड़ते कि जा, हमारे लिए गुल की डिब्बी ले आ, आठ आने इनाम दूंगा. मनोज चिढ़कर जवाब देता हमें इनाम नहीं चाहिये. मनोज भी जानता था कि बाबूजी दिल्लगी कर रहे हैं. ऐसा पहले कई दफे हो चुका था कि बाबूजी के वादे के धोखे में फंसकर मनोज गुल की डिब्बी खरीदकर लाया और इनाम की मांग की बेजा ज़िद के लिए उसे भैया की मार पड़ी. तब बाबूजी के अन्याय के प्रति मनोज रोने-धोने का नाटक करता, बाबूजी चबूतरे पर बेशर्मी से हंसते हुए अपने सांवलेपन को सरसों के तेल से मलते हुए तराशते रहते. थककर अम्मां बाबूजी की दुष्‍टता पर बुदबुदती हुई मनोज का मन रखने के लिए उसके हाथ में एक चवन्नी रखकर उसे अपने साथ अंदर ले जाती. इस सीधेपन से बाबूजी के हाथों मनोज के ठग लिए जाने पर मुन्नी को भी हंसी आ जाती थी. हाथ में एक बार अम्मां की चवन्नी आ जाने के बाद मनोज मुन्नी के तमाचा जड़कर भैया की मार का अपना बदला चुका लिया करता. मुन्नी समझदार थी. वह मनोज के तमाचे के जवाब में रोने की बजाय उस पर चिल्ला कर संतुष्‍ट हो लिया करती थी. मुन्नी को मालूम था वह मनोज की मार का बदला उसे पलटकर मारकर चुका सकने में असमर्थ होती. अम्मां मनोज को डांटने की बजाय मुन्नी को डांटकर बरजती कि उसे लड़की होने का सऊर कब आएगा.

अम्मां के हाथ अमूमन बंधे होते. मनोज या मुन्नी की छोटी मांगों पर दिक्कत नहीं होती थी मगर मैं या दीदी उससे कोई मांग करें तो अम्मां का चेहरा कातर हो जाया करता था. वह दबी आवाज़ में सवाल करती कि कितने से काम चल जायेगा या फिर मैं या दीदी कुछ दिन और इंतज़ार नहीं कर सकते. अम्मां को समझाना मुश्किल होता कि कुछ दिन इंतज़ार करने के बाद ही विवशता में हम उनके आगे अपनी मांग लाने को मजबूर होते थे. मामले की गंभीरता समझकर फिर अम्मां के आंचल से चाभी लेकर स्टील की बड़ी आलमारी खोली जाती और उनकी न पहनने वाली जार्जेट की साड़ियों के नीचे से मुड़े तुड़े कुछ रुपये बाहर निकाले जाते. ऐसे मौकों पर न चाहते हुए भी दुख और भावुकता का अजीब गोपनीय-सा माहौल तैयार हो जाता और जाने क्यों दीदी और मैं एकदम रुंआसे से हो जाते. हमें लगता कि हम अम्मां पर बोझ हैं और ख़ामख्वाह उनके लिए परेशानी खड़ी कर रहे हैं. दीदी बाद में मुझे बाज़ार भेजते हुए सख्ती से हिदायत देती कि जितने पैसे खर्च हों मैं उतने ही पैसे खर्च करुं और बाकी चुपचाप लाकर उसके हाथ में सौंप दूं. मैं जिम्मेदार भाई की तरह दीदी की आज्ञा का पालन करता और रास्ते भर के असमंजस के बावजूद तकरीबन सही-सही बचा पैसा उन्हें वापस सौंप देता. कभी-कभी अपनी नीचता से हारकर एक रुपया अपने लिए बचा लेता था. दीदी को मेरे हिसाब में संदेह हो तो उनके कुछ कहने के पहले ही मैं डांटकर उनका मुंह सिल दिया करता कि आइंदा अपनी खरीदारी खुद किया करें! दीदी चुप हो जाया करतीं मगर घंटे दो घंटे बाद यह कहने से खुद को रोक नहीं पातीं थीं कि घर में सब चोर हैं.

जबकि सच्चाई थी कि घर में सब चोर नहीं थे. चोर इकलौता मैं था. अपने हिस्से का हजम करके बची हुई मिठाई के फिराक में मनोज भी रहता मगर अपने अनाड़ीपन की वजह से उसकी चोरी हमेशा पकड़ी जाती. भैया और दीदी इतने बड़े थे कि उनकी चोरी का सवाल ही नहीं उठता था. रही मुन्नी तो वह इतनी छोटी थी और फिर उसके फ्रॉक में जेब भी नहीं था और न उसके अपना कोई बक्सा था जहां वह अपनी चोरी छिपा सकती. मुन्नी भोली थी, मुन्नी चोर नहीं थी. बहुत बार तो चोरी के श्‍ाक में भैया का थप्पड़ मनोज पर गिरता और डरकर मुन्नी रोने लगती. मैं भैया के थप्पड़ से बचकर चलता था इसलिए अपनी चोरियों में मुझे खास होशियारी बरतनी होती थी. खुल्लम खुल्ला रखे पैसों की तरफ मैं देखता भी नहीं था. और न अम्मां के सहेजकर रखे पैसों पर मेरी गलत निगाह जाती. मैं भरी दोपहर, उठंगे हुए बाबूजी की आंख के नीचे से पैसा उड़ाने में यकीन रखता था. और उतनी ही चोरी करता जितने से बाबूजी को तक़लीफ़ न हो. न जानकर उन्हें तक़लीफ़ तो न होती मगर कभी कभी पैसों की छेड़छाड़ का शक जरूर हो जाया करता. ऐसे मौकों पर मनोज का पिटना लाजिमी रहता.

अम्मां परेशान होकर कहतीं उनके घर में चोरी नहीं थी, जाने ये चोरी कहां से चली आई. बाबूजी मज़ाक करते कि चोरी अम्मां अपने पीहर से लेकर आई हैं. अम्मां बाबूजी की बात का बुरा मानकर एक वक्त़ खाना नहीं खातीं. रात को गुल की कुल्ली के लिए बाबूजी को पानी का जग देते हुए मुन्नी बाबूजी को सूचित करती कि अम्मां ने खाना नहीं खाया है. बाबूजी हाथ में जग लेकर सड़क के झिपझिपाते लैंप-पोस्ट को देखकर मन ही मन बुदबुदाते कि यह बत्ती फिर जाने वाली है, ऊपर मुन्नी से कहते, 'अच्छा?`

दीदी दरवाजे से झांककर उन्हें इत्तिला करती कि अम्मां पीहरवाली बात का बुरा मानकर नहीं खाई हैं. बाबूजी को तब अपने मज़ाक की बात याद आती. वे दीदी से कहते कि हम तो मज़ाक कर रहे थे. दीदी लौटकर अम्मां को बतातीं कि बाबूजी मज़ाक कर रहे थे. अम्मां तिलमिलाकर जवाब देतीं कि अपने लोग पर काहे मजाक नहीं करते? हमरे पीहर वालों पर ही इनको मजाक सूझता है और उस रात अम्मां नहीं ही खातीं थीं और दीदी को अकेले खाना पड़ता था. कई दफे बाबूजी के मज़ाक के विरोध में अम्मां के संग दीदी भी उपवास कर लेतीं.

मैं चोरी के पैसों को चोरी के पैसों की तरह खर्च कर देता. दीदी या मुन्नी के राखी के पैसों की तरह उनका ठीक ठीक हिसाब किताब कभी मेरे पास नहीं रहता. ज्यादातर पैसे फ़िल्म की टिकटों पर खर्च हो जाते या इंद्रजाल कॉमिक्स या मनोज पाकेट बुक्स पर. भैया की तरह लौंड्रीवाले का पैसा चुकाने का भार मुझ पर नहीं था. मैं और मनोज धोबी या दीदी के हाथ के धुले कपड़े पहनते थे. भैया का मानना था धोबी कपड़े खराब कर देता है. अम्मां, बाबूजी और दीदी का भी ऐसा मानना था कि धोबी कपड़े खराब कर देता है मगर इसकी वजह से वे अपने कपड़े लौंड्रीवाले को दें, ऐसा नहीं होने लगता. अलबत्ता बाबूजी भैया की टिप्पणी के जवाब में ये जरूर कहते थे कि भैया को बहुत लाटसाहबी चढ़ रही है. भैया भी जानते थे कि उन्हें लाटसाहबी चढ़ रही है मगर वे इसमें कुछ बुराई नहीं देखते थे. भैया को लगता था उन्हें बहुत आगे जाना है और इस आगे जाने के लिए उन्हें धोबी की बनिस्बत लौंड्री की सफाई अपने लिए अनिवार्य लगती. कभी कभी धुन में आकर वे साइकिल को एक लात लगाकर पीछे ठेल देते कि मन भर गया इस साली साइकिल से, अब तो अपने को एक बुलेट चाहिये.

मनोज हैरान होकर आंखें फाड़े भैया से पूछता, 'सच्ची में भैया?`

मनोज को विश्वास नहीं होता कि उसके अपने भैया उसके अपने घर में एक सचमुच का बुलेट ले आएंगे.

2 comments:

  1. बेहद सुंदर. मुझे अपना बचपन याद आ गया, पेट भरने, तन ढंकने,सिर छिपाने और शादी-ब्याह में किसी तरह इज्जत बचाने से फालतू हमारे घर में नहीं रहा. हर टॉफ़ी, चॉकलेट अय्याशी थी. चोरियाँ मैंने भी कीं और इसलिए कीं क्योंकि भविष्य की आशंका से डरे माँ-बाप (अपने और हमारे दोनों के भविष्य की आशंका, संभावना नहीं)दस पैसा माँगने पर कातर हो जाते थे जबकि अठन्नी उड़ा लो तो उन्हें पता भी नहीं चलता था. उन्हें दुखी करना अच्छा नहीं लगता था, खुद बहुत देर तक दुखी रह नहीं सकते थे, मध्यमार्ग यही था.
    अनामदास

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  2. .. सही है प्रमोद भाई.. लिखते रहिये..

    अपने घर में भी कुछ ऐसा ही माहौल था.. पापा जी अपने पैसे गिन के रखते थे.. चवनी अठन्नी तक.. उनके पैसे उठाना मुसीबत को आमंत्रण देना था.. बीच वाला भाई जब घर से भागा था.. पापा जी को पता था कि नई गड्डी से दस के तीन नोट लेके भागा है.. इसलिये हम तीनों भाई हमेशा मम्मी के ही पैसे उड़ाते थे.. और सामान लाते समय हिसाब में बेईमानी करते थे..

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