Monday, May 21, 2007

शहर में कवि: मंगलेश डबराल की दो कविताएं



अपनी तस्‍वीर

यह एक तस्‍वीर है
जिसमें थोड़ा-सा साहस झलकता है
और ग़रीबी ढंकी हुई दिखाई देती है
उजाले में खिंची इस तस्‍वीर के पीछे
इसका अंधेरा छिपा हुआ है

इस चेहरे की शांति
एक बेचैनी का मुखौटा है
करुणा और क्रूरता परस्‍पर घुलेमिले हैं
थोड़ा-सा गर्व गहरी शर्म में डूबा है
लड़ने की उम्र जबकि बिना लड़े बीत रही है
इसमें किसी युद्ध से लौटने की यातना है
और ये वे आंखें हैं
जो बताती हैं कि प्रेम जिस पर सारी चीज़ें टिकी हैं
कितना कम होता जा रहा है

आत्‍ममुग्‍धता और मसखरी के बीच
कई तस्‍वीरों की एक तस्‍वीर
जिसे मैं बार-बार खिंचवाता हूं
एक बेहतर तस्‍वीर खिंचने की
निरर्थक-सी उम्‍मीद में.

1993, हम जो देखते हैं संग्रह से




पैरों के पीछे

एक दस्‍तक़ सुनकर
मैं हड़बड़ी में दरवाज़ा खोलूंगा
और तुम भीतर आओगे
दिन भर की ख़बरों / थोड़ी-सी हवा
और चुप्‍पी के साथ
थकान की तरह अपना कोट उतारकर
आईने में कुछ देर
तुम अपना चेहरा देखोगे और मुस्‍कराओगे
कमरे में हलकी-सी धूल उड़ेगी
और चली जायेगी
खिड़की से बाहर

इस तरह सब कुछ
बीतता जाता है रोज़
उसी रास्‍ते आना-जाना / थकान
किताबें / नींद / बहसें और उनके बाद
आने वाली पथरीली उदासी
सब कुछ बीतता जाता है
हमेशा हम बचे रह जाते हैं
किसी स्‍वप्‍न के भीतर दुबके हुए
अपनी बची-खुची ज़ि‍न्‍दगी बचाते हुए
सोचते हुए कि एक दिन
कोई विस्‍फोट होगा और ज़ि‍न्‍दगी बदलेगी

मेज़ पर गंभीरता से झुके हुए
हम किसके प्रतिनिधि हैं
किस घटना की ख़बर हैं हम
कौन हैं वे लोग हम जिनकी आवाज़ हैं
भूख से भर्रायी हुई
हम उन्‍हें जान पाते / कोई हथियार
दे सकते उनके हाथों में
हम उनसे पूछ सकते क्‍या वे अपने साथ
लाये हैं अपनी आग
कविता से पूछे जाने थे
सारे सवालों के जवाब
पूरी सदी / पूरे ख़ून का हिसाब

भारी दिमाग़ और कांपते पैरों से
हम एक दिन चल देते हैं
बिना किसी यात्रा के / बिना उद्देश्‍य के
बिना प्रेम किये / बिना लड़े
चलते हुए हम अपने साथ
ले जाते हैं अपने शब्‍द
पैरों के पीछे ख़ामोशी छोड़ते हुए.

1977, पहाड़ पर लालटेन संग्रह से

5 comments:

  1. इतनी अच्छी कविताएँ पढ़वाने के लिए धन्यवाद । टिप्पणी करना धृष्टता होगी ।
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  2. गहरी बातें कहते हैं मंगलेश जी बिना किसी चमत्कार के.. सरलता से हमारे जीवन के विरोधाभास को उघाड़ कर सामने रख देते हैं..

    ReplyDelete
  3. मंगलेशजी तक साधुवाद पहुँचाएँ ।

    ReplyDelete
  4. "अज़दक" का आभार और
    मंगेश जी को साधुवाद

    ReplyDelete
  5. मंगलेश जी की कवितायें पढवानें का बहुत आभार।

    *** राजीव रंजन प्रसाद

    ReplyDelete