Tuesday, May 22, 2007

आम पर कौन लिखेगा?..

इतने दिन निकल गए लेकिन देख रहा हूं अभी तक किसी ने लिखा नहीं. सब साहित्‍य और समाज ठेले पड़े हैं, आम पर कोई नहीं लिख रहा. कितनी किस्‍में हैं, आगा-पीछा की कहानी क्‍या है, कहां की खास है, कहां की ‘ऐसे ही’ है, ग्‍लोबलाइज़्ड बाज़ार में भारतीय आमों की हस्‍ती क्‍या है- कितनी तो बातें हैं करने को, लेकिन कोई कर नहीं रहा. हापुस, केसर, दसहरी, लंगड़ा, मलीहाबादी पांच नाम गिनाने से ज्‍यादा मुझे जानकारी होती तो मैं मुंह ज़रूर खोलता. मगर मुंह खोलने के बाद उससे हवा ही निकलेगी, ज्ञान नहीं फूटेगा, इसलिए मुंह और मन मारकर- कोई और बंधु या सखिनी- पहलकदमी लेंगे इसकी राह तकता बैठा हूं. नुक्‍कड़ के ठेले पर भाव साठ से गिरकर पचास और अब पैंतीस रुपए होने को आया मगर किसी की लेखनी अभी भी सप्राण नहीं हुई है.

ताजुब्‍ब की बात है. ब्‍लॉगजगत में ज्ञान के सामुदायिक आदान-प्रदान का इससे रोचक व रसीला विषय क्‍या होता, मगर जो है कि, चुप्‍पी तनी हुई है. ज्ञानी जी पांडे जी रोज़ नए-नए विषयों की वैतरणी में उतरते रहते हैं मगर बगल में सजी, पानी में डूबी, बाल्‍टी भर-भर जिसके स्‍वाद व आह्लाद से इतनी वैचारिक खुराक पा रहे हैं, उसकी महिमा का गान करें, इसका विचार अब तक न आया. अभय ने एलोपैथी की कमर पे लात लगाई, घी का महात्‍म्‍य गाया, आम की फांक रोज़ तश्‍तरी में सजाकर धन्‍य हो रहे हैं मगर उसकी महात्‍म्‍य चर्चा में जाएं, इसका आलस्‍य अभी भी तोड़ नहीं पाए हैं.

शाम को अविनाश को फ़ोन करके मैंने पूछा- आम के बारे में तुम्‍हारी क्‍या राय है? तीस सेकेंड की ख़ामोशी के बाद अविनाश ने स्‍वर भारी बनाकर जवाब दिया- फिलीपीन के साथ-साथ हमारे यहां भी राष्‍ट्रीय फल है. दक्षिण एशिया में हमेशा से धूम रही है. वेदों में इसे देवताओं का फल कहा गया.. कालीदास ने इसकी प्रशस्ति गाई, सिकन्‍दर और चीनी यात्री ह्वेन सांग इसके मुरीद रहे, लखीबाग़ के नाम से अकबर ने दरभंगा में आम के लाख पेड़ लगवाए थे.. मैंने कहा ठीक है, ठीक है ये सब तुम मोहल्‍ले पर लिख सकते थे, लेकिन लिखोगे नहीं. बकिया लोग आम पे लिखें या नहीं, पहले क्लियर कर दो, बाद में कहोगे फिर पतनशील चर्चा हो रही है! अविनाश ने कहा सोचकर जवाब देता हूं, रात के साढ़े तीन हो रहे हैं, अभी तक जवाब नहीं आया है..

ख़ैर, ये तो भइया, हमारा आपस का असमंजस है.. अनामदास जी का ताज़ा पोस्‍ट पढ़कर हम आम (जन) और ख़ास (राज्‍य) के एक दूसरे ही पेंच में सुबह-सुबह उलझ रहे हैं.. मगर आपलोग जो मुंह में गूदा डाले धन्‍य और मगन बने पड़े हैं, भला आप किस वजह से चुपाये हुए हैं? हमारी ही तरह इस विषय में अज्ञान का अंधेरा है, पर्याप्‍त जानकारी का अभाव है? इतिहास, भूगोल व बाज़ार के आंकड़े दुरुस्‍त नहीं हैं?

भाई, गांठ में जितना है उतना ही खोलिए! चुप मत रहिए, आम इतना बोल रहा है, आप भी आम के बारे में बोलिए!

9 comments:

  1. अब हम क्या बोलें.. मारे शर्म के हमारी बोलती बंद हो गई है..

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  2. आम पर हम जैसे आम लोग क्या लिख पाऎंगे..आप खास हैं... आप ने लिख दिया हम भी धन्य हो गये... " मगर आपलोग जो मुंह में गुदा डाले धन्‍य और मगन बने पड़े हैं, भला आप किस वजह से चुपाये पड़े हैं? " ..भाई हम तो मुंह में गूदा ही डालते हैं ... वैसे अच्छा लिखा ...लेकिन बोम्बे के अल्फांसो को काहे भूल गये दद्दा ...

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  3. आम अनाम हो गया है
    फ़ुरसत का काम हो गया है
    मुद्दे बनाने के चक्कर मे
    पूरा झाम हो गया है

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  4. हा हा हा...

    आपने सिद्ध कर दिया, साबित कर दिया, दुनिया को दिखा दिया कि लिखने वाला अगर चाहे तो वह किसी खास पर नहीं आम पर भी धारदार लिख कर दिखा सकता है.
    बहुत खूब!

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  5. हमारे मुंहा से हवा नहीं, ज्ञान निकल रहा है। कॉपी-पेंसिल उठाइए और नोट करिए, एक किस्‍म होती है बादामी, मालदा, सिंदूरी, बीजू, फजली, सिपिया इत्‍यादि (बिहारी बाबू के ज्ञान के सौजन्‍य से)।

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  6. देखिये ध्यान से लिखिये, यदि कोई भी किस्म छूटी तो आपकी खैर नहीं । लोग कह देंगे यह जातिवाद है। अल्प संख्यकों, पिछड़ों , अगड़ों, या फिर दक्षिण के साथ अन्याय हुआ है । इसी डर से तो हम अभी तक पोस्ट नहीं कर रहे थे, लेख तो कब का तैयार है ।
    घुघूती बासूती

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  7. आम पर लिखना आम बात नही यह काम आप जैसे खास लोग ही कर सकते थे और किया भी बहुत खूब.

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  8. घुघूती जी,
    बहाने मत बनाइए.. बहुत कविता कर ली आपने! जो असल काम का लेख है, अब उसे बाहर कीजिए! जल्‍दी!

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  9. आम पर ख़ास का लिखा अच्छा लगा

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