Wednesday, May 23, 2007

एक लोहार की..

कल राह चलते एक पुराना दोस्‍त मिल गया. लंबे अंतराल पर मिल रहे थे सो हम हें-हें करते एक दूसरे की ओर लात फेंकने लगे. दोस्‍त ने कहा, घर चलो, कुछ अपनी कलाकारी दिखाता हूं! ये गुजराती दोस्‍त मुझे पसंद है. फ़ालतू की डींग नहीं हांकता, अपनी गाने की बजाय ज्‍यादातर सामनेवाले की सुनता है, और कहता है तो फिर गहरे मर्म की बात करता है. वही संबंध रोज़-बरोज़ की दिमाग़ी सफ़ाई, जीवन और उसके काम की व्‍यवस्‍था में भी झलकती है. स्‍पष्‍ट और व्‍यवस्थित. कहीं अनावश्‍यक कचड़ा नहीं. इसी लत ने आईआईटी की पढ़ाई के बाद अच्‍छी सुकूनदेह नौकरी छुड़वा दी, नये सिरे से एक दूसरा जीवन शुरू करवाया; और शायद स्‍पष्‍टता का यही आग्रह है कि लगभग ढाई शादियों से गुजर चुकने के बाद भी उसके जीवन में कड़वाहट का स्‍थान नहीं बना है. पेशे से कैमरामैन है मगर इन दिनों स्‍केचबुक रंगता यायावरी कर रहा है. इसी स्‍केचबुक के दर्शनार्थ हम न्‍यौते गए थे.

बीयर की ठंडक कलेजे में उतारने व तीन-चार डकारोपरांत हम कला के लिए तैयार हो गए. हमारे अपने छोटे-से मित्र-मंडल में पता नहीं कैसे इस ग़लतफ़हमी को हमेशा ज़मीन मिलती रही है (और आजतक मिली हुई है) कि कला-सला पर हमारी राय का विशेष अर्थ है. सो विशेष अर्थ भरने के लिए हमने दोस्‍त के स्‍केचबुक में रॉटरिंग की रेखाएं और क्रेयन के रंगाकारों की गंभीरता से जांच शुरू की. दोस्‍त गंभीरता से मेरी नज़रों को जांचता रहा. थोड़ी देर तक एक पेज़ से दूसरे में चिड़ि‍या, बत्‍तख, बिल्‍ली, काली-नीली रात, सांप, लैंपपोस्‍ट, आंखें, मुसाफ़ि‍र, नंगी औरतों के दोहराव को पढ़ने के बाद मैंने स्‍केचबुक बंद करके दोस्‍त से कहा- अच्‍छा है, प्‍लेफुल है.. मगर इसमें अंधेरी कहां है? तुम्‍हारे अपने जीवन की.. बाहर पड़ोस की थरथराहट कहां है? एक्‍सपीरियेंस की कॉम्‍प्‍लेक्सिटि, विविडनेस कहां है?

रात के डेढ़ बज रहे थे, बीयर के असर में मैं और भी बहुत कुछ बकता रहा होऊंगा, अब ठीक-ठीक याद नहीं है. दोस्‍त ने अपनी कला को डिफेंड करने की कोशिश नहीं की. चुपचाप मुझे सुनता, मेरी बातें समझने की कोशिश करता रहा. इसके बाद हमने और बीयर पी, हल्‍की-फुल्‍की छेड़ते आर्टी शेप का जैज़ सुनते रहे. नयी बोतल खोलते हुए अचानक दोस्‍त ने मुझसे सवाल किया कि मैं ‘डेथ’ के बारे में क्‍या सोचता हूं. चूंकि तरन्‍नुम में था ही, मैंने घनघोर आत्‍मविश्‍वासी हिंसा से कहा- किसी दिन आएगी और सब खतम हो जाएगा, इससे ज्‍यादा उसे क्‍या भाव देना. हां, तुम्‍हारी तरह नौजवान लोग जब उससे ऑब्‍सेस्‍ड और उसमें इंडल्‍ज करते दिखते हैं, तो मन होता है बोतल उठाके तुमलोगों के सिर पे दे मारूं! जीवन में थोड़ा तो समय है उसे इसपे खराब करते रहें कि एक दिन वह चुक जाएगा तो क्‍या?.. दोस्‍त मेरे जवाब पर हमेशा की तरह हंसने की बजाय चुपचाप सोचता रहा, मानो असहमति ज़ाहिर करके वह घर आए मित्र को दुखी करने से बच रहा हो. बीयर का घूंट भरते हुए फिर उसने संकोच से कहा- हमारा ये जो जीवन है.. हमलोगों के दुनिया में होने का क्‍या कोई अर्थ है, इस सवाल पर सोचा है तुमने? इस प्रश्‍न का मीनिंगफुल आनसर है तुम्‍हारे पास?

जिस अवस्‍था को मैं प्राप्‍त हो चुका था, इस सवाल का क्‍या, दोस्‍त से युंग और लेवी-स्‍त्रॉस सब पर ज़ि‍रह कर सकता था. लेकिन की नहीं.. मुंह पर हाथ रखकर सभा समाप्‍त की और घर लौट आया.. आज सुबह आंख खुली तो दोस्‍त को यह पेज़ फॉरवर्ड किया.. पता नहीं उसकी चिंता का इसमें कितना समाधान है.. लेकिन ऐसी चिंताओं का कभी कोई समाधान हासिल हुआ है भला!

5 comments:

  1. जिंदगी क्या है और हम क्यों है इसका अर्थ ये वो विषय है .. जिस पर हम शाय्द घंटों बिना रूके बहस कर सकते हैं.. और शायद कभी बिना कुछ कहे .. सारे उत्तर दे सकते हैं.. पर जो भी उत्तर या निष्कर्ष निकाला जाये.. satisfactory कभी नहीं होगा..और ना ही इस सवाल का कोई लाजवाब जवाब मिलेगा..
    कल ही मैं अपने दोस्त से बात कर रही थी.. वो बहुत उम्दा लेखक और गायक है शौक से.. और पेशे से business co-ordinator..मैंने बातों में कह दिया .. जिंदगी मजाक है.. उसने कहा मेरे लिये तो खेल है.. रोज़ खेलता हूं जीतता हूं हारता हूं. पर तलाश खत्म नहीं होती.. मैने कहा सबका अपना नजरिया है.. और दोनों चुप इस विषय पर...

    अपनी बात कहते हुय़े कुछ ज्यादा कह गई माफ़ी चाह्ती हूं.. आप सच्मुच बेहद अच्छा लिखते हैं.. कई बार मर्म को स्पर्श करती हैं आपकी बातें.. आपकी मित्र-मंडली में आपके विचार क्यों मायने रखते होंगे समझा जा सकता है सहज ही.. खासकर आपका पुराना बक्सा बेहद पसंद आ रहा है मुझे. धन्य्वाद

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  2. अच्छा अनुभव सुनाया आपने.डेथ का ज़िक्र छेड्कर आपको नहीं लगता कि दोस्त ने आपकी कला पारखी नज़र से नज़र हटाई? क्या अन्धेरी के अंधेरों को न देख पाने के आपके छिद्रांवेश पर यह एक अनकही असहमति तो नहीं थी?फिर आपने मौत को भी मौत की नींद सुलाने मै खास कामयाबी हासिल नहीं की!वैसे शाम की बैठकों में इससे अलग उम्मीद भी क्या की जाये?

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  3. कहीं पढा था कि हमारी मृत्यु हमारी चिंता का विषय नहीं हो सकती . जब तक हम हैं,मौत हमारे पास नहीं फटक सकती और जब मौत आ जाएगी तब हम नहीं होंगे . सो चिंता कैसी .

    दरअसल हम अपनी नहीं , अपनों की मौत को लेकर चिंतित रहते हैं . और उनके जीवन को लेकर भी .

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  4. मेरी नहीं है, चंदू बाबू.. हालांकि जिसकी है वह भी कुछ हज़ार किताबों का खुद को मालिक बता रहा है.. और हें-हें करने से ज़्यादा उसकी समझ भी कुछ हमारी जितनी ही तीक्ष्‍ण लग रही है!

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