Thursday, May 24, 2007

एक देशभक्‍त की विदेश यात्रा उर्फ़ एक मार्मिक संभावना का त्रासद अंत

बाबूलाल साव की मां रीमला छोटी थी अपनी मौसी की शादी में रांची गई थी, बाबूलाल नहीं गया था. रांची, नेतरहाट, दुमका, लोहरदगा, हज़ारीबाग़, बोकारो, कोडरमा, गुमला कहीं भी जा सके, बाबूलाल के जीवन में ऐसा अवसर उपस्थित नहीं हुआ था. चांडिल के पड़ोस के रेलवे लाइन पर तरकारी का झौवा इस गाड़ी से उस गाड़ी चढ़ाता दिन भर कुली बना पसीना बहाता बाबूलाल. उसे दुनिया घूमकर कोलम्‍बस नहीं बनना था. कोलम्‍बस की कहानी उसके लिए मतलब नहीं रखती थी. बाप माधो और मां रीमला मतलब रखते थे, और उनके मतलब का जीवन जीता बाबूलाल साव झारखंडी अर्थव्‍यवस्‍था में योगदान करता सुखी बना हुआ था. सफ़ेद कपड़ों वाला कोई बिहारी बाबू अगर उसे डांटकर कहता झारखंड झूठ है, सत्‍य बिहार व बंगाल है तो इस सत्‍य को मुंडी हिलाकर मंज़ूर कर लेने में बाबूलाल को ज़रा तक़लीफ़ न होती.

बाबूलाल अशिक्षित नहीं था. मगर नौवीं तक की भूगोल, इतिहास, गणित, भाषा की शिक्षा का उसके अपने जीवन से कभी कोई संबंध नहीं बना. नेहरू के भाखड़ा-नांगल या पड़ोस के हिराकुद बांध के ऐतिहासिक महत्‍व से बाबूलाल का परिचय न हो सका. न ही उत्‍तर-पूर्वी प्रांतों का अंदरूनी असंतोष या दक्षिण में कावेरी के पानी बंटवारे के विवाद के बारे में बाबूलाल की कोई सम्‍यक जिज्ञासा निर्मित हुई. इस देश में लड़ाइयां लड़ी गई हैं इसका धुंधला अहसास उसे ज़रूर था लेकिन चीन और पाकिस्‍तान किस चिड़ि‍या का नाम हैं, इस संबंध में वह निश्चित ही पूरी तरह बोदा था. दरअसल बाबूलाल का समस्‍त समाज विज्ञान गांव से शुरू होकर चांडिल के पड़ोस के हाट-बाज़ार व मेलों पर आकर चुक जाता था. उसने स्‍कूल से बाहर कभी हाथ में किताब लेकर नहीं देखी थी, न उसे कंप्‍यूटर जैसी किसी चीज़ के अस्तित्‍व में होने की ख़बर थी. प्‍लास्टिक का अविष्‍कार, चीनी प्रधानमंत्री की भारत-यात्रा, नेशनल हाइवे की महात्‍वाकांक्षी योजना, ग्‍लोबल वॉर्मिंग या ग्‍लोबलाइज़ेशन ऐसे विषय थे जो बाबूलाल साव के लिए उतना ही बुझौव्‍वल थे जितना अमरीकी राष्‍ट्रपति जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश के लिए बिहार की छठ पूजा.

इसे भारी दैवी संयोग ही कहेंगे कि पुलिस की चंगुल से छूटकर भागा ख़ूंखार आईएसआई एजेंट बहादुर ख़ान बाबूलाल के झौवे से टकराकर न केवल बीच सड़क पर गिरकर होश खो बैठा, बल्कि तबतक होश खोये रहा जबतक पीछे भागती बदहवाश पुलिस ने आकर उसे बेड़ि‍यां न पहना दीं. डीआईजी पुलिस व स्‍थानीय विधायक दोनों ही बाबूलाल साव के बहादुर करतब से प्रभावित हुए और राज्‍य सरकार की ओर से बाबूलाल के लिए इनाम की प्रस्‍तावना की. बाबूलाल के हर्ष का पारावार न रहा. उसके लिए सरकारी इनाम इतना महत्‍वपूर्ण नहीं था जितना रांची जाकर अपनी मां के हासिल के बराबर खड़ा हो लेने की उपलब्धि. इस अनोखे संयोग व उत्‍सव योजना से बाबूलाल ही प्रसन्‍न नहीं हुआ, बाप माधो व मां रीमला भी आपा खोकर अस्‍वाभाविक हो रहे थे. नए हवाई चप्‍पल और उधारी की चालीस रुपये वाली कमीज़ में जब बाबूलाल सरकारी जीप में सवार हुआ, तब उसे ख़बर नहीं थी कि मात्र दो घंटों के अंतराल में एक दूसरा दैवी संयोग घटेगा. नेतरहाट के जंगली रास्‍ते गिरे हुए पेड़ के अवरोध पर सरकारी जीप न चाहते हुए भी ठहरने को बाध्‍य हुई.. और फिर अचानक जिस अघटित की आशंका थी वही हुआ!

झाड़ि‍यों में छिपे एमसीसी के आतताई हमले का बाकी लोग शिकार होने से बच गए, मगर भावना के अतिरेक में सड़क के बीचोबीच भागते बाबूलाल साव ने देसी तमंचे की एक गोली खाकर अपनी जान संकट में ज़रूर डाल ली.

रांची सिर्फ़ बाबूलाल साव की देह ही पहुंच सकी. प्राण रास्‍ते में ही देह का साथ छोड़ चुके थे!

4 comments:

  1. क्यों लिखते हैं ऐसा ?

    पहले से दुखी मन और दुखी हो जाता है . मन को संभलने क्यों नहीं देते ? क्या चाहते हैं ?

    अवसाद की आंसू गैस वहां मायानगरी में बैठे-बैठे छोड़ रहे हैं . इधर बाकी जगह बढ रही आकुलता-व्याकुलता का कुछ भान है आपको ?

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  2. वाह तो नही ही कह सकता पर कहानी बडी मार्मिक लिखी है आपनॆ.अपने समाज घुरहू और कतवारु की सुध कौन लेने वाला है साथी. प्रमोद जी कल्लू ,टिल्लू,रामप्यारे,राम अयुग मिश्रा के बारे मे भी लिखियेगा.....

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  3. प्रियंकर भाई,

    आप इतना भावुक क्‍यों हो जाते हैं?.. इतना भावुक होकर आप बाबूलाल सावों के जीवन की व्‍यथा कम कहां कीजिएगा?.. वैसे इस छोटे-से रुपक को लिखते हुए, सच कहता हूं, मेरे दिमाग़ के पीछे हसन जमाल साहब के कहे तर्क ही गूंज रहे थे! अच्‍छा संयोग है ना, कहां से कहां बातें कनेक्‍ट होती हैं!

    विमल जी,

    चिंता न करें, रामप्‍यारे, दुलारे, रामआसरे, कमल, अमल, विमल सबपर लिखने की कोशिश करूंगा..

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  4. रचना बढि़या बन पड़ी है. संवेदनाओं को सीधे प्रभावित करती है. वाह

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