Friday, May 25, 2007

एक अप्रगतिशील प्रेमपत्र

रामजीत राय का नैहर गई अपनी पत्‍नी बेबी को..

डारलिन, मेरा दिल मेरा जिग़र बेबी जी, मैं आनंद से हूं, और कामना करता हूं कि तुम भी आनंद से होगी. पानी-बिजली का टेरजिडी हइये नै है हुंवा, संधा-सकाले मनोरमा मौसी और मम्‍मीजी का हाथ का सूरन का अचार और कटहल का तरकारी भेंटा रहा होगा त आनंद काहे ला नै होगा! हलांकि हम उतने आनंद से नहीं हूं जैसा ये कलम हमसे झूट्ठे लिखा रही है! मगर हमको बिस्‍सास है कि कलम का जबान के पार तुम हमारी आत्‍मा का जबान पढ़ लोगी.. और वेस्‍टेज में तुमरे आगे अपने दर्दनाक दर्द का एक्‍सप्‍लेनिन का हमको दरकार नहीं है!

एक तो ससुरी आग माफिक दिन बना रहता है (मन का नहीं, मौसम का बात कर रहा हूं.. मन तो क्‍या दिन क्‍या रात चौबीसों घंटे आगी में भक्‍क-भक्‍क जल रहा है!), बिजली कब्‍बो रहती ही नहीं है कि आदमी टेबल पंखा छाती से साटके सीतल मन कुछु सोच-बिचार करे. इलैट्रिसि कब नहीं रहती है का बजाय कब आती है का कोस्‍चन पूछो त जादा मतलब है. कल रात को एतना दुखी-दुखी लग रहा था कि पूरा रतजग्‍गे हो गया (पास में रहो तब रतजग्‍गा, दूर रहो तब्‍बो रतजग्‍गे, ये तो बड़ नाइंसाफी है, मैलॉर्ड!), भोर में जाके आंख लगा तब्‍बे ससुरी बिजली आ गई! हमको पत्‍ते न चला! सकाली में पापाजी डंडा खोदके उठाए कि जल्‍दी-जल्‍दी झाड़ा-पानी कै लो, बिजली आय रही है तब जाके खबर हुई! आंख मलके उठके देखते हैं कि हम हिंया महायानी मुद्रा में पड़े हैं और लुंगी जो है साला पलंग का दूसरका छोर पर लहराय रहा है! एतना तो गुस्‍सा पड़ा कि का बोलें! पापाजी पे नहीं, डारलिन, इलैट्रिसि डेपाटमेंट पे! (वइसे पापाजी पे भी पड़ते रहता है, कहां तुम सुबहे-सुबहे गाल पर दांत का मीठा काटा काट के उठाती थी, और पापाजी हैं कि सीधे डंडे खोदते रहते हैं!)

सच्‍ची में, डारलिन, जब से तुम गई हो, दुखै-दुख है. न घर में मन जोड़ाता है नहिंये बहरी. कलै का सुनो. मम्‍मीजी एतना दिन बाद डोसा और कोंहड़ा का सुखलका तरकारी बनाई थी, और हम बहुत चाव से खाइयो रहे थे, लेकिन पापाजी उंगली खोदके पूछै दिये कि दहेज का हीरो-होंडा दरवाजा पे खड़ा है तब काहे ला मुंह चोथा जइसा बनाये हुए हो? अब आत्‍मा का दर्द मम्‍मीजी का डोसा और कोंहड़ा खाके थोड़े छुप सकता है, बेबी जी, बोलिये आप? लेकिन पापाजी को तो सच्‍चो बताइयो नहीं सकते! अच्‍छा है कि मम्‍मीजी बरज के उनको चुप करा दीं, नहीं तो ई आदमी का खोदा-खोदी एक बार सुरू होके कभी खतम होता है?

कल डाकदरजी का हिंया भी गए थे. ऊ बोलते हैं जनाना साथ में लाइये तब जाके ठीक से चेकिन होगा. और पेर्गनेंसी का प्रोबलम जानने बास्‍ते आपका नहीं जनाना का चेकिन करना होगा! जी में त आया कि हरमखोर को वहिंये घुमाय के एक लप्‍पड़ लगायें! तुमरा पेट और हेयर-ओहर केने-केने पाजी टोयेगा और हम चुप्‍प पटाये रहेंगे? फिर नौकरी वाला सवाल भी जो है अभी ले लटके पड़ा है! पापाजी टेंट से बीस हजार बहिरिया रहे हैं और पांड़े जी बोलते हैं बीस हजार में तो आजकल गदहा का पखाना नहीं मिलता! सब चूतिये समझता है हमको! गदहा का पखाना बीस हजार में मिलता है, जी? मगर अभी उनसे नौकरी पाने का स्‍वारथ है तो काहे ला फोकट का जिरह करने जाते! मगर मन जो है, डारलिन, सच्‍चो में एकदम खिन्‍नाय गया है! तुमरे बिना दुनिया-जहान का कौनो चीज अब अच्‍छा नहीं लगता (कल मन मारके दू रुपिया वाला आइसक्रीमो लिये लेकिन मजा नहीं आया!)! मोबाइल का लिये मम्‍मीजी का नाक में दम किये हुए हैं. ऊ बूझ नहीं रही है कि आज का जमाना में कितना इम्‍पोरेंट साधन है. एक हाली आ गया तो ऐस रहेगा मगर तब तलक हम एक चिट्ठी का दूरी पे हइये हैं! पांड़े जी के हिंया से एक टिरिप मारके आते हैं त फिर तुमको नवका लेटर लिखेंगे!

जाने का पहिले एक बात बोलो लेकिन.. हमरी तरह तुमरा भी रात-दिन बिरह में जीना हराम है कि नहीं, सच्‍ची बात बोलना, डारलिन?

तुम्‍हारा हिरदय सम्राट रामजीत

10 comments:

  1. प्रमोदजी
    बहूत कातील लिवलैटर लिखै हैं। अऊर-पास में रहो तब रतजग्‍गा, दूर रहो तब्‍बो रतजग्‍गे-का तो जबाब नहिं है। बाह बाह, भंडरफुल
    आलोक पुराणिक

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  2. विरह और मजबूरी को बहुत सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किए हो भाई।

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  3. बहुत सही भाई जी, ठीके कह्ते हैं, ज़माना त है नौकर ..... का..लगे रहिये...

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  4. कईसा दो न लग रहा है रामजीतजी का प्रेम पत्र देख के..केतना न लभ करता है. बिरह की बेदना मे केतना न ओझरा गया है आदमी, ई बात हमको तो एकदम्मे से भा गया है.

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  5. बहुत धांसू लिखे हैं।

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  6. अच्छा लिखा है ...बहुत से शब्दों का मतलब केवल वही समझ सकता है जो बंगाल बिहार में रहा हो .यही इस लव लैटर की जान है..भोजपुरी तो तब भी लोग समझ जाते हैं लेकिन बंगाली मिश्रित भोजपुरी सब नहीं समझ पाते .. अब "संधा-सकाले" में सकाले को कितने लोग समझे होंगे..."स्वकाल थेके आमि तोमार अपेख्खा कोरछी " ...कोतो लोग बूझवे एके ... बूझवे ना तो ...किंतु आमि बूझते पाच्छी ... भालो लिखे छेन ...

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  7. स्स्स... सुनिए.. इधर इधर... बहुते हँसी आया पढ़के. ये रामजितवा पाँड़े जी के हिंया से लउटा के नहीं. उसका लवलेटरवा सारा लीक करते रहियेगा. हम इधरे बैठे हैं.

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  8. अह्ह्ह्ह! मिजाज ठंडा गिया। जब्बर लिखें हैं सर जी।

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  9. अद्भुत, आशा है आगे भी ब्लाग जगत पर कृपा बनाए रखी जाएगी।

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  10. हे भगमान,
    उन्खा लिखलका लेटरवा आप छाप दिए :):)

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