Saturday, May 26, 2007

मोटा आदमी

रोज़-रोज़ लोकल में चढ़ता है आख़ि‍र कैसे चढ़ता है मोटा आदमी. कौन सहृदय बैठने को अपनी सीट का कोना छोड़ देता है कौन लड़की जगह देती है मोटे आदमी को मन में. गणित के सिद्धांतों की पुस्‍तक हाथ में लिए लीन डूबा हो तब भी सब यही समझते हैं खुशवंत सिंह का जोकबुक पढ़ रहा है मोटा आदमी. मोटा आदमी भी जानता है मोटा आदमी होना मज़ाक नहीं है. नसीब का मारा रिक्‍शेवाला भी ऐसी सवारी बिठाने के पहले सोचता है चार दफ़े और फिर सारे रास्‍ते अपनी क़ि‍स्‍मत को रोये जाता है. मोटा आदमी हमेशा मोटा था ऐसा किसी किताब में नहीं लिखा लेकिन आगे हमेशा मोटा ही रहेगा उसकी आत्‍मा में गर्म लोहे से दर्ज़ हो गया है. कितनी सारी तो चिंतायें रहती हैं कि हर घड़ी चिंता में छिटकता रहता है मोटा आदमी. भूख की आकुलता घेरे रहती है, जानते हुए कि वह खाना नहीं खाना उसे खा रही है फिर भी खाते रहना चाहता है मोटा आदमी. खाने के पहले ही खा चुकने की थकान से खाने को देखता लम्‍बी सांसें भरता है मोटा आदमी. कपड़े अंड़सते हैं मन अंड़सता है नहाना तक चैन से नहीं हो पाता. मकान की लिफ़्ट खराब हो तो एकदम-से बेचारा बेदम होने लगता है मोटा आदमी. बहस में उसकी राय नहीं पूछते लोग. रेल की खिड़की वाली जगह के लिए बच्‍चा झगड़ता नहीं मोटे आदमी से. आंदोलन और औरतों से दूर चुपचाप ज़ि‍न्‍दगी गुजार देना चाहता है मोटा आदमी. रोने की बात पर बेवजह हंसता रहता है मोटा आदमी.

4 comments:

  1. मोटे आदमी की विडम्बना गजब है..
    पर पतला क्यों पतलातर होता जाता है.. इस का रहस्य भी बताइये..

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  2. शानधारम्
    आलोक पुराणिक

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  3. बेचारे मोटे........

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  4. शायद हर मोटा आदमी दुखी नहीं होता. जो होता है तो वो कई छोटे-बड़े कई दुखों का समुच्चय होता है. जिसमें किसी वक़्त उसके लिए मोटेपन का दुख सबसे बड़ा दुख हो जाता है. आइए इस गम को मार डालें. कोई तो रास्ता होगा आखिर.

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