Sunday, May 27, 2007

अच्‍छा होता..

ये बेमतलब के अख़बार हर पल पीछे छूटती घड़ी की टिक-टिक चुपचाप सन्‍नाटे में चाय पीना क्‍या अच्‍छा है. वही लोग वही सड़कें हमेशा वही पथरीली उदासी और रोज़ का भय कि कल क्‍या होगा कुछ भी तो अच्‍छा नहीं इसमें. बैंक के क़ागज़ ये पुर्ची वो बिल हर घड़ी की बिलबिलाहट ख़ाक साली ये ज़ि‍न्‍दगी है.

अच्‍छा होता आज सहरसा कल नंदीग्राम होते. कॉमरेड अमूल्‍य से सवाल करते चीन में हो क्‍या रहा है, कॉमरेड. साथी ज्‍वालाजी से पूछते हर क्रांति का अंत विकसित पूंजीवाद में क्‍यों इसे समझाइए साथी. दिमाग़ की धूल झाड़कर फिर से संकरी गलियों में उतरते समझते गांधी, लोहिया, चीन और कश्‍मीर. डफली पर सुनते ककर्श कोई जनवादी गीत पगुराते जाने क्‍या-क्‍या चैन से बंसी बजाते बेचैनी की.

मगर ज्‍यादा अच्‍छा होता सीखते हम थोड़ी तरतीब, चीखने से पहले खुद से सवाल करते. सीखते खुद से सवाल करना क्‍या होता है समय संसार समाज सीखने की तहज़ीब क्‍या होती है. जैसा किसी कवि ने ठीक ही कहा है दुनिया रोज़ बनती है. बम फेंककर तो एक दिन में कतई नहीं बदलती दुनिया.

3 comments:

  1. bahut sahi kahte hain aap.. kisi aur se sawaal karne ke pahle.. hum khud se pahle sawaal karen.. kisi aur par ungali uthaane se pahle ye sochen ki chaar ungaliyan apni taraf hain.. aur sabse achha ye ki sawaal sirf karen nahi unke jawaab bhi talaashen .. kuchh karen to Bahut Achhaa Hota.. nahi???

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  2. सीखना, तरतीब, सवाल, तहज़ीब क्‍या बोल रहे हैं? बम फेंककर ही तो एक पल में बदलती है दुनिया। और आभासी दुनिया के बम के बारे में भी कुछ मालूम है?

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